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ब्रेक फेल होने से हुई मौत पर ट्रिब्यूनल ने खारिज किया था दावा: सिक्किम हाईकोर्ट का ₹5 लाख मुआवजा देने का आदेश
Wed, 09 Sep 2026 11:26 PM IST
Amar Sharma
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Amar Sharma
Updated Wed, 09 Sep 2026 11:26 PM IST
सार
मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल ने यह कहते हुए परिवार की याचिका खारिज कर दी थी कि दुर्घटना ब्रेक फेल होने के कारण हुई थी और इसमें तेज या लापरवाही से वाहन चलाने का मामला साबित नहीं हुआ।
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Sikkim HC
- फोटो : Amar Ujala
विस्तार
सिक्किम हाईकोर्ट ने वर्ष 2019 में हुए एक दर्दनाक सड़क हादसे में जान गंवाने वाले व्यक्ति के परिजनों को बड़ी राहत दी है। हाईकोर्ट ने मोटर दुर्घटना दावा ट्रिब्यूनल (MACT) के फैसले को बदलते हुए पीड़ित परिवार को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। ट्रिब्यूनल ने पहले यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया था कि यह हादसा लापरवाही या तेज ड्राइविंग की वजह से नहीं, बल्कि ब्रेक फेल होने के कारण हुआ था। हालांकि, सिक्किम हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रिब्यूनल 'नो-फॉल्ट लायबिलिटी' के तहत मुआवजा प्रदान कर सकता था। यह फैसला 1 सितंबर 2026 को सुनाया गया।
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पीड़ित परिवार को हाईकोर्ट का दरवाजा क्यों खटखटाना पड़ा?
- मामला 12 नवंबर 2019 का है, जब एक मोटर वाहन दुर्घटना में व्यक्ति की मृत्यु हो गई थी। इसके बाद मृतक की पत्नी, बेटे और माता-पिता ने गंगटोक स्थित मोटर दुर्घटना दावा ट्रिब्यूनल में 19,07,560 रुपये के मुआवजे का दावा याचिका दायर की थी।
- ट्रिब्यूनल द्वारा इस दावे को खारिज किए जाने के बाद परिवार ने हाईकोर्ट का रुख किया। परिवार ने दलील दी कि भले ही मोटर वाहन अधिनियम की धारा 166 के तहत ड्राइवर की लापरवाही साबित न होने के कारण मुआवजा न मिले। लेकिन धारा 140 के तहत 'नो-फॉल्ट' आधार पर ट्रिब्यूनल द्वारा मुआवजा दिया जाना चाहिए था। बीमा कंपनी ने इस दावे का विरोध करते हुए तर्क दिया कि चूंकि मृतक स्वयं इस दुर्घटना का कारण था, इसलिए उसके कानूनी वारिस मुआवजे के हकदार नहीं हैं।
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बीमा पॉलिसियों की जटिल भाषा पर हाईकोर्ट ने क्या सख्त टिप्पणी की?
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस भास्कर राज प्रधान ने बीमा प्रमाण पत्र की अस्पष्टता पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि बीमा कंपनियों को अपने ग्राहकों को ऐसी पॉलिसी देनी चाहिए जिसकी शर्तें वे आसानी से समझ सकें। न कि उन्हें नियम जानने के लिए कंपनी की वेबसाइट के दर्जनों पन्नों की भूलभुलैया में भटकना पड़े।जस्टिस प्रधान ने कहा:
"बीमा पॉलिसी के नियमों और शर्तों को समझना हमेशा से ही एक कठिन काम रहा है। बीमा प्रमाणपत्र की भाषा यह स्पष्ट नहीं करती कि कंपनी का दायित्व किस हद तक है। IRDA के दिशानिर्देशों के तहत हर जारी किए गए सर्टिफिकेट में बीमा कवरेज की सीमा स्पष्ट रूप से दर्ज होनी चाहिए। ताकि बीमित व्यक्ति को पॉलिसी लेते ही अपने अधिकारों की पूरी जानकारी मिल सके।"
कोर्ट ने 'नो-फॉल्ट लायबिलिटी' और मुआवजे की राशि पर क्या स्पष्टता दी?
- हाईकोर्ट ने बीमा कंपनी के इस तर्क को खारिज कर दिया कि हादसे की वजह मृतक खुद था, इसलिए उसके परिवार को 'नो-फॉल्ट' प्रावधान के तहत राहत नहीं दी जा सकती। अदालत ने माना कि भले ही धारा 166 के तहत परिवार का दावा खारिज हो गया था। लेकिन धारा 140 के तहत मुआवजा दिया जा सकता था और बीमा कंपनी वाहन मालिक की देनदारी की भरपाई करने के लिए पूरी तरह जिम्मेदार है।
- अदालत ने कहा कि वर्तमान वैधानिक प्रावधानों के तहत मृत्यु पर देय मुआवजा 5 लाख रुपये है। वर्ष 2019 में हुए इस हादसे और 2023 में दायर याचिका को ध्यान में रखते हुए परिवार को 5 लाख रुपये का मुआवजा मिलना पूरी तरह न्यायसंगत है।