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बिहार का एक बैंक जहां कर्ज में मिलता है अनाज

Wed, 08 Jul 2015 08:51 PM IST
Updated Wed, 08 Jul 2015 08:51 PM IST
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bihar: Bank of Grain

बिहार की राजधानी पटना से सटे सुंदरपुर की गहनी मांझी को अब पेट भर भात खाने को मिल जाता है। जवानी की न जाने कितनी रातें खाली पेट गुजारने के बाद बुढ़ापे में उन्हें पेट भर खाना नसीब हो रहा है। गहनी का भाग्य अनाज बैंक की वजह से ही जागा है।

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अनाज बैंक यानी वह बैंक जहां अनाज का लेन देन होता है। इस बैंक से अनाज उधार लिया जा सकता है और यहां अनाज जमा भी कराया जा सकता है। यहां पांच किलो अनाज उधार लेने पर छह किलो अनाज जमा कराना होता है।
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पेट भर भात का सुख
गहनी कहती हैं, “ अगर ई बैंक नहीं होता, तो खाने को नहीं मिल पाता। पति को रोजाना बस डेढ़ किलो चावल ही मज़दूरी मिलती है। उसमें कुछ खाते हैं, कुछ अनाज देकर बदले में तेल, मसाला, नमक, कपड़ा वगैरह लाते हैं।” अनाज बैंक की शुरुआत साल 2005 में हुई।
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ग़ैर सरकारी संस्था ‘एक्शन एड’ ने स्थानीय संस्था ‘प्रगति ग्रामीण विकास समिति’ की मदद से पटना से सटे 60 गांवों में अनाज बैंक खोला था। बैंक खोलने के लिए हर गांव को पांच हज़ार रुपए अनाज और अनाज रखने लायक ड्रम खरीदने के लिए 2,500 रुपए नकद दिए गए थे।

महिलाएं ही चलाती हैं बैंक

bihar: Bank of Grain

बैंक चलाने के लिए गांव के महादलित टोलों में समूह बनाए गए। इन समूहों को चलाने की ज़िम्मेदारी पांच महिलाओं को दी गई। अनाज का पहला स्टॉक बतौर कर्ज़ बांटा गया। इसके साथ ही 5 किलो अनाज कर्ज़ पर 6 किलो अनाज लौटाने का नियम भी बनाया गया। सुंदरपुर के मुसहरटोली की गहनी के पति बंधुआ मजदूर हैं। उन्होंने 11 साल पहले महाजन से 7,000 रुपए कर्ज़ लिए थे।

ग़ुलामी से छुटकारा
इस कर्ज़ को चुकाने के लिए वे बीते दस साल से रोज़ाना डेढ़ किलो चावल की मज़दूरी पर महाजन के खेत में 12 घंटे काम करने को मजबूर थे। गहनी और उसके पति के लिए अनाज बैंक बड़ा सहारा बनकर आया है।

गहनी और उस जैसे दूसरे लोगों के जीवन यापन का एक मात्र सहारा खेतों में मज़दूरी है। फसल की कटनी और रोपनी के बीच इनके पास कोई काम नहीं रहता। इस वक्त ये लोग दाने -दाने को मोहताज हो जाते हैं।

‘डेउढ़िया’ बंद हुआ

bihar: Bank of Grain

महजपुरा की शांति देवी कहती हैं, “अभी हमारे पास कोई काम नहीं है, तो हाथ में पैसे भी नहीं हैं। ऐसे में हम अनाज बैंक से चावल ले लेते है, कटनी होने पर अनाज वापस कर देते हैं।” अनाज बैंक खुलने से पहले इन गांवों में ‘डेउढ़िया’ चलता था।

इसके तहत अनाज लेने के बाद महाजन को उसका डेढ़ गुना अनाज वापस करना होता था। अनाज वापस नहीं करने की सूरत में महाजन के खेत में काम करना पड़ना था।

अनाज बैंक से ‘डेउढ़िया’ तो बंद हुआ ही, गांव की सामाजिक और जातिगत बुनावट को भी चुनौती मिली। महम्मदपुर की कलावती देवी कहती है, “जब काम नहीं मिलता था तो भूख से हमारे पांव लड़खड़ाते थे, हमें बड़े किसानों पर निर्भर होना ही पड़ता था।

अब ऐसा नहीं है, तो इन बड़े किसानों को परेशानी होती है। अब हम उनसे आंख मिलाकर बात कर सकते हैं। हमने लड़ कर दिहाड़ी भी 100 रुपए से 250 रुपए करवा ली है।”

दिहाड़ी बढ़ी

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‘एक्शन एड’ ने साल 2013 में ही मदद बंद कर दी, पर अब उसकी ज़रूरत नही नहीं है। महिलाएं बिना किसी बाहरी मदद के अनाज बैंक चला रही हैं। इस बैंक से अलग-अलग टोलों की 3,000 महिलाएं जुड़ी हैं।

अनाज के भंडारण, कर्ज़, उसका हिसाब किताब रखना, ये सारी ज़िम्मेदारी महिलाओं की ही है। इन अनपढ़ महिलाओं ने बैंक से जुड़ने के बाद पढ़ना लिखना भी सीख लिया।

सामाजिक समीकरण को चुनौती
प्रगति ग्रामीण विकास समिति के उमेश कुमार बताते हैं, “जब हमने काम शुरू किया, हमें पता चला कि 90 फ़ीसदी परिवार बड़े किसानों की ग़ुलामी करते हैं। किसान इनसे मनमानी मज़दूरी पर काम करवाते हैं, जब उनका काम होगा, आप कहीं नहीं जा सकते।

अनाज बैंक खुलने के बाद इसमें बहुत हद तक कमी आई है।” इस बदलाव से इन टोलों के पुरुष भी बहुत खुश हैं। मुहम्मदपुर के सकरात कहते हैं, “पहले लगता था जैसे काम करते रह जाएगें, लेकिन कभी पेट भर खाने को नहीं मिलेगा। अब हालात बदल गए है। पेट भर भात खाने को तो मिल ही जाता है।”

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