फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Bihar ›   48 Year Old Bribery Case Closed Police Negligence Special Vigilance Court

बिहार: 200 रुपये की रिश्वत का 48 साल पुराना मामला आखिर बंद, पुलिस की नींद ही नहीं खुली

Mon, 02 Nov 2026 10:15 AM IST
प्रतीक कुमार पाण्डेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुजफ्फरपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुजफ्फरपुर Published by: प्रतीक कुमार पाण्डेय Updated Mon, 02 Nov 2026 10:15 AM IST
सार

बिहार में विशेष निगरानी कोर्ट ने बंदूक के लाइसेंस के सत्यापन के बदले 200 रुपये रिश्वत मांगने से जुड़े 48 साल पुराने मामले का निष्पादन कर दिया है। अदालत ने पाया कि इतने लंबे समय में पुलिस ने न तो प्रगति प्रतिवेदन दिया और न ही आरोप पत्र दाखिल किया। केस के कई पुराने दस्तावेज भी जीर्णशीर्ण हो चुके हैं। हालांकि, मूल फाइल को अगले 10 साल तक सुरक्षित रखने का आदेश दिया गया है।

विज्ञापन
48 Year Old Bribery Case Closed Police Negligence Special Vigilance Court
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

विशेष निगरानी कोर्ट ने बंदूक के लाइसेंस के बदले 200 रुपये रिश्वत मांगने से संबंधित 48 साल पुराने एक केस को पुलिस की ढिलाई और लापरवाही के कारण बंद कर दिया है। करीब पांच दशक बीत जाने के बाद भी अनुसंधान अधिकारी ने अदालत में प्रगति प्रतिवेदन, अंतिम प्रपत्र अथवा आरोप पत्र दाखिल नहीं किया। पुलिस महकमे और अभियोजन पक्ष की इस लंबी निष्क्रियता व लचर कार्यप्रणाली को देखते हुए अदालत ने आखिरकार इस मामले का निष्पादन कर दिया।
विज्ञापन


रिश्वतखोरी का 48 साल पुराना मामला
यह पूरा घटनाक्रम वर्ष 1978 का है। पारू थाना क्षेत्र के गोपालपुर गांव के रहने वाले अवधेश प्रसाद सिंह ने बंदूक के लाइसेंस के लिए आवेदन दिया था। आवेदन पत्रों के सत्यापन का काम पारू थाने के तत्कालीन थानाप्रभारी बच्चा सिंह को सौंपा गया था। आरोप के मुताबिक, थानाप्रभारी ने लाइसेंस सत्यापन के एवज में आवेदक से 200 रुपये की रिश्वत मांगी। इसके विरोध में अवधेश प्रसाद सिंह ने आठ जून 1978 को निगरानी में मामला दर्ज कराया था। इस प्रकरण की विस्तृत जांच की जिम्मेदारी पुलिस निरीक्षक आरके सिंह को दी गई थी।
विज्ञापन


जांच की सुस्त रफतार, लगातार लापरवाही
केस दर्ज होने के बाद जांच प्रक्रिया बेहद सुस्त बनी रही। जांच अधिकारी ने लगभग पांच दशक लंबा समय बीतने के बाद भी कोर्ट के सामने कोई रिपोर्ट पेश नहीं की। अदालत विभिन्न तिथियों पर लगातार सुनवाई करती रही और जांच अधिकारी को आरोप पत्र जमा करने के निर्देश देती रही। इसके लिए कई बार स्मरण पत्र भी जारी किए गए। कोर्ट ने अंतिम बार इसी साल नौ अक्तूबर  को रिमाइंडर भेजा था। इसके बाद भी पुलिस अधिकारियों की नींद नहीं खुली और न ही जांच पूरी करके अदालत के समक्ष आरोप पत्र पेश किया गया।
विज्ञापन
विज्ञापन


जीर्णशीर्ण दस्तावेज और कोर्ट का आदेश
अदालत ने सुनवाई के दौरान पाया कि केस दर्ज होने के बाद से लगातार निर्देश दिए जाने के बावजूद पुलिस और अभियोजन पक्ष ने कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया। लंबे समय तक पेंडिंग रहने के कारण केस से जुड़े अभिलेख के मुख्य पन्ने जीर्णशीर्ण अवस्था में पहुंच गए हैं, जो अब पढ़ने योग्य भी नहीं रहे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस पदाधिकारियों की कार्यशैली को देखते हुए निकट भविष्य में इस मामले में किसी ठोस कार्रवाई की उम्मीद नहीं बची है।


दस साल मूल फाइल अब भी रहेगी सुरक्षित
तथ्यों का अवलोकन करने के बाद कोर्ट ने निर्देश दिया कि भविष्य में यदि संबंधित थाने की ओर से कोई नया साक्ष्य या तथ्य आता है, तो तत्कालीन न्यायालय आगे की कानूनी कार्रवाई कर सकेगा। इसके साथ ही अदालत ने मूल फाइल को अगले 10 वर्षों तक किसी भी हाल में नष्ट न करने की सख्त हिदायत के साथ रिकॉर्ड रूम में सुरक्षित रखने का आदेश दिया।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed