Bihar News: पुनपुन घाट पर पिंडदान नहीं करने दे रहे पंडे, गोदावरी सरोवर में पित्तरों को दिला रहे प्रथम पिंड
सर्व विदित है कि पित्तरों के लिए मोक्षदायिनी पितृपक्ष में अंतरराष्ट्रीय धर्म नगरी गया में श्राद्ध तर्पण के पूर्व पुराणों में आदि गंगा के रूप में वर्णित पुनपुन नदी में प्रथम पिंडदान करने का विधान सदियों से चला आ रहा है। पुराणों में पुनपुन नदी को गया श्राद्ध तर्पण का प्रवेश द्वार भी कहा गया गया है।
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पुनपुन नदी में पित्तरों को प्रथम पिंड किया गया श्राद्ध अपूर्ण माना जाता है और पित्रगण इसे स्वीकार नहीं करते हैं। यही वजह है कि गया श्राद्ध करने के पहले श्रद्धालु पित्तरों को पुनपुन नदी में प्रथम पिंडदान किया करते हैं। हालांकि, पुनपुन नदी के घाटों पर कहीं भी गया जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं है। इसी वजह से बाहरी पिंडदानी सीधे गया चले आते हैं। गया में जब श्रद्धालु वहां के पंडे-पुरोहितों से पुनपुन नदी में प्रथम पिंडदान की बात करते हैं, तो वे उन्हें पूरक विधान से गोदावरी सरोवर में यह कहकर पूरक विधान से प्रथम पिंड दिला देते हैं कि इस सरोवर में पिंडदान करना पुनपुन के ही समान फलदायी है।
इस तरह से गया के पंडे पिंडदानियों को तो संतुष्ट करा देते हैं, लेकिन पौराणिक, धार्मिक और आध्यात्मिक द्वष्टिकोण से गया श्राद्ध अपूर्ण रह जाता है। साथ ही ऐसा कराए जाने से पुनपुन नदी के घाटों पर प्रथम पिंडदान कराने वाले स्थानीय पंडे-पुरोहितों का हक मारा जाता है। इस कारण स्थानीय पंडों में गया के पंडों के प्रति अच्छा खासा रोष भी है। पुनपुन नदी में प्रथम पिंडदान करने के बाद ही गया जाकर श्राद्ध तर्पण करने का पौराणिक विधान-पुराणों में पुनपुन नदी में स्नान कर प्रथम पिंडदान करने के विधान की चर्चा है।
मान्यता के अनुसार, पित्तरों का अंर्तराष्ट्रीय धर्म नगरी गया में श्राद्ध तर्पण और पिंडदान करने से पहले पुनपुन नदी में पिंडदान करना जरूरी होता है। पुनपुन नदी में पिंडदान करने के बाद ही गया में पिंडदान को संपन्न माना जाता है। पुनपुन नदी में पिंडदान की महता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि त्रेता युग में मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम ने अपने पिता को प्रथम पिंड पुनपुन नदी के औरंगाबाद स्थित जम्होर घाट पर दिया था। इसके बाद वें पिता का श्राद्ध करने गया गए थे। जहां पिंडदान का शुभ मुहुर्त निकल जाने की स्थिति बनते देख उनकी पत्नी सीता ने राम के बदले में अपने ससुर महाराज दशरथ के लिए पिंडदान किया था।
21 कुलों का उद्धार की बात बताकर पुनपुन के बदले गोदावरी सरोवर में पूरक विधान से प्रथम पिंड दिलाते हैं गया के पंडे
अक्सर या कई बार ऐसा होता है कि पुनपुन नदी के घाटों पर प्रथम पिंडदान करने आने की सीधी और सुगम यात्री सुविधा नहीं होने के कारण बाहरी पिंडदानी सीधे-सीधे गया चले आते है। यहां उनका सामना गया के पंडों से होता है। इन पंडों से जब पिंडदानी पुनपुन नदी में चलकर प्रथम पिंडदान कराने की बात करते हैं तो पंडें उन्हें पूरक विधान का हवाला देकर भरमा डालते हैं। गया के पंडे उन्हें गोदावरी सरोवर में पिंडदान करा देते हैं।
