बिहार : बच्चे से बुजुर्ग तक प्रतिभागी, नाट्य मंचन कर संस्कृति सहेज रहा गांव; कैसे खास बना कोजागरा मेला?
Bihar News : नेपाल से सटे बिहार के एक छोटे से जिले की पहचान खास हो गई है। 25 अक्टूबर से यहां अलग तरह का मेला लगेगा। हर साल लगता है। अलग रंग-रूप और सोच के कारण बिहार सरकार ने भी यहां के कलाकारों को मंच-रोशनी की विशेष व्यवस्था दी है।
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सोशल मीडिया के बढ़ते दौर में अश्लीलता से दूर सुपौल का एक गांव संस्कृति संरक्षित करने में जुटा है। 25 अक्टूबर से शुरु होने वाले कोजागरा पर्व के दौरान गांव में एक बार फिर आर्केस्ट्रा नहीं, नाटक का मंच सज रहा है। गांव के बुजुर्ग कार्यक्रम की तैयारियों में जुटे हैं और युवा वर्ग उनका साथ निभाने में कदमताल कर रहा है। बात जिला मुख्यालय से महज 10 किमी की दूरी पर अवस्थित वीणा बभनगामा की हो रही है, जहां कोजागरा के मौके पर तीन दिनों तक अलग-अलग नाटकों का मंचन होगा। खास यह कि यहां बीते 68 वर्षों से दशहरा से भी अधिक उत्साह इस कोजागरा पर्व का रहता है। अपनी व्यस्त दिनचर्या के बावजूद दिल्ली, बेंगलुरु और दूसरे बड़े शहरों में रहने वाले बुजुर्ग से लेकर युवा तक इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए गांव में जुट रहे हैं। बता दें कि मिथिला क्षेत्र में दशहरा के चार दिनों के उपरांत कोजागरा पर्व मनाया जाता है। सुपौल के वीणा बभनगामा में राष्ट्रीय नाट्य परिषद बभनगामा द्वारा आयाेजित मेला इस दौरान मुख्य आकर्षण का केंद्र रहता है।
69वें वर्ष परंपरा का निर्वाह, संस्कृति संरक्षण ही उद्देश्य
परिषद के सचिव चंद्रशेखर झा बताते हैं कि वीणा बभगामा में पहले एक ही स्थान पर मेला का आयोजन होता था। हालांकि, बाद में कुछ ग्रामीणों द्वारा विभक्त होकर प्राथमिक विद्यालय वीणा बभनगामा में अलग से मेला का आयोजन किया जाने लगा। करीब 110 वर्ष पूर्व तक दोनों ही स्थानों पर मेले के दौरान नाटक का मंचन होता था। हालांकि, अब आधुनिकता के दौर में नाटक का मंचन आसान नहीं रह गया है। बावजूद दूसरी कमेटी भी अश्लीलता से कोसों दूर है। वहां मेले के दौरान जागरण अथवा मैथिली गीत-संगीत का कार्यक्रम होता है। जबकि राष्ट्रीय नाट्य परिषद बभनगामा की ओर से नियमित नाटक का मंचन होता आ रहा है। इस वर्ष 69वीं बार लगातार यह कार्यक्रम होगा। इसके तहत 25 अक्टूबर को मैथिली नाटक हटाथ परिवर्तन, 26 को धार्मिक नाटक नल दमयंती और 27 को ऐतिहासिक नाटक अरावली का शेर का मंचन होगा। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य अपनी संस्कृति को संरक्षित करना है। बिहार सरकार की ओर से इसी कारण यहां नाट्य मंचन के लिए स्टेज का निर्माण किया गया है। साथ ही अभिनय परिसर पर लाइट की व्यवस्था भी की गई है।
10 साल के बच्चे से 70 वर्षीय बुजुर्ग तक देंगे प्रस्तुति
परिषद के अध्यक्ष बांके बिहारी मिश्र ने बताया कि मेला आयोजन में सालाना करीब ढ़ाई लाख का खर्च आता है। इस बार बजट 03 लाख तक पहुंचने का अनुमान है, जो स्थानीय ग्रामीणों के सहयोग से एकत्रित होता है। इसमें 01 लाख रुपए मूर्ति निर्माण और पूजन कार्य में खर्च होता है। जबकि 02 लाख में नाटक का मंचन होने की उम्मीद है। कार्यक्रम में प्रस्तुति देने वाले कलाकारों के लिए परिधान का मेला कमेटी पहले से स्टॉक रखती है। आवश्यकता अनुसार, हर साल कुछ परिधान भी इसी राशी से खरीदे जाते हैं। इस साल नाटक मंचन में करीब 35 से 40 कालाकार शामिल होंगे। खास बात यह है कि इसमें 10 साल के बच्चे से लेकर 70 वर्षीय बुजुर्ग तक शामिल हैं। स्थानीय के शिक्षाविद स्वर्गीय बद्री नारायण झा (विप्र बाबू) ने वर्ष 1953 में नाट्य कला परिषद बभनगामा का गठन किया था। तब से यहां नाट्य कला को संरक्षित रखने का प्रयास निरंतर जारी है। वर्ष 2023 में यहां विधायक निधि से नाट्य मंचन के लिए स्टेज का निर्माण भी कराया गया है।
पुस्तकालय के माध्यम से बच्चों को मिल रहा प्रोत्साहन
परिषद के कोषाध्यक्ष जीतेंद्र नाथ झा ने बताया कि स्वतंत्रता सेनानी अजगेबी नाथ झा ने यहां चार कट्ठा जमीन राष्ट्रीय पुस्तकालय के लिए दान किया था। वर्ष 1945 से संचालित इस पुस्तकालय में धार्मिक और सांस्कृतिक से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी से संबंधी 05 हजार से अधिक किताबें उपलब्ध हैं। 50 बच्चों के एक साथ बैठ कर पढ़ने का प्रबंध है। पुस्तकालय समिति मांग के अनुरुप पुस्तकों की खरीद करती है। इसके अलावा बड़ी संख्या में ग्रामीण किताबों का दान करते हैं, जिसका पूरा रिकार्ड रहता है। छात्रों से मासिक 10 रुपए का सदस्यता शुल्क लेकर इसका मेंटेनेंश किया जा रहा है। रोजाना दिन के 03 से शाम 06 बजे तक गांव के बड़े बुजुर्ग भी यहां बच्चों का मार्गदर्शन करते हैं।
मिथिलांचल में खास है कोजागरा पर्व
मिथिलांचल में नवरात्रि समाप्त होने के पांचवें दिन कोजागरा पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। यह पर्व नवविवाहित दूल्हे के घर पर मनाया जाता है। इस अवसर पर दुल्हन की ओर से चुमान की रस्म निभाई जाती है। गांव के लोगों को भोज कराया जाता है और मखाना बांटा जाता है। इसके अलावा विभिन्न स्थानों पर सार्वजनिक रूप से पूजा व मेले का आयोजन होता है। कोजागरा पूजा के अवसर पर लोग तीन दिनों तक बड़े धूमधाम से उत्सव मनाते हैं। इस दौरान मां लक्ष्मी, मां सरस्वती और भगवान गणेश की प्रतिमाएं स्थापित कर पूजा-अर्चना की जाती है।