फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Bihar ›   Bihar Assembly Election 2020: History of Bihar first Assembly Election 1952 First CM Shri Krishna Sinha First Deputy CM Anugrah Sinha

Bihar Vidhan Sabha Chunav 2020: बिहार का पूरा इतिहास, कब हुआ पहला चुनाव, कौन बना था मुख्यमंत्री?

Tue, 27 Oct 2020 06:08 PM IST
कुमार संभव न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कुमार संभव Updated Tue, 27 Oct 2020 06:08 PM IST
विज्ञापन
Bihar Assembly Election 2020: History of Bihar first Assembly Election 1952 First CM Shri Krishna Sinha First Deputy CM Anugrah Sinha
बिहार चुनाव 2020 - फोटो : अमर उजाला

Election In Bihar 2020: कोरोना महामारी के दौर में बिहार में चुनाव हो रहे हैं। एक बार फिर चुनाव प्रचार और मतदान आदि की पटकथा लिखी जाने लगी है। इस चुनावी माहौल के बीच हम आपको रूबरू कराते हैं उस बिहार से, जहां पहला विधानसभा चुनाव आजादी के बाद देश के पहले आम चुनाव के साथ हुआ था। साथ ही, आपको बताएंगे कि कौन बना था राज्य का पहला मुख्यमंत्री? और उस वक्त राज्य में चुनावी माहौल कैसा था?


loader

Election In Bihar 2020: कोरोना महामारी के दौर में बिहार में चुनाव हो रहे हैं। एक बार फिर चुनाव प्रचार और मतदान आदि की पटकथा लिखी जाने लगी है। इस चुनावी माहौल के बीच हम आपको रूबरू कराते हैं उस बिहार से, जहां पहला विधानसभा चुनाव आजादी के बाद देश के पहले आम चुनाव के साथ हुआ था। साथ ही, आपको बताएंगे कि कौन बना था राज्य का पहला मुख्यमंत्री? और उस वक्त राज्य में चुनावी माहौल कैसा था?

आपको बता दें कि करीब 70 साल पहले 1951-52 के दौरान आजाद भारत में पहले लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ हुए थे। उस दौरान बिहार के साथ-साथ पूरे देश में राजनीतिक माहौल बना हुआ था। राजनेता रोचक नारों के साथ अपने वादों से जनता को अपनी तरफ मोड़ने की कोशिश करते थे, जबकि दिग्गज नेता साइकिल पर रैली करते थे।

उस दौरान महिलाएं बैलगाड़ियों में बैठकर मतदान केंद्र जाती थीं। उस वक्त वोट डालने के लिए अलग-अलग रंग के बक्से होते थे, जिन पर पार्टी के चुनाव चिह्न बने होते थे। दरअसल, उस वक्त कम पढ़ी-लिखी आबादी के लिए ऐसा किया जाता था, जिससे वो अपने प्रत्याशी को ही वोट डालें। वैसे देखा जाए तो आजादी के बाद 1952 के दौरान बिहार में हुआ पहला विधानसभा चुनाव उत्साहपूर्ण होने के साथ-साथ चुनौतीपूर्ण भी था। 

1952 में नहीं थे खास मुद्दे
1952 के दौरान कुछ भौतिक नियम तय किए गए थे। वैसे उस वक्त लोग प्रचार और मुद्दों को लेकर काफी ज्यादा जागरूक नहीं थे। आजादी की लड़ाई के चलते कांग्रेस पार्टी काफी ज्यादा लोकप्रिय थी। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्व आईपीएस अफसर और पूर्व कांग्रेस सांसद निखिल कुमार बताते हैं कि  उस वक्त कांग्रेस पार्टी ने अपने चुनाव प्रचार की शुरुआत अपने चुनाव चिह्न ‘दो बैलों की जोड़ी’ और नारे के साथ की थी। निखिल कुमार बताते हैं कि उस वक्त 79 साल के उनके दादाजी डॉ. अनुग्रह नारायण सिन्हा बिहार के पहले उप-मुख्यमंत्री बने थे, जबकि उनके पिता एसएन सिन्हा राज्य के 19वें मुख्यमंत्री बने।

Bihar Election 2020 Updates: 'पैदा किए नौ बच्चे...' नीतीश के तंज पर तेजस्वी का पलटवार

नेहरू थे पूरे देश के हीरो
कांग्रेस नेता शकील अहमद बताते हैं कि उस वक्त जश्न का माहौल था, क्योंकि देश आजाद होकर ही चुका था। समाज के हर तबके के लोग पूरी तरह कांग्रेस के साथ थे। जवाहर लाल नेहरू पूरे देश के हीरो थे। आपको बता दें कि शकील के पिता शकूर अहमद ने 1952 में खजौली सीट पर चुनाव जीता था। शकील बताते हैं कि विभाजन ने भारतीय मुस्लिमों को खौफजदा कर दिया था, लेकिन कांग्रेस ने उन्हें भरोसा दिलाया। उस वक्त बिहार की पूरी आबादी नेहरू के साथ थी।

यह था 1952 का सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा

निखिल कुमार बताते हैं कि वैसे तो कांग्रेस राज्य में अपनी जीत को लेकर आश्वस्त थी, लेकिन पार्टी की राज्य इकाई के 2 दिग्गजों में घमासान मचा हुआ था। श्री बाबू (श्री कृष्णा सिन्हा), जो बिहार केसरी के नाम से मशहूर थे, जबकि मेरे दादाजी को बिहार विभूति कहा जाता था। आप उन दोनों को विरोधी नहीं कह सकते हैं, क्योंकि वे दोनों ही बहुत बड़े नेता थे। देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद समेत इन तीनों लोगों को आधुनिक बिहार को संवारने वाला कहा जाता है। उस वक्त इन तीनों नेताओं और उनके समुदाय ने जमींदारी प्रथा हटाने का मुद्दा उठाया था, जो 1952 के बिहार विधानसभा चुनाव का सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा था। 

