Bihar Flood: गंगा और बाया नदी के बढ़ते जलस्तर से विद्यापतिनगर में संकट गहराया, गांवों में घुसा बाढ़ का पानी
Samastipur Flood: दियारा क्षेत्र के दर्जनों गांवों में लगी हरी मिर्च, मक्का, धान, जनेर और सब्जियों की फसलें पूरी तरह जलमग्न हो गई हैं। किसानों का कहना है कि उन्होंने कर्ज लेकर खेती की थी, लेकिन फसल तैयार होने से पहले ही पानी में समा गई, जिससे लाखों रुपये का नुकसान हुआ है।
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गंगा और उसकी सहायक बाया नदी के लगातार बढ़ते जलस्तर ने समस्तीपुर जिले के विद्यापतिनगर प्रखंड में बाढ़ का कहर मचा दिया है। चार पंचायतों के बारह वार्ड पूरी तरह जलमग्न हो चुके हैं। गांव, खेत और सड़कें पानी में डूबने से जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। तीन से चार फीट पानी सड़कों पर बह रहा है, जिससे आवागमन ठप हो गया है। सरकारी नावों के अभाव में लोग निजी, गैर-मानक नावों का सहारा लेकर अपनी जान बचाने की कोशिश कर रहे हैं।
गांवों में घुसा बाढ़ का पानी, पलायन को मजबूर लोग
शेरपुर, लोदियाही, मऊ दियारा, गोपालपुर दियारा, चमथा, दादा टोल, दानी टोल, सांझिल टोल और नील खेत टोला सहित कई गांव बाढ़ के पानी से पूरी तरह घिर गए हैं। हजारों लोग अपने घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन कर रहे हैं। बेगूसराय जिले के बछवाड़ा प्रखंड के कई किसान अपने मवेशियों के साथ चिनगिया बांध पर शरण ले चुके हैं। मऊ अखाड़ा घाट पर निर्माणाधीन पुल का पिलर भी जलमग्न हो गया है।
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खतरे के निशान से ऊपर बह रही गंगा, बांध पर बढ़ा दबाव
सरारी मोहनपुर में गंगा का जलस्तर 47.25 मीटर पहुंच गया है, जो खतरे के निशान से 1.75 मीटर ऊपर है। जलस्तर में लगातार बढ़ोतरी से चिनगिया बांध पर कई जगह दबाव बढ़ गया है। प्रशासन ने बांध पर भारी वाहनों के आवागमन पर रोक लगा दी है। उत्क्रमित मध्य विद्यालय मऊ दियारा में छह फीट पानी भर जाने से पढ़ाई बंद कर दी गई है और शिक्षकों को बीआरसी में योगदान देने का निर्देश दिया गया है।
पशुपालकों के सामने चारा संकट, खुले में रात गुजारने को मजबूर
बाढ़ पीड़ित पशुपालकों के लिए अपने मवेशियों को बचाना और उनके लिए चारा जुटाना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। खेतों में लगी हरी चारा फसलें डूब जाने से संकट गहरा गया है। सरकारी मदद के अभाव में पशुपालक तटबंधों, स्कूल परिसरों और सड़कों के किनारे खुले में रात बिताने को मजबूर हैं।
किसानों की फसलें बर्बाद, बढ़ा आर्थिक नुकसान
दियारा क्षेत्र के दर्जनों गांवों में लगी हरी मिर्च, मक्का, धान, जनेर और सब्जियों की फसलें पूरी तरह जलमग्न हो गई हैं। किसानों का कहना है कि उन्होंने कर्ज लेकर खेती की थी, लेकिन फसल तैयार होने से पहले ही पानी में समा गई, जिससे लाखों रुपये का नुकसान हुआ है। वे मुआवजे और राहत की मांग कर रहे हैं।
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सरकारी नावों की कमी, निजी नावों पर निर्भरता
प्रभावित लोगों का आरोप है कि सरकारी नावें उपलब्ध नहीं कराई गईं, जिससे उन्हें गैर-मानक निजी नावों का सहारा लेना पड़ रहा है। इन नावों से अस्थायी राहत जरूर मिल रही है, लेकिन जीवन और संपत्ति दोनों खतरे में हैं। कई लोग केले के थंब और चचरी नावों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
प्रशासन पर नाराजगी, राहत कार्य की मांग तेज
ग्रामीणों का कहना है कि अभी तक राहत शिविर, चारा वितरण और फसल नुकसान का सर्वे कार्य शुरू नहीं हुआ है। बाढ़ के बीच रहने-खाने, शौचालय, पशुचारा और आवागमन जैसी बुनियादी समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। अंचलाधिकारी कुमार हर्ष ने बताया कि प्रभावित क्षेत्रों के लिए 31 निबंधित नाव उपलब्ध हैं और वरीय अधिकारियों के निर्देश मिलते ही इन्हें परिचालन में लाया जाएगा। उन्होंने कहा कि नदियों के जलस्तर पर लगातार निगरानी रखी जा रही है।
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