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जन्मभूमि से दूर लालू ने तलाशी सियासी जमीन?

Tue, 20 Oct 2015 07:58 AM IST
Updated Tue, 20 Oct 2015 07:58 AM IST
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Lalu search political ground

क्या राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने भी बिहार में पिछड़ों के मसीहा रहे कर्पूरी ठाकुर की तर्ज पर अपनी जन्मभूमि से दूर सियासी जमीन तलाश ली है? अपने दोनों बेटों तेजप्रताप और तेजस्वी को जिस प्रकार लालू ने जन्मभूमि सारण प्रमंडल के इतर तिरहुत प्रमंडल में चुनाव मैदान में उतारा है, उससे सियासी गलियारे में इस आशय की जम कर चर्चा हो रही है।

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उल्लेखनीय है कि वर्ष 1952 में विधानसभा का पहला चुनाव जीतने वाले कर्पूरी ने दरभंगा प्रमंडल के अपने जन्मभूमि समस्तीपुर को ही अपनी सियासत का केंद्र बनाया था।
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मगर वर्ष 1984 के लोकसभा चुनाव में रामदेव राय के हाथों मिली हार के बाद अचानक उन्होंने तिरहुत प्रमंडल के सीतामढ़ी को अपनी राजनीति का केंद्र बना लिया था।
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इसी प्रकार लालू ने तब छपरा से दूरी बनाई, जब बीते लोकसभा चुनाव में उनकी पत्नी राबड़ी देवी को भाजपा के राजीव प्रताप रूडी से शिकस्त झेलनी पड़ी। इससे पहले लालू इसी सीट पर रूडी सहित अन्य नेताओं को सियासी पटखनी दे चुके थे।

राबड़ी को छपरा में खानी पड़ी थी शिकस्त

Lalu search political ground

चारा घोटाले में सजायाफ्ता होने केकारण कर्पूरी की तरह ही पिछड़ों के मसीहा बताए गए लालू प्रसाद चुनावी राजनीति से दूर रहने के लिए मजबूर हैं। चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध के कारण उन्होंने अपनी चिर परिचित सीट छपरा पर अपनी पत्नी को चुनाव मैदान में उतारा था।

बीते लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आंधी के कारण मिली सियासी हार के बाद छपरा विधानसभा क्षेत्र से उनके परिवार का कोई सदस्य चुनाव मैदान में नहीं हैं। तेजप्रताप और तेजस्वी जिन्हें लालू की सियासी विरासत मिलने की बात कही जा रही है, वे दोनों फिलहाल वैशाली जिले के महुआ और राघोपुर से चुनाव मैदान में हैं।

लालू की पत्नी राबड़ी देवी और बेटी मीसा चुनाव नहीं लड़ रही हैं। वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद कुमार कहते हैं-ऐसा लगता है कि हालांकि बीते लोकसभा चुनाव में लालू नहीं राबड़ी हारी थी, मगर हार तो अंतत: उन्हीं की हुई। ऐसे में लगता है कि इस एक हार से कूर्परी की तरह लालू भी जन्म भूमि से दूर जाने की योजना बना चुके हैं।

तेजस्वी और तेजप्रताप में से किसी को सारण प्रमंडल से उम्मीदवार न बनाना इसी आशय का संकेत है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1984 में मिली हार के बाद कर्पूरी ने कभी पलटकर अपनी जन्मभूमि समस्तीपुर की ओर नहीं देखा। सीतामढ़ी को अपना राजनीति का केंद्र बनाया और इसके बाद उनका देहावसान हो गया।

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