Election In Bihar 2020: जदयू ने 'जमूरा' करार दिया तो चिराग बोले-यह पीएम मोदी का अपमान

जमींदारी प्रथा के विरोध में था पहला चुनाव
पटना स्थित टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में प्रोफेसर पुष्पेंद्र कुमार सिंह के मुताबिक, आजादी के बाद शुरुआती वर्षों में खेतीहर मजदूर और ओबीसी समुदाय के लोग जमींदारी प्रथा खत्म करने की मांग जोर-शोर से उठा रहे थे। भूमिहार जमींदार उनका समर्थन कर रहे थे, जबकि राजपूत और कायस्थ लॉबी विरोध कर रही थी। इस बीच कृष्णा सिन्हा, अनुग्रह सिन्हा और राजेंद्र प्रसाद के बीच तनातनी हो गई। दरअसल, कृष्णा सिन्हा भूमिहार समुदाय से ताल्लुक रखते थे, जबकि अनुग्रह सिन्हा राजपूत थे और राजेंद्र प्रसाद कायस्थ थे। राजेंद्र प्रसाद के राष्ट्रपति बनने के बाद भी यह दरार जारी रही और पार्टी दो धड़ों में बंट गई। एक बार तो अब्दुल कलाम आजाद इस मसले को सुलझाने के लिए दिल्ली से बिहार आए थे। 

इस पार्टी ने दी थी कांग्रेस को चुनौती
राजद के 77 वर्षीय वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी बताते हैं कि उस वक्त कांग्रेस पार्टी के सामने सिर्फ सोशलिस्ट पार्टी की चुनौती थी, जो 1930 के दौर में जय प्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया जैसे दिग्गजों के कारण बनी थी। वो किसानों के लिए बात करते थे, लेकिन टाटा का विरोध करते थे। उस वक्त ओबीसी या दलितों के लिए खासतौर पर कोई आवाज नहीं उठाता था। 1952 में मेरे पिता रामानंद तिवारी सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर जीते थे। उस वक्त काफी दलितों ने भी उन्हें वोट दिया था। 

Bihar Assembly Election 2020: चुनाव से ठीक पहले जदयू विधायक पर जानलेवा हमला हमलावरों ने महागठबंधन के लगाए नारे

महिलाएं इस तरह जाती थीं मतदान के लिए
निखिल कुमार बताते हैं कि उस वक्त बिहार ने जातिवाद को चुनावी अस्त्र के रूप में नहीं खोजा था। उस दौरान जेपी और लोहिया अपने भाषण में पिछड़े शब्द का इस्तेमाल करते थे, जिसका मतलब सभी जातियों के गरीबों से था। हालांकि, 1960 के दौर से इसमें बदलाव आने लगा।  शिवानंद तिवारी के मुताबिक, उस वक्त महिलाओं के वोट हासिल करना बड़ी चुनौती होती थी। उस दौरान बिहार में महिलाएं अपना सरनेम नहीं लिखती थीं। इससे उन्हें मतदान केंद्र में पहचानना काफी कठिन होता था। हालांकि, जिस दिन मतदान होता था, उस दिन महिलाएं बैलगाड़ियों से मतदान केंद्र जाती थीं और रास्ते भर गाने गाती रहती थीं। उस वक्त मैं महज 10-11 साल था और चुनाव किसी त्योहार की तरह होता था।

मतदान केंद्रों पर ऐसे रखते थे नजर

शिवानंद तिवारी ने बताया कि 1952 के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त सूर्यकुमार सेन थे, जिन्होंने अपनी जिम्मेदारी बेहद उम्दा तरीके से निभाई थी। हालांकि, बाद के वर्षों के दौरान बिहार में बूथ कैप्चरिंग और हिंसा आम बात हो गई। उस वक्त बिहार में साक्षरता दर महज 13.4 प्रतिशत थी। ऐसे में चुनाव आयोग ने अलग-अलग रंगों के बैलट बॉक्स रखे थे। वहीं, पोलिंग एजेंट के रूप में ऐसे स्थानीय नागरिक को रखा जाता था, जो सभी लोगों को पहचानता था। अगर उसे किसी पर शक होता तो वह उसकी शिकायत कर सकता था। ऐसे में पीठासीन अधिकारी अंतिम निर्णय लेते थे। उस वक्त बैलट पेपर को खास तरीके से मोड़ा जाता था, जिससे उन्हें आसानी से गिना जा सके। 

बिहार चुनाव: ‘चमकी’ से बच्चों की मौतों के बाद कोई गांव में झांकने नहीं आया

कांग्रेस ने जीती थीं 239 सीटें
26 मार्च 1952 को राज्य की 330 विधानसभा सीटों पर चुनाव हुआ था और 42.6 प्रतिशत लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। 239 सीटें जीतकर कांग्रेस ने पूर्ण बहुमत हासिल किया था और श्री कृष्णा सिन्हा राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने थे। उस दौरान 23 सीटें जीतकर सोशलिस्ट पार्टी दूसरे नंबर पर रही। 1952 के उस दौर को याद करते हुए शकील अहमद कहते हैं कि उस वक्त सभी नेता एक-दूसरे का काफी सम्मान करते थे। उस वक्त के रोचक किस्सों में तो यह भी है कि कैसे मुख्यमंत्री होने के बावजूद श्री बाबू ने कैबिनेट चुनने की जिम्मेदारी अनुग्रह सिन्हा को दे दी थी। शकील अहमद कहते हैं कि इस तरह के वाकये आज के दौर में होने बेहद मुश्किल हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed