बिहार में कांटे की नहीं, आर-पार की लड़ाई
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बिहार विधानसभा चुनाव में राजग और महागठबंधन के बीच कांटे की टक्कर नहीं बल्कि मामला आर या पार का है। राजग के पक्ष में अगड़ी जातियों के साथ बनिया, दलित-महादलित मजबूती से डटे हैं तो महागठबंधन के पक्ष में यादव, मुसलमान और कुर्मी मतदाता मोर्चा संभाले हुए हैं।
बस मौन हैं तो कुल मतदाताओं का 25 फीसदी अति पिछड़ी जातियां (ईबीसी) जिन्हें वास्तव में राजग और महागठबंधन की तकदीर लिखनी है। इनका पलड़ा जिस ओर जितना ज्यादा झुकेगा उसे उतनी ही बड़ी जीत हासिल होगी।
इसके अलावा राज्य के युवा मतदाताओं की भूमिका अहम मानी जा रही है। इनमें जाति से ऊपर उठकर विकास की भूख जगी है। यही कारण है कि राजग और महागठबंधन ने इन्हें अपने पाले में करने के लिए पूरा जोर लगा दिया है।
राजग जंगलराज की याद दिलाते हुए इन्हें दबंग मानी जाने वाली यादव बिरादरी से डरा रहा है तो महागठबंधन अतीत की याद दिलाते हुए अगड़ी जातियों से।
युवा मतदाताओं को दोनों ही ओर से विकास के सपने दिखाए जा रहे हैं। हालत यह है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार युवा वर्ग को लुभाने के लिए अंग्रेजी बोलने का प्रशिक्षण देने तक की बात कर रहे हैं।
महागठबंधन की हार या जीत दोनों का कारण बनेंगे लालू
इस सबके बीच चुनाव में महागठबंधन की जीत हो या हार इसके लिए जिम्मेदार राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद होंगे।
कारण युवाओं के एक तबके में जहां जाति से ऊपर उठकर नीतीश-लालू के भरत मिलाप पर नाराजगी है तो दूसरी ओर राजद के यादव मतदाता अब खुल कर जदयू के पक्ष में खड़े हैं।
राजधानी पटना और इसके सटे इलाकों आरा, भोजपुर, वैशाली और आरा में घूमने पर राजग और महागठबंधन के बीच कांटे की टक्कर दिखती है। कारण दोनों के घोषित समर्थक न केवल मुखर हैं, बल्कि कुल मतदाताओं में इनकी भागीदारी समान रूप से 30 से 35 फीसदी है।
मगर करीब दो दर्जन अति पिछड़ी जातियां, जिन्हें हार और जीत की पटकथा लिखनी है, वो सतर्क होने के साथ-साथ मौन हैं। बहुत कुरेदने पर हल्का सा संकेत भर देते हैं। बातचीत से तेली तमोली का रुझान राजग की ओर दिखता है तो नाई, चंद्रवंशी, कुम्हार महागठबंधन में रुचि दिखाते हैं। बाकी जातियों के मतदाता संकेत तो देते हैं लेकिन उनकी पक्ष-विपक्ष को सार्वजनिक करने में रुचि नहीं है।
राघोपुर के विदुपुर के निवासी भोला रजक कहते हैं वह अब मतदान केंद्र में ही बताएंगे। फिलहाल तो सबकी सुन रहे हैं। ततमा बिरादरी के पकौली के निवासी हरिहर कहते हैं कि अभी तो बिरादरी में विचार ही हो रहा है।
पकड़ी बाजार के नानू सतीश कर्मा कहते हैं कि जो अपने हित का होगा वोट उसी को जाएगा। हितैषी कौन है पूछने पर कहते हैं यह तो समय बताएगा। हालांकि, स्टेशन रोड आरा के रामजतन साव खुल कर कहते हैं अब तो दोनों तरफ मंडल वाला ही है। ऐसे में किसी से परहेज नहीं है।
गठबंधनों का मजबूत और कमजोर पक्ष
महागठबंधन
मजबूत पक्ष- नीतीश का बेदाग और परखा हुआ चेहरा, महिला वर्ग में नीतीश की पैठ, लालू यादव का माई समीकरण, चुनाव का जाति की पटरी पर उतरना।
कमजोर पक्ष-लोगों में जंगलराज का भय, जदयू का कमजोर संगठन, अगड़ी जातियों के इतर युवाओं के एक वर्ग में लालू-नीतीश मिलन पर नाराजगी।
राजग
मजबूत पक्ष- युवाओं में पीएम मोदी की अपील कायम रहना, अगड़ी जातियों के साथ महादलित, बनिया बिरादरी का मुखर साथ, नीतीश समर्थक वर्ग में भी जंगल राज का भय।
कमजोर पक्ष- आरक्षण पर संघ प्रमुख के बयान के बाद पिछड़ी-अति पिछड़ी जातियों में चिंता, नीतीश के कद के मुकाबले राज्य में किसी नेता का न होना, नीतीश को जंगलराज के अलावा किसी अन्य मुद्दे पर घेरने में नाकाम रहना।