बिहार के औरंगाबाद में हैं पुनपुन नदी का उद्गम स्थल
पुराणों में आदि गंगा के रूप में वर्णित पुनपुन नदी का उद्गम स्थल बिहार के औरंगाबाद जिले में अविस्थत है। यह नदी गंगा की एक उप नदी है, जो झारखंड के पलामू जिले के छोटा नागपुर के पठार के एक खोहनुमा स्थान से औरंगाबाद के नबीनगर प्रखंड में टंडवा के पास से निकली है। यह नदी औरंगाबाद, गया और पटना जिले से गुजरती हुई फतुहा में गंगा नदी में विलीन हो जाती है।
औरंगाबाद, गया और पटना में पुनपुन नदी के घाटों पर दिया जाता है, पित्तरों को प्रथम पिंड
पितृपक्ष में गया श्राद्ध तर्पण के पूर्व पुनपुन नदी में सर्वप्रथम पिंडदान की महिमा और महत्ता जगजाहिर है। लेकिन इन जिलों में स्थानीय घाटों पर सरकारी सुविधा उपलब्ध नहीं है। इस वजह से स्थानीय पिंडदानी अपने इलाके में स्थित पुनपुन नदी के घाटों पर प्रथम पिंडदान कर ही पित्तरों को श्राद्ध तर्पण के लिए गया जाते हैं।
औरंगाबाद में पुनपुन नदी का सिरिस और जम्होर घाट महत्वपूर्ण
बिहार के औरंगाबाद में पुनपुन नदी के सिरिस और जम्होर घाट महत्वपूर्ण हैं। पुनपुन नदी का सिरिस घाट ऐतिहासिक शेरशाह सूरी पथ और वर्तमान ग्रैंड ट्रंक रोड (जीटी रोड) यानी राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-19 पर स्थित है। एनएच-19 अभी फोर लेन सड़क है, जिसकी सिक्स लेनिंग का काम चल रहा है। इस लिहाज से सड़क मार्ग से आने वाले पिंडदानियों के लिए सिरिस घाट आना सुगम है। हालांकि, जानकारी, सुविधाओं और प्रचार प्रसार के अभाव में यहां भी पिंडदानी कम ही आते हैं और सड़क मार्ग से वे भी सीधे गया चले जाते हैं। इसी प्रकार जम्होर घाट ग्रैंड कॉर्ड रेल लाइन पर स्थित है और इसे इस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के रूप में विकसित किया जा रहा है, जो पंजाब में साहनेवाल (लुधियाना) से शुरू होकर हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के पश्चिम बंगाल में अंतिम स्टेशन डानकुनी तक जा रही है। यहां जम्होर घाट के पास ही पुनपुन नदी के तट पर अनुग्रह नारायण रोड घाट स्टेशन है, जो सिर्फ पितृपक्ष में ही 15 दिनों के लिए आबाद रहता है।
इस स्टेशन पर इस बार के पितृपक्ष में रेलवे ने आठ जोड़ी एक्सप्रेस और चार जोड़ी पैसेंजर ट्रेनों के अस्थाई ठहराव की व्यवस्था कर रखी है। इसके बावजूद यहां भी जानकारी, सुविधाओं और प्रचार प्रसार के अभाव वाली बात लागू होती है। इस कारण यहां भी बाहरी पिंडदानी कम ही आते हैं और वे भी सीधे गया ही चले जाते हैं। हालांकि, जम्होर घाट की खास महता इस कारण भी है कि यहां त्रेता युग में प्रभु श्रीराम ने अपने पिता महाराज दशरथ को प्रथम पिंड दिया था। जो पिंडदानी इस बात को जानते हैं, वे हर हाल में यह सोंचकर जम्होर घाट जरूर आते हैं कि जिस घाट पर भगवान राम ने अपने पिता को प्रथम पिंड दिया था, उसी घाट पर वे भी अपने पूर्वजों को पिंडदान करेंगे।
गया में पर्यटन विभाग पुनपुन नदी की महत्ता की जानकारी देने का कर दे बेहतर प्रबंध तो बिहार में आबाद हो जाएंगा पुनपुन नदी का हर एक घाट
गया श्राद्ध तर्पण की प्रथम वेदी पुनपुन नदी के घाटों को आबाद करने और कायाकल्प के लिए पर्यटन विभाग के स्तर से पहल जरूरी है। यदि पर्यटन विभाग गया और अन्य महत्वपूर्ण स्थलों पर पुनपुन नदी की महिमा के व्यापक प्रचार-प्रसार और जानकारी देने का बेहतर प्रबंध कर दे तो औरंगाबाद से लेकर पटना तक पुनपुन नदी का हर घाट आबाद हो जाएगा। इन घाटों का कायाकल्प भी हो जाएगा। पितृपक्ष में श्रद्धालुओं के आने से पुनपुन नदी के हर एक घाट 15 दिनों के लिए विशेष तीर्थ सरीखे हो जाएंगे। ऐसा होने से इन घाटों पर स्थानीय पंडे-पुरोहितों को बेहतर मौसमी रोजगार मिल सकेगा। साथ ही प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी उपलब्ध हो सकेंगे।
पुनपुन नदी के स्थानीय घाटों के पंडों में गया के पंडों के प्रति गहरा आक्रोश
गया में ही पूरक विधान के नाम पर प्रथम पिंडदान के लिए बाहरी श्रद्धालुओं को पुनपुन नदी के घाटों पर जाने से रोक दिए जाने से स्थानीय पंडों में गया के पंडों के प्रति गहरा आक्रोश है। औरंगाबाद के जम्होर घाट पर पिंडदान कराने वाले पंडित कुंदन पाठक कहते हैं कि पुनपुन नदी के पौराणिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण होने के बावजूद यहां बाहरी पिंडदानियों के नहीं आने का सीधा असर उनके पुरोहित्य व्यवसाय पर पड़ रहा है। इक्का-दुक्का ही बाहरी पिंडदानी यहां आ रहे हैं। सिर्फ स्थानीय श्रद्धालुगण ही पुनपुन नदी के घाटों पर पित्तरों को प्रथम पिंडदान करने आ रहे हैं। इस कारण पिंडदान कराने के पुरोहित्य पेशे से उन्हें उम्मीद के अनुरूप आमदनी नहीं हो पा रही है।
उन्होंने कहा कि वे गया के पंडों से इसे लेकर लड़ नहीं सकते हैं। क्योकि वे भी हमारे ही भाई-बंधु, परिजन और रिश्तेदार हैं। हां हम उनसे विनम्र निवेदन जरूर करते हैं। हमारा उनसे निवेदन है कि बाहरी श्रद्धालुओं को पूरक विधान के नाम पर न भटकाएं। पौराणिक और धार्मिक रूप से पूरक विधान की कोई महत्ता नहीं है। ऐसा करा देने से हमारे गया वाले बंधुओं को तो फायदा हो जा रहा है, लेकिन धार्मिक दृष्टिकोण से गया श्राद्ध तर्पण अपूर्ण रह जा रहा है। यह पिंडदानियों के साथ छ्ल करने के समान है। विनम्र निवेदन है कि यह सब न किया जाए।
पिंडदानियों को पुनपुन नदी के घाटों पर आने दीजिए, ताकि आपका भी भला हो और हमारा भी भला हो। हमारे भी बाल-बच्चे और परिवार हैं। हमारे कल्याण की भी सोचिए। अपने कल्याण के साथ हमारा भी कल्याण कीजिए, क्योंकि हम तो अपना कर्तव्य निभाते हैं। पुनपुन नदी में प्रथम पिंडदान कराने के बाद श्रद्धालुओं को गया भेजते हैं। साथ भी गया जाकर वहां के अपने संपर्की पंडे-पुरोहितों से अपने यजमान को पित्तरों को पिंडदान कराने में सहयोग करते हैं। दोनों ओर से सहयोग की जरूरत है। ऐसा करने से आपका भी भला होगा और हमारा भी भला होगा।
कुंदन पाठक यह भी कहते हैं कि सरकार से भी उनकी उम्मीदें हैं। सरकार पुनपुन नदी के घाटों को विकसित करे। श्रद्धालुओं के लिए आवश्यक आधारभूत संरचनाओं का प्रबंध हो। साथ ही पुनपुन नदी की महिमा का व्यापक रूप से प्रचार-प्रसार भी हो। यह सब होने पर वे सरकार और गया के पंडों के भी आभारी होंगे।