लालू ने क्यों टेके नीतीश के आगे घुटने, जानिए वो पांच कारण?
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बिहार में लंबे समय तक चली तकरार के बाद आखिर जनता दल और जनता दल यूनाइटेड में गठबंधन पर सहमति बन ही गई। लेकिन यह भी जानना जरूरी है कि क्या यह सब इतनी आसानी से संभव हो पाया जितना माना जा रहा है।
कैसे नीतीश को मुख्यमंत्री पद देने के सबसे बड़े विरोधी लालू यादव उनके नाम पर तैयार हो गए। क्या मुलायम सिंह के कहने या समझाने भर से ही लालू ने अपना मूड बदल लिया। शायद इससे अलग और भी बहुत कुछ है जो लालू को 'जहर पीकर' भी नीतीश के नाम पर तैयार कर गया।
जानिए ऐसे ही पांच कारणों के बारे में जिसके चलते लालू ने बिहार में खुद वो सबसे बड़ा 'त्याग' कर दिया जिसके लिए वो दूसरों को तैयार रहने की नसीहत दे रहे थे।
खुद चुनाव न लड़ पाने की मजबूरी
बिहार चुनाव में नीतीश के साथ गठबंधन करके उनके लिए मुख्यमंत्री पद छोड़ने की लालू की सबसे बड़ी मजबूरी तो ये ही है कि वो खुद चुनाव नहीं लड़ सकते हैं। ऐसे में वो चाहकर भी दोबारा बिहार के मुख्यमंत्री नहीं बन सकते।
यह बात उन्होंने मुलायम सिंह के साथ प्रेस कान्फ्रेंस में खुद भी स्वीकार की। कहा न तो उनके परिवार में और न पार्टी में कोई ऐसा व्यक्ति है जो सीएम उम्मीदवार हो सके तो फिर दावेदारी करने का क्या फायदा। इस मजबूरी ने भी लालू को कदम पीछे खींचने पर मजबूर कर दिया।
गठबंधन से अलग-थलग पड़ने का डर
दूसरी दिक्कत ये थी कि लालू अगर नीतीश को समर्थन न करते तो गठबंधन होना भी मुश्किल था। ऐसे में लालू की सबसे बड़ी दिक्कत ये थी कि बिहार चुनाव में अभी तक उन्हें समर्थन करती रही कांग्रेस पहले ही नीतीश के साथ जाने की घोषणा कर चुकी है।
इसका नुकसान लालू जानते थे, क्योंकि इस स्थिति में उन्हें सिर्फ मुलायम सिंह की सपा का ही समर्थन मिल पाता, जिसका बिहार में कोई जनाधार नहीं है। ऐसे में उन्हें चुनिंदा सीटों पर संतोष करना पड़ता और वो न इधर के रहते न उधर के।
अलग-अलग लड़ने पर भाजपा की जीत का डर
बिहार में नीतीश से अलग होकर लड़ने का एक बड़ा डर ये भी था कि सभी अलग-अलग लड़ते तो इसका फायदा भाजपा उठा सकती थी। चुनाव पूर्व के सर्वेक्षणों में भी भाजपा के सबसे बड़ी पार्टी बनने की संभावना जताई जा रही है। ऐसे में ये भी तय था कि भाजपा जैसे तैसे सरकार बनाने में भी सफल हो सकती थी।
अगर ऐसा होता तो लालू की राजनीति हाशिये पर चली जाती। जबकि लालू की पूरी राजनीति ही भाजपा विरोध पर टिकी हुई है। नीतीश को समर्थन देने के नाम पर भी लालू ने यही बात दोहराई। लालू ऐसे में कभी नहीं चाहेंगे कि उनके किसी कदम का फायदा भाजपा को मिले।
नीतीश मुख्यमंत्री बने तो भी लालू होंगे किंगमेकर
दूसरी ओर बिहार में नीतीश की जीत में भी लालू अपना हित देखकर चल रहे हैँ। नीतीश अगर जीतकर दोबारा सरकार बनाते हैं तो ये भी तय है कि जनता परिवार के विलय की राह आसान हो जाएगी। ऐसे में नीतीश के बाद लालू ही किंगमेकर की भूमिका में रहेंगे।
क्योंकि जनता परिवार में भी मुलायम के बाद लालू को दूसरा बड़ा नेता माना जा रहा है। दूसरे, सरकार अपनी होगी तो लालू को डेढ़ दशक बाद राज्य की राजनीति में मुख्य भूमिका और सत्ता सुख भी मिल सकता है।
खेला बड़ा दावं, राजद की सीटें ज्यादा आईं तो फिर कर सकते हैं दावेदारी
नीतीश को समर्थन कर लालू ने एक बड़ा दावं भी खेल दिया है। असल में लालू ये भी मानकर चल रहे हैं कि चुनावों में उनकी पार्टी जेडीयू के मुकाबले ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज कर सकती है।
लोकसभा चुनावों में भी ऐसा ही देखने को मिला था जहां नीतीश के मात्र दो सांसद जीत पाए थे वहीं लालू अपने चार सांसदों को जिताने में सफल रहे थे। कुछ न्यूज चैनलों के सर्वेक्षणों में भी इस बात के संकेत दिखने लगे हैं कि लालू यादव के राजद को जेडीयू के मुकाबले ज्यादा सीटें मिल सकती हैं।
ऐसे में पूरी संभावना है कि ज्यादा सीटें आते ही लालू नीतीश को दरकिनार कर मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी पार्टी की दोवदारी ठोंक दें। उस स्थिति में नीतीश कुमार और उनकी पार्टी के पास भी कम ही विकल्प रह जाएंगे। लालू अपनी पत्नी राबड़ी देवी या पुत्री मीसा भारती को भी आगे कर सकते हैं। और मुलायम का समर्थन तो है ही।