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Electric Vehicles: इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर रुझान वैश्विक तेल बाजार पर डाल सकता है असर, ऊर्जा रिपोर्ट का खुलासा

Thu, 17 Oct 2024 02:47 PM IST
अमर शर्मा ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अमर शर्मा Updated Thu, 17 Oct 2024 02:47 PM IST
सार

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर, विशेष रूप से चीन में इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ता रुझान वैश्विक तेल बाजार को बाधित करने के लिए तैयार है। 

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Shift toward electric vehicles globally poised to disrupt global oil market claims energy report
Electric Car - फोटो : Freepik

विस्तार

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर, विशेष रूप से चीन में इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ता रुझान वैश्विक तेल बाजार को बाधित करने के लिए तैयार है। 
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हाल के वर्षों में, चीन तेल की मांग और ग्रह-ताप उत्सर्जन में अधिकांश बढ़ोतरी के लिए जिम्मेदार है। लेकिन इलेक्ट्रिक वाहन अब वहां कारों की नई बिक्री का 40 प्रतिशत और वैश्विक स्तर पर बिक्री का 20 प्रतिशत हैं। जिससे प्रमुख तेल और गैस उत्पादक "संकट में" हैं। 
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आईईए वर्ल्ड एनर्जी आउटलुक 2024 में एक ऐसे भविष्य की रूपरेखा दी गई है। जहां इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने की रफ्तार जारी रहेगी। जिससे 2030 तक प्रतिदिन तेल की मांग में संभावित रूप से 6 मिलियन बैरल की बढ़ोतरी हो सकती है। एजेंसी ने कहा कि मौजूदा रुझानों और नीतियों और सामग्रियों की उपलब्धता के आधार पर, 2030 में वैश्विक कार बिक्री में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत तक पहुंच जाएगी। 

चीन में पहले से ही दुनिया की आधी इलेक्ट्रिक कारें सड़कों पर चल रही हैं। अनुमान है कि 2030 तक चीन में बिकने वाली नई कारों में से 70 प्रतिशत इलेक्ट्रिक होंगी। नई पवन और सौर ऊर्जा के अपने बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के साथ, चीन जलवायु परिवर्तन से निपटने के अपने लक्ष्य के साथ तालमेल बिठा रहा है। जिससे उत्सर्जन चरम पर होगा और दशक के आखिर तक इसमें कमी