Mid Day Meal : खतरनाक रसायन वाला रंग और खराब क्वालिटी की नमक से बन रहा था मध्याह्न भोजन; रिपोर्ट से खुला खेल
Bihar News : मेटानील येलो कलर स्वास्थ्य के लिए खतरनाक माना जाता है। भोजन में नमक का पीपीएम मात्रा 15 की जगह मात्र 5.3 होना भी क्वालिटी से समझौता है। सरकारी विद्यालयों में एक NGO के जरिए सप्लाई हो रहे मध्याह्न भोजन में इसकी अनदेखी का खुलासा हुआ है।
विस्तार
बीते वर्ष अगस्त माह में फूड एवं सेफ्टी डिपोर्टमेंट ने खगड़िया में बच्चों को मध्याह्न भोजन (एमडीएम) परोसने वाले एनजीओ पूर्वांचल समाज सेवा संघ की जांच की थी। इसमें पाया गया था कि मध्याह्न भोजन जो खाना बच्चों को दिया जा रहा है वह जहरीला है। फूड सेफ्टी डिपार्टमेंट की जांच रिपोर्ट में जो बात सामने आई थी उसके अनुसार बच्चों के खाने में जो मेटानील येलो कलर का इस्तेमाल हुआ है, वह स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। इतना ही नहीं जांच में पाया गया था कि भोजन में नमक का पीपीएम मात्रा 15 की जगह मात्र 5.3 है। फूड एवं सेफ्टी विभाग ने ये सारा रिपोर्ट खगड़िया के शिक्षा विभाग को देने के अलावे अपने पत्रांक 96 30 अक्टूबर 2024 द्वारा फूड कमिश्नर सह सचिव बिहार और पत्रांक 97 दिनांक 30 अक्टूबर 2024 द्वारा अपर समाहर्ता सह न्याय निर्णायक पदाधिकारी खगड़िया को सौंपा था। बावजूद इसके बच्चों को जहरीले भोजन परोसने वाले एनजीओ पूर्वांचल समाज सेवा संस्थान पर कार्रवाई नहीं की गई। वर्तमान में भी इस एनजीओ के द्वारा सरकारी विद्यालय में एमडीएम वितरण किया जा रहा है। यानी शिक्षा विभाग के एमडीएम डीपीओ की मेहरबानी से बच्चों को जांच के बाद भी ऐसे भोजन मुहैया कराए जा रहे हैं, जो बच्चों को मानसिक और शारीरिक रुप से बीमार करने के लिए काफी है।
कार्रवाई नहीं कर दी गई छूट
गौरतलब है कि इस मामले में खगड़िया शिक्षा विभाग ने तमाम बातों को दबाकर एमडीएम परोसने वाले एनजीओ को छूट दे रखा है। तमाम तथ्य सामने आने के बाद भी उसपर आजतक न तो कार्रवाई की गई है, न ही उसके भोजन को विद्यालय के लिए बंद किया गया है। ऐसे में समझा जा सकता है कि एमडीएम डीपीओ उस एनजीओ पर कितना मेहरबान हैं। अमर उजाला ने जब इस मामले में एमडीएम डीपीओ निशित प्रणीत सिंह से बात की तो उन्होंने बताया कि फूड सेफ्टी डिपार्टमेंट की कोई रिपोर्ट उनके पास नहीं है। उनको इसकी सूचना मीडिया के द्वारा मिली थी। जब उनसे सवाल किया गया कि चार माह पहले जब जांच हुई और दो माह पहले खुलासा हुआ तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं की गई तो उन्होंने इस सवाल से पल्ला झारते हुए कहा कि वह तभी कार्रवाई करते हैं जब विभाग द्वारा उनको निर्देश दिया जाता है। मतलब, जबतक निर्देश नहीं मिला तबतक एनजीओ को जहरीले भोजन परोसने की छूट दे दी गई।
बाल संरक्षण इकाई ने स्वत: लिया संज्ञान
इस मामले में दो माह पहले मीडिया में चर्चा होने के बाद बाल संरक्षण इकाई बिहार ने स्वत: संज्ञान लिया है। जिसके द्वारा एमडीएम निदेशक पटना से पूरे मामले में जांच रिपोर्ट तलब की गई है। जिसके बाद एमडीएम निदेशक ने खगड़िया एमडीएम डिपोओ से पूरे मामले की जानकारी मांगी है। इधर, बाल संरक्षण इकाई के डंडे और निदेशक के पत्र के बाद एमडीएम डीपीओके द्वारा आननफानन में फूड एंड सेफ्टी डिपार्टमेंट से पूरे मामले की जानकारी मांगी गई है। इस मामले में डीपीओ को दो माह पहले ही मामला संज्ञान में आने के बाद एनजीओ से भोजन बच्चों को मुहैया कराना बंद कर देना चाहिए था।
पटना के लैब में कराई गई थी जांच
बेगूसराय सह खगड़िया जिले के खाद्य संरक्षा अधिकारी ने अपर समाहर्ता सह न्याय निर्णायक पदाधिकारी खगड़िया को अभियोजन वाद चलाने के लिए बीते वर्ष अक्टूबर माह में पत्र लिखा था। लेकिन, एनजीओ ने अपनी पहुंच की बदौलत न सिर्फ इसे दबाए रखा, बल्कि एक अगस्त 2024 को जांच रिपोर्ट आने के बाद 24 सितंबर 2024 को लाइसेंस रिनुअल करा लिया। यह संस्था नई दिल्ली व बिहार के खगड़िया और बांका में एमडीएम कार्य के लिए रजिस्टर्ड है। गौरतलब है कि फूड एंड सेफ्टी डिपार्टमेंट ने एनजीओ के रसोई घर से सैंपल लेने के बाद उसे पटना के अगमकुआं स्थित फूड एवं ड्रग्स लैब भेजा था। जहां विशेषज्ञ महेंद्र प्रताप सिंह ने उसकी जांच की थी। अपने रिपोर्ट में उन्होंने जिक्र किया है कि खिचड़ी में मेटानील (Metanil yellow colour) पाया गया। यह मानव के लिए खतरनाक है। इसके अलावा भोजन में नमक और अन्य जरूरी तत्व की भी कमी पाई गई है।
इनपुट- अभिजीत सिन्हा, खगड़िया