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Hindi News ›   Bihar ›   Muzaffarpur News ›   The height of negligence in Bihar A model hospital built at a cost of 23 crore rupees is plunged into darkness

बिहार में लापरवाही की इंतहा: 23 करोड़ का मॉडल अस्पताल अंधेरे में डूबा, टार्च और मोमबत्ती से हुआ मरीजों का इलाज

Tue, 23 Dec 2025 09:29 PM IST
तिरहुत ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सीतामढ़ी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सीतामढ़ी Published by: तिरहुत ब्यूरो Updated Tue, 23 Dec 2025 09:29 PM IST
सार

Bihar: सीतामढ़ी सदर अस्पताल की बदहाली सामने आई है। 23 करोड़ की लागत से बने मॉडल अस्पताल में बिजली कटते ही अंधेरा छा जाता है। टार्च व मोबाइल की रोशनी में इलाज किया गया। सोलर सिस्टम लगे होने के बावजूद चालू नहीं है, जिससे मरीजों को भारी परेशानी हुई।

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The height of negligence in Bihar A model hospital built at a cost of 23 crore rupees is plunged into darkness
सीतामढ़ी जिला अस्पताल - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सीतामढ़ी जिला मुख्यालय स्थित सदर अस्पताल की बदहाली ने एक बार फिर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। करीब 23 करोड़ रुपये की लागत से बने इस मॉडल अस्पताल को अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस बताया गया था, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है। स्थिति यह है कि बिजली कटते ही पूरा अस्पताल अंधेरे में डूब जाता है और मरीजों का इलाज टार्च, मोबाइल की रोशनी और मोमबत्ती के सहारे किया जाता है। यह हालात न केवल मरीजों की जान के लिए खतरा हैं, बल्कि अस्पताल प्रशासन की घोर लापरवाही को भी उजागर करते हैं।

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मंगलवार दोपहर बिजली गुल होते ही अस्पताल परिसर में अफरा-तफरी मच गई। इमरजेंसी से लेकर ओपीडी तक रोशनी का कोई वैकल्पिक इंतजाम नहीं था। चिकित्सक डॉ. अमरनाथ यादव को टार्च जलाकर मरीजों को देखते हुए पाया गया। दवा काउंटर, रजिस्ट्रेशन काउंटर और ओपीडी में मरीजों की लंबी कतार लगी रही, लेकिन बिजली नहीं होने के कारण कामकाज बुरी तरह प्रभावित रहा। मरीज और उनके परिजन इलाज के लिए इधर-उधर भटकते नजर आए, जबकि प्रशासन की ओर से तत्काल कोई समाधान नहीं किया गया।

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हैरानी की बात यह है कि अस्पताल परिसर में लाखों रुपये की लागत से सोलर प्लेट और सोलर लाइटें पहले से लगी हुई हैं, लेकिन वे केवल शोपीस बनकर रह गई हैं। बताया गया कि आठ महीने पहले भवन हैंडओवर होने के बावजूद अब तक सोलर सिस्टम को अस्पताल से जोड़ा ही नहीं गया। मामूली तकनीकी पहल और सीमित खर्च से यह वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत अस्पताल को रोशन रख सकता था, लेकिन न तो सफाई कराई गई और न ही कनेक्शन की प्रक्रिया पूरी की गई। नतीजतन, बिजली कटते ही डॉक्टरों को मरीज देखने में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

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विडंबना यह भी है कि जहां मरीजों के इलाज के लिए पर्याप्त रोशनी तक उपलब्ध नहीं है, वहीं अस्पताल भवन के भीतर महंगी कुर्सियां, वातानुकूलित कमरे और साज-सज्जा के साधन मौजूद हैं। इससे यह सवाल उठता है कि प्राथमिक जरूरतों की अनदेखी कर केवल दिखावे पर सरकारी धन क्यों खर्च किया गया। करीब 25 मिनट तक बिजली गुल रहने के बावजूद किसी जिम्मेदार अधिकारी ने वैकल्पिक व्यवस्था शुरू करने की पहल तक नहीं की। बताया गया कि बिजली कटते ही रजिस्ट्रेशन और दवा काउंटर पूरी तरह ठप हो जाते हैं, जिससे मरीजों को भारी परेशानियां झेलनी पड़ती हैं।

मामले पर सवाल उठने पर अस्पताल के जिम्मेदार पदाधिकारी कन्नी काटते नजर आए। हालांकि, सिविल सर्जन अखिलेश कुमार ने सफाई देते हुए कहा कि अस्पताल में सोलर प्लेट लगी हुई है और जल्द ही जेनरेटर सहित अन्य वैकल्पिक व्यवस्थाएं की जाएंगी। उन्होंने दावा किया कि मॉडल अस्पताल की व्यवस्था में जो भी कमियां रह गई हैं, उन्हें शीघ्र दुरुस्त किया जाएगा। लेकिन जब तक ये दावे जमीन पर नहीं उतरते, तब तक अंधेरे में इलाज करता यह मॉडल अस्पताल मरीजों की जान के लिए गंभीर खतरा बना रहेगा।

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