लालू बदलेंगे समीकरण या नीतीश होंगे मजबूर?
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भाजपा के साथ करीब आठ वर्षों तक सरकार चलाने वाले नीतीश कुमार अब लालू प्रसाद के आगे मजबूर होंगे या फिर लालू प्रसाद अपनी कार्यशैली बदलेंगे। विधानसभा चुनाव में दो तिहाई बहुमत से सत्ता में लौट रहे नीतीश कुमार को इस बार नए सामाजिक समीकरणों के लिए नया संतुलन बिठाना होगा।
भूमिहार की बैसाखी पर चलने वाले नीतीश कुमार की नई बैसाखी यादव ब्रांड की है। ऐसे में यह देखना भी दिलचस्प होगा कि नीतीश बिहार के इन दो मुखर समाज के साथ खुद को कैसे समायोजित करते हैं।
सालों बाद बिहार की सत्ता में वापस आए लालू अपनी रेलमंत्री वाली छवि को आगे बढ़ाने की कोशिश करेंगे या फिर नीतीश कुमार को वह नीतीश ‘यादव’ बनने को मजबूर कर देंगे।
यह निर्विवाद है कि नीतीश की ‘छप्पर फाड़’ जीत का पूरा श्रेय लालू यादव और उनके साथ यादव व मुसलमानों की गोलबंदी को जाता है। इसके साथ कुर्मी वोटों ने भी नीतीश पर विश्वास बनाए रखा, जबकि अति पिछड़े तबके ने भी नीतीश को सिर-माथे पर बिठाए रखा।
नीतीश को नए समीकरणों के साथ बिठाना होगा संतुलन
जहां तक नीतीश कुमार की संभावनाओं का सवाल है। काम करने के लिए उनके पास व्यापक समर्थन है और लालू यादव का पूर्ण सहयोग भी है। शुरुआती तौर पर सरकार में लालू का दखल सार्वजनिक रूप से सामने आने की उम्मीद नहीं है। जानकारी के मुताबिक 13 से 15 नवंबर के बीच कभी भी नई सरकार को शपथ दिलाई जा सकती है।
राजद सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, तेज प्रताप व तेजस्वी को अभी कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी। आवश्यकता हुई तो लालू की बड़ी बेटी मीसा भारती को सरकार में शामिल किया जा सकता है।
लालू यादव सरकार पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए फिलहाल ज्यादा रुचि नहीं ले रहे हैं, लेकिन नीतीश पर राजद को बेहतर विभाग देने का दबाव हो सकता है। इसको लेकर भी एक-दो दिनों में परिदृश्य साफ होने की संभावना है।