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Hindi News ›   Bihar ›   Dent-test in Bihar Bye Election: The one who will make a strong dent on December 05, will win the Kudni seat

बिहार में सेंधमारी का शक्ति-परीक्षण: पांच दिसंबर को जो सेंध लगाएगा तगड़ी, वही जीतेगा कुढ़नी सीट

Thu, 17 Nov 2022 12:51 PM IST
कुमार जितेंद्र ज्योति न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना Published by: कुमार जितेंद्र ज्योति Updated Thu, 17 Nov 2022 12:51 PM IST
सार

भाजपा के खिलाफ सेंधमारी के लिए विकासशील इंसान पार्टी (VIP) ने जातीय समीकरण के हिसाब से प्रत्याशी दे दिया है, जबकि महागठबंधन के वोटरों की हिस्सेदारी काटने के लिए ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (AIMIM) ने भी उम्मीदवार उतार दिया है।

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Dent-test in Bihar Bye Election: The one who will make a strong dent on December 05, will win the Kudni seat
5 दिसंबर को होने वाले उपचुनाव के लिए नामांकन पूरा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मुजफ्फरपुर जिले की कुढ़नी विधानसभा सीट पर 05 दिसंबर को प्रस्तावित उपचुनाव के लिए नामांकन का बुधवार को अंतिम दिन रहा। इसके साथ ही तस्वीर साफ हो चुकी है कि फैसला सेंधमारी से होगा। जिसकी सेंध मजबूत होगी, वही सामने वाले को हरा सकेगा। भाजपा के खिलाफ सेंधमारी के लिए पूर्व मंत्री मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी (VIP) ने जातीय समीकरण के हिसाब से प्रत्याशी दे दिया है, जबकि महागठबंधन के वोटरों की हिस्सेदारी काटने के लिए असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (AIMIM) ने भी उम्मीदवार उतार दिया है। सेंधमारी की ताकत से फैसला इसलिए तय है क्योंकि दोनों प्रमुख प्रत्याशी और दल को प्रभावित करने वाले खिलाड़ी उतर गए हैं। 2015 के विधानसभा चुनाव में जो प्रमुख प्रत्याशी आमने-सामने थे, उनमें ही सीधा मुकाबला इस बार भी दिख रहा है। तब राजद-जदयू को भाजपा प्रत्याशी ने हरा दिया था, लेकिन 2020 में यह सीट राजद के खाते में आ गई जबकि जदयू-भाजपा साथ थी। कुढ़नी सीट पर पिछले चुनाव में राजद के अनिल कुमार सहनी महज 712 वोटों से जीते थे। सहनी की विधायकी पिछले महीने एक घोटाले में सजा होने के बाद छिन गई थी।  

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समझें...भाजपा कैसे मजबूत, कैसी सेंध का कितना खतरा 
फर्जी टिकट और बोर्डिंग पास दिखाकर 23 लाख की धोखाधड़ी करने में सजा के आधार पर 13 अक्टूबर को राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के विधायक अनिल कुमार सहनी की सदस्यता रद्द की गई थी। 9 साल पुराना यह केस तब का है, जब सहनी जनता दल यूनाईटेड (JDU) के राज्यसभा सांसद थे। मतलब, जदयू के राज्यसभा सांसद रहते हुए घोटाला किया और राजद के विधायक रहते हुए सजा पाई। भारतीय जनता पार्टी को सत्ता पक्ष के खिलाफ आवाज बुलंद करने में यह घटनाक्रम काम आएगा। भाजपा की दूसरी मजबूती यह है कि पिछले चुनाव में उसके प्रत्याशी केदार प्रसाद गुप्ता महज 712 वोटों से हारे थे। मौजूदा प्रत्याशी भी केदार प्रसाद गुप्ता ही हैं। यह वही हैं, जिन्होंने 2015 के विधानसभा चुनाव में मनोज कुमार सिंह (कुशवाहा) को 11,570 वोटों से हराया था। मनोज कुशवाहा इस बार भी महागठबंधन के प्रत्याशी हैं और 2015 में भी थे। भाजपा के लिए यह सब फील गुड कराने वाला है। दूसरी तरफ, कुछ गणित परेशान करने वाला भी है। चाणक्या इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिकल राइट्स एंड रिसर्च के सुनील कुमार सिन्हा कहते हैं- “पिछले चुनाव में जब भाजपा प्रत्याशी ने 712 वोटों से सीट गंवाई थी, तब जदयू उसके साथ था जबकि इस बार सत्तारूढ़ जदयू तो राजद के साथ है। इसके अलावा, मुकेश सहनी की सेंधमारी भी भाजपा के लिए परेशानी का सबब है।”

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सहनी ने पहले कहा था कि वह निषाद प्रत्याशी लाने पर भाजपा का साथ देंगे। जब ऐसा नहीं हुआ तो महागठबंधन से निषाद प्रत्याशी देने पर उसके समर्थन में प्रचार करने की बात कही, लेकिन अंत में अपना प्रत्याशी दे दिया और वह भी सवर्ण। सवर्ण में भी भूमिहार जाति के नीलाभ कुमार। करीब 3 लाख वोटरों में सर्वाधिक 60 हजार करीब भूमिहार वोटर इस सीट पर प्रभावी भूमिका में होते हैं। राजनीति में रुचि रखने वाले अधिवक्ता किशोर कुणाल कहते हैं- “भूमिहार वोटरों पर भाजपा एकाधिकार समझती रही है, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस जाति के राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह को जदयू का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर पहले ही भाजपा को सेंध लगा रखी है। ताजा चुनाव में नीलाभ कुमार को टिकट देकर वीआईपी भाजपा के एकाधिकार की रही-सही कसर भी निकालना चाहेगी।” नीलाभ भूमिहार जाति से चार बार के विधायक रहे साधु शरण शाही के पोते हैं। ऐसे में सहनी का यह कार्ड भाजपा के लिए परेशानी तो जरूर खड़ी कर सकता है।   

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देखें...जदयू कैसे मजबूत, उसे किस तरह की सेंध का कैसा डर  
2015 के चुनाव में राजद-जदयू का साथ मिलने पर भी उसके प्रत्याशी मनोज कुशवाहा भाजपाई केदार प्रसाद गुप्ता से हार गए हों, लेकिन 2020 के चुनाव में जदयू-भाजपा गठबंधन के प्रत्याशी रहे केदार राजद के अनिल सहनी से हार गए थे। हार का अंतर कम था, लेकिन यह दिख गया कि राजद का अकेला जनाधार भी यहां ठीकठाक है। राजद विधायक के भ्रष्टाचार पर छिनी इस सीट पर इस बार जदयू ने अपना 2015 वाला प्रत्याशी उतारा है। 2015 में जदयू के सिंबल पर मनोज कुशवाहा भले हार गए हों, लेकिन इस बार उन्हें पिछली बार के राजद के अकेले वोट बैंक का भी साथ मिलने की उम्मीद है। राजद का पिछली बार का वोट अगर इस बार पूरी तरह से जदयू प्रत्याशी को मिला तो महागठबंधन सुखद परिणाम की उम्मीद कर सकता है। कुशवाहा के पक्ष में सबसे बड़ी बात यह है कि वह 2005 के दोनों चुनावों के साथ 2010 में भी इस सीट से जीत दर्ज कर चुके हैं। जीतन राम मांझी की सरकार में वह लघु जल-संसाधन मंत्री भी रह चुके हैं। फिलहाल इनके लिए परेशानी खड़ी हो रही है ओवैसी की पार्टी AIMIM के कारण।



ओवैसी की पार्टी ने यहां से गुलाम मुर्तजा अंसारी को उतार दिया है। अंसारी जिला परिषद सदस्य रह चुके हैं। पिछले दिनों हुए गोपालगंज सीट के उपचुनाव में AIMIM प्रत्याशी को 12 हजार से ज्यादा वोट आए थे, जबकि महागठबंधन ने यह सीट महज 1700 वोटों से गंवाई थी। मतलब साफ है कि महागठबंधन के वोट बैंक में सेंधमारी के लिए AIMIM बहुत बड़ा हथियार हो सकता है। ऐसा इसलिए भी कि इस सीट पर भूमिहार के बाद सबसे ज्यादा प्रभावी मुसलमान वोटर ही हैं। इनकी संख्या करीब 50 हजार बताई जाती है। यह वोट अगर AIMIM की ओर गया तो महागठबंधन के लिए मुश्किल तय है। बिहार की राजनीति और राजनीतिज्ञों पर बेबाक टिप्पणी करने वाले ऑक्सीजन मैन गौरव राय कहते हैं कि “महागठबंधन के लिए परेशानी का सबब VIP के भी प्रत्याशी हो सकते हैं, क्योंकि अनंत सिंह की पत्नी के राजद के टिकट पर मोकामा चुनाव जीतने के बाद पार्टी भूमिहार वोटरों पर अपना प्रभाव मान रही है, जबकि जदयू तो पहले से इस जाति विशेष पर दावेदारी समझ रहा है। ऐसे में VIP के भूमिहार प्रत्याशी महागठबंधन के दोनों प्रमुख दलों के लिए परेशानी का सबब हो सकते हैं।” 

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