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Polluting Vehicles: ये देश बन सकते हैं प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों के लिए डंपिंग ग्राउंड, भारत पर भी है खतरा

Mon, 20 Nov 2023 04:49 PM IST
अमर शर्मा ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अमर शर्मा Updated Mon, 20 Nov 2023 04:49 PM IST
सार

दुनिया के कई हिस्सों में स्वच्छ-ईंधन और ऑल-इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर कदम बढ़ाया जा रहा है। लेकिन उन इलाकों में जहां इन्हें या तो अपनाया नहीं जा रहा है या इसे अपनाने की रफ्तार बेहद धीमी है, संभावित रूप से एक अलग तरह की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।

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vehicles polluting air pollution These Parts of world may potentially face challenge of different kind
Car Emissions - फोटो : Social Media

विस्तार

दुनिया के कई हिस्सों में स्वच्छ-ईंधन और ऑल-इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर कदम बढ़ाया जा रहा है। लेकिन उन इलाकों में जहां इन्हें या तो अपनाया नहीं जा रहा है या इसे अपनाने की रफ्तार बेहद धीमी है, संभावित रूप से एक अलग तरह की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। चीन, यूरोप और अमेरिका में पारंपरिक वाहनों पर धीरे-धीरे शिकंजा कसने के साथ, वाहन निर्माताओं को अपने पेट्रोल और डीजल मॉडल बेचने के लिए भारत, ऑस्ट्रेलिया, रूस, दक्षिण अफ्रीका, थाईलैंड और मलेशिया जैसे अन्य बाजारों पर निर्भर रहना पड़ सकता है।
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यह चेतावनी लंदन स्थित थिंक-टैंक कार्बन ट्रैकर की ओर से आई है। जो उत्तरी अमेरिका, चीन और यूरोप में सख्त नियमों की ओर इशारा करती है। जहां यह या तो लागू हैं या इसकी तैयारी की जा रही है, जो यहां खरीदारों के बीच हाइब्रिड और ऑल-इलेक्ट्रिक वाहनों को तेजी से लोकप्रिय बना सकते हैं। यहां के बाजारों की प्राथमिकता में बड़े बदलाव की वजह से कार निर्माताओं को पुरानी टेक्नोलॉजी वाले मॉडलों को अन्य बाजारों में ट्रांसफर करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। इन अन्य बाजारों को उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं भी कहा जाता है।
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रिपोर्ट इस बात पर रोशनी डालती है कि जिन देशों के पास अभी तक स्वच्छ-ईंधन वाले वाहनों पर बहुत बड़ा कदम उठाने की योजना नहीं है। वे संभवतः पुरानी टेक्नोलॉजी वाले मॉडलों के लिए एक आकर्षक जगह बन सकते हैं। इसमें इस बात पर भी रोशनी डाला गया है कि जहां कंपनियों को ऐसे मॉडलों को बड़ी संख्या में लाने के लिए हाइब्रिड और ईवी की मांग को देखने की जरूरत है। वहीं भारत जैसे देशों को प्री-ओन्ड (यूज्ड या सेकेंड हैंड) स्वच्छ-ऊर्जा मॉडल को आकर्षित करना भी मुश्किल हो सकता है। क्योंकि विकसित अर्थव्यवस्थाएं, इन कारों को अपनी-अपनी सीमाओं के भीतर रखने के लिए, ऐसे मॉडलों को के लिए रीसाइक्लिंग स्कीम को प्रोत्साहित करेंगी। 
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भारत का मामला थोड़ा अजीब है। यह अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा वाहन बाजार है। लेकिन यह एक ऐसा क्षेत्र भी है जहां जनता के बीच कारों की पहुंच काफी कम है। ईवी - या तो दो या चार पहियों पर - अभी भी काफी महंगी हैं और इसलिए कई लोगों की खरीद की पहुंच से बाहर हैं। यहां सरकार का लक्ष्य 2030 तक सभी वाहनों में से 30 प्रतिशत को इलेक्ट्रिक से चलाने का है। इलेक्ट्रिक बिक्री का बड़ा हिस्सा दोपहिया वाहन सेगमेंट से आने की संभावना है। आखिरकार वित्त वर्ष 2023 में पहली बार ईवी की बिक्री 10 लाख को पार कर गई, जिसमें ई-दोपहिया वाहनों ने सबसे ज्यादा योगदान दिया।


लेकिन आलोचक संशय में हैं।

इस समय कुछ प्रमुख चुनौतियों जैसे उच्च खरीद लागत, सीमित इंफ्रास्ट्रक्चर सपोर्ट, चुनने के लिए मॉडलों की कमी, जागरूकता की कमी और रीसेल वैल्यू के बारे में चिंताएं हैं। सिंगापुर स्थित ग्लोबल टेक्नोलॉजी मार्केट एनालिस्ट फर्म कैनालिस के एक शोध के मुताबिक, वर्तमान में ओवरऑल भारतीय ऑटोमोटिव बाजार में ईवी की हिस्सेदारी 2.5 प्रतिशत है। अमेरिका में यह आंकड़ा 8 फीसदी और चीन में काफी ज्यादा 26 फीसदी है।
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