शानदार जीत से दम तोड़ती कांग्रेस को भी मिली संजीवनी
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बिहार विधानसभा चुनावों में शानदार जीत के बाद बेशक हर तरफ लालू और नीतीश की जोड़ी की ही चर्चा हो लेकिन इस बड़ी जीत में एक भूमिका कांग्रेस पार्टी की भी है।
उस कांग्रेस की जिसे कुछ समय तक पहले दिग्गज से दिग्गज राजनीतिक विश्लेषक तक चुकी हुई मान चुके थे और बीते लोकसभा चुनावों में भाजपा के हाथों मिली करारी हार के बाद वह अपने जख्मों को सहलाने में ही लगी थी।
लेकिन इन चुनावों में न केवल कांग्रेस ने 27 सीटें जीतकर शानदार वापसी की बल्कि उन आलोचकों को भी करारा जवाब दे दिया जो उसे चुका हुआ मान रहे थे।
इस जीत ने कांग्रेस को न केवल बिहार में दोबारा खड़े होने की उम्मीदें जगा दी हैं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी निराशा के गर्त में डूब रही पार्टी को संजीवनी दे दी है।
बिहार चुनावों में कांग्रेस की जीत के क्या मायने हैं इसका अंदाजा जीत के बाद सामने आए राहुल गांधी के उत्साह और जोशीले अंदाज से ही लगाया जा सकता है। मीडिया से मुखातिब होते ही उन्होंने सवाल दागा कि ''बताइए आज क्या पूछना चाहते हैं आप।''
पिछले चुनावों में 243 सीटों पर लड़कर 4 पर मिली थी जीत
उनका ये बयान न केवल उनके उत्साह को जाहिर करता है बल्कि ये बताने के लिए भी काफी है कि बिहार की जीत को वो आगे ले जाने की तैयारी कर चुके हैं। 35 साल तक बिहार में एकतरफा राज करने वाली कांग्रेस की स्थिति बीते चुनाव में क्या हो चुकी थी इसका अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि पिछले चार चुनावों में वह दहाई के आंकड़े तक पहुंचने में जूझती रही थी।
साल 1995 में 29 सीटें जीतने वाली कांग्रेस 2000 के अगले चुनावों में घटकर 14 तक पहुंच गई। 2005 में चुनाव हुए तो कांग्रेस और बुरी स्थिति में पहुंच गई और उसकी सीटों की संख्या घटकर मात्र 9 सीटों पर ही रहा। हालांकि उस समय कांग्रेस ने गठबंधन के तहत मात्र 51 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। इसके बाद नवंबर 2010 में हुए चुनावों में कांग्रेस को पिछले चुनाव के मुकाबले 5 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा और वह महज 4 सीटों पर ही सिमट कर रह गई।
जीत के बाद जोश से उत्साहित दिखे राहुल गांधी
लालू यादव से गठबंधन तोड़कर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला राहुल गांधी ने ही लिया था जो एक साल पहले ही लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की शानदार जीत के बाद इस दंभ में भर गए थे कि लालू को कोई भाव नहीं दिया।
उन्हीं राहुल गांधी ने इस बार समय रहते समझदारी भरा फैसला लिया और इस बार गठबंधन में लड़ने में कोई परहेज नहीं किया। हालांकि इस बार कांग्रेस की जीत पूरी तरह चौंकाने वाली रही क्योंकि गठबंधन में सीटों के बंटवारे के दौरान जब उसे 43 सीटें मिलने की घोषणा हुई तो कई राजनीतिक पंडितों की भौंहें चढ़ गई थी।
उन्हें कहीं से कहीं तक उम्मीद नहीं थी कि कांग्रेस दोबारा इस राज्य में सांस भर पाएगी। लेकिन बिहार के परिणामों ने न केवल कांग्रेस को नया जीवन दान दे दिया बल्कि भाजपा के लिए खतरे की घंटी बजा दी है।