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कितना सफल हो पाएगा बिहार में शराब बंदी कानून?

Sun, 29 Nov 2015 11:55 AM IST
Updated Sun, 29 Nov 2015 11:55 AM IST
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How much will be successful banning alcohol in bihar

बिहार में शराब बंदी का कानून आगामी एक अप्रैल से लागू होगा लेकिन नीतीश के इस फैसले को लेकर अभी से कई सवाल खड़े हो गए हैं। मामला दोतरफा है, कुछ लोग सरकार के इस निर्णय का समर्थन कर तारीफ कर रहे हैं तो कुछ इसके विरोध में भी हैं।

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उनको लगता है यह उनके अधिकारों का हनन है। लेकिन नीतीश के इस निर्णय के कई पहलुओं पर निगाह डालना भी जरूरी है। आर्थिक रूप से अभी अपने पैरों पर खड़ा होने का प्रयास कर रहे बिहार के लिए यह निर्णय थोड़ा चोट पहुंचाने वाला हो सकता है।
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एक अनुमान के अनुसार शराब की बिक्री से राज्य को हर साल औसतन चार हजार करोड़ से ज्यादा का राजस्व प्राप्त होता है ऐसे में एक झटके में इस निर्णय से राज्य की कमाई पर तो फर्क पड़ ही सकता है उसकी भरपाई करना भी थोड़ा मुश्किल होगा।
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इन हालात में ये और तब मुश्किल हो जाता है जब राज्य के पास आय को विधिवत ढांचा या कमाई का कोई खास जरिया भी न हो। बिहार में उद्योगों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है और पर्यटन जैसे पारंपरिक साधनों में वह गया, नालंदा और राजगीर जैसे पर्यटन स्थलों पर ही निर्भर है।

हालांकि शराब बंदी के पक्ष में तर्क देने वालों के लिए इसके सामाजिक दुष्प्रभावों के मुकाबले यह ज्यादा बड़ी बात नहीं लगती। वहीं एक दूसरी बात ये भी है कि शराब बंदी की यह घोषणा कितनी प्रभावी हो पाती है। क्या यह घोषणा पूरी तरह शराबबंदी की है या आंशिक रूप से शराबबंदी की।

क्या प्रभावी होगी शराबबंदी?

How much will be successful banning alcohol in bihar

दूसरा, सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि क्या शराबबंदी का यह आदेश पूरी तरह अमल में लाया जा सकता है। क्या, यह मानना सही होगा कि मुख्यमंत्री के एक आदेश से राज्य में शराब की बिक्री पूरी तरह बंद हो जाएगी।

इस पर थोड़े सवाल खड़े हो सकते हैं क्योंकि बिहार जैसे राज्य में ब्रांडेड शराब के मुकाबले अवैध और देशी शराब का कारोबार ज्यादा बड़ा है। जानकारी के अनुसार ब्रांडेड शराब की खपत के मामले में बिहार पूरे देश में 20वें नंबर पर आता है।

यहां शराब का कारोबार करने वाली गितनी की कंपनियों में यूनाइटेड ब्रेवरीज, यूनाइटेड स्पिरिट्स और खेतान ही हैं। लेकिन इसके मुकाबले में देशी और अवैध शराब की यहां अच्छी खासी खपत है।

ऐसे में सरकार के आदेश से बड़ी कंपनियों की बिक्री पर तो प्रतिबंध लगाने में दिक्‍कत नहीं होगी लेकिन देसी और अवैध शराब की बिक्री रोकना टेढ़ी खीर है, क्योंकि यह काम ज्यादातर चोरी छिपे ही होता है। और जिस मध्यम और निम्न तबके की भलाई के लिए मुख्यमंत्री ने यह कदम उठाया है वो ही इसका सबसे बड़ा खरीदार है।

पूर्व में असफल रहा है कई राज्यों में ये आदेश

How much will be successful banning alcohol in bihar

मुख्यमंत्री की घोषणा पर भी इसलिए थोड़ी शंका हो जाती है कि इससे पूर्व में कई राज्यों में शराबबंदी का आदेश लागू तो हुआ लेकिन वो इतना प्रभावी नहीं हो पाया। शराब की बिक्री सामने से तो रुकी लेकिन पिछले दरवाजे से इसकी डिमांड और बढ़ गई।

हरियाणा जैसे राज्य में बंशीलाल सरकार ने 1996 में शराब बंदी कर दी थी। लेकिन उसके बाद शराब की बिक्री के अजीब अजीब किस्से सामने आए। लोगों ने शराब खरीदने और बेचने के नए नए तरीके निकाल लिए। दूसरे राज्यों से चोरी से शराब लाने का ग्राफ एकाएक बढ़ गया।

शराब की तस्करी करने वाले माफिया और तस्करों ने भी इसके बहाने अपना काम जमा लिया था। यही कारण रहा कि दो साल बाद ही 1998 में सरकार को अपना यह आदेश वापस लेना पड़ा।

इसके अलावा कई अन्य राज्यों में भी इस आदेश का ऐसा ही हश्र हुआ। हाल फिलहाल गुजरात जैसे बड़े राज्य में शराब बंदी का आदेश लागू है लेकिन जानकारों की मानें तो वहां भी चोरी छिपे खूब शराब बेची जा रही है। ऐसे में नीतीश की इस घोषणा का क्या हश्र होगा यह तो आने वाले समय में पता चलेगा लेकिन फिलहाल इस पर चर्चा का दौर जरूर शुरू हो गया है।

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