बिहार: वर्दी का सपना अधूरा! गंगा में लापता दो युवकों के नहीं मिले शव, पुतले बनाकर किया अंतिम संस्कार
बिहार के बेगूसराय जिले के बरौनी प्रखंड स्थित सिमरिया भोला घाट पर दो अक्टूबर को गंगा में डूबे गढ़हरा निवासी अंकित कुमार (20) और शिवम कुमार (19) का आठ दिन बाद भी कोई सुराग नहीं मिला। दोनों युवक सेना में भर्ती होने की तैयारी कर रहे थे। स्थानीय गोताखोरों और ग्रामीणों ने लगातार तलाश की, लेकिन सफलता नहीं मिली।
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जिस उम्र में माता-पिता को अपने बेटों के सेना की वर्दी पहनने और देश की सेवा करने का इंतजार था, उस उम्र में उन्हें अपने जिगर के टुकड़ों के पुतले बनाकर अंतिम संस्कार करना पड़ा। आठ दिनों तक गंगा किनारे अपनों की तलाश और उनके घर लौटने की उम्मीद में बैठे परिजनों की आंखें आखिरकार पथरा गईं। न बेटों का कोई सुराग मिला और न ही उनके अंतिम दर्शन हो सके। बिहार के बेगूसराय जिले के बरौनी प्रखंड स्थित सिमरिया भोला घाट पर दो अक्टूबर को गंगा में डूबे गढ़हरा निवासी अंकित कुमार (20) और शिवम कुमार (19) का आठ दिन बाद भी पता नहीं चल सका। दोनों युवक सेना में भर्ती होने की तैयारी कर रहे थे। स्थानीय गोताखोरों और ग्रामीणों ने लगातार उनकी तलाश की, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली। आखिरकार परिजनों ने दोनों के पुतले बनाकर उनका अंतिम संस्कार कर दिया। इस हृदयविदारक घटना ने परिवारों को तोड़कर रख दिया है। वहीं, ग्रामीणों ने प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि क्या गरीब परिवारों के बच्चों की जिंदगी की कोई कीमत नहीं है?
आठ दिन तक तलाश, फिर भी नहीं मिला कोई सुराग
दो अक्टूबर को सिमरिया भोला घाट पर गंगा में डूबने के बाद अंकित कुमार और शिवम कुमार लापता हो गए थे। घटना के बाद से ही दोनों परिवार अपने बेटों के सुरक्षित मिलने की उम्मीद लगाए बैठे थे। स्थानीय गोताखोरों और ग्रामीणों ने लगातार नदी में उनकी तलाश की, लेकिन आठ दिन बीत जाने के बाद भी दोनों का कोई पता नहीं चल सका। हर गुजरते दिन के साथ परिजनों की उम्मीदें कमजोर होती गईं। परिवार के लोग गंगा किनारे इस आस में बैठे रहे कि शायद उनके बेटे वापस लौट आएं या कम से कम उनके शव मिल जाएं, ताकि वे अंतिम दर्शन कर सकें। लेकिन उनकी यह उम्मीद भी पूरी नहीं हुई। आखिरकार, भारी मन से परिजनों को दोनों युवकों के पुतले बनाकर अंतिम संस्कार करना पड़ा।
सेना में भर्ती होकर परिवार का नाम रोशन करना चाहता था अंकित
अंकित कुमार अपने पिता राम प्रताप सहनी का इकलौता बेटा था। पिता ने बेटे को सेना की वर्दी में देखने और उसके सेना में भर्ती होकर परिवार का नाम रोशन करने के सपने संजोए थे। अंकित भी सेना में भर्ती होने की तैयारी कर रहा था। परिवार को उम्मीद थी कि एक दिन वह देश की सेवा करेगा और उनके सपनों को पूरा करेगा। लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि गंगा में स्नान करने गया बेटा कभी घर वापस नहीं लौटेगा। आठ दिनों तक पिता अपने इकलौते बेटे की एक झलक पाने के लिए तरसते रहे। बेटे के मिलने की उम्मीद में परिवार ने लंबा इंतजार किया, लेकिन अंत में उन्हें उसके पुतले का अंतिम संस्कार करना पड़ा। वहीं, शिवम कुमार (19) का परिवार भी इसी दर्द से गुजर रहा है। दोनों युवकों के सेना में भर्ती होने के सपने अधूरे रह गए और उनके परिजनों को बिना अंतिम दर्शन किए ही अंतिम संस्कार करना पड़ा।
ग्रामीणों ने प्रशासनिक व्यवस्था पर उठाए सवाल
इस घटना ने प्रशासनिक व्यवस्था और आपदा के समय उपलब्ध बचाव संसाधनों को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि यदि किसी रसूखदार परिवार के बच्चे लापता होते, तो शायद प्रशासन का रवैया अलग होता। हालांकि, व्यवस्था में भेदभाव किए जाने के इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ग्रामीणों और परिजनों के मन में यह सवाल है कि आठ दिनों तक चली तलाश के दौरान कौन-कौन से संसाधनों का इस्तेमाल किया गया? क्या लापता युवकों को खोजने के लिए सभी जरूरी उपाय किए गए? गंगा के संवेदनशील घाटों पर लोगों की सुरक्षा और आपदा बचाव के पर्याप्त इंतजाम क्यों नहीं सुनिश्चित किए जाते?
चकिया थानाध्यक्ष ने दी यह जानकारी
चकिया थानाध्यक्ष गौतम कुमार के अनुसार, दोनों युवकों का अब तक पता नहीं चल सका है। मुआवजे के लिए विभागीय प्रक्रिया अंचल अधिकारी को भेज दी गई है।
हालांकि, परिजनों के लिए केवल मुआवजे की प्रक्रिया पर्याप्त नहीं है। उन्हें तलाश अभियान और आगे की कार्रवाई के बारे में भी स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए। यदि खोजबीन के दौरान कहीं लापरवाही हुई या जरूरी संसाधनों की कमी रही, तो उसकी जांच कर जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
दो परिवारों के सपने उजड़े, अब जवाब का इंतजार
अंकित और शिवम के लापता होने से दो परिवारों की दुनिया उजड़ गई है। जिन माता-पिता ने अपने बेटों को सेना की वर्दी में देखने का सपना देखा था, उन्हें उनके अंतिम दर्शन तक नसीब नहीं हुए। पुतलों का अंतिम संस्कार तो हो गया, लेकिन बेटों को खोने का दर्द और उनके बारे में अधूरी जानकारी परिवारों को लगातार परेशान कर रही है। अब सवाल प्रशासन से है कि क्या इन परिवारों को तलाश अभियान और बचाव व्यवस्था को लेकर स्पष्ट जवाब मिलेगा? क्या गंगा के संवेदनशील घाटों पर सुरक्षा के इंतजामों की समीक्षा होगी? और यदि किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है, तो क्या जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की जाएगी? इन परिवारों को अब केवल सांत्वना नहीं, बल्कि जवाब और जिम्मेदार व्यवस्था की भी जरूरत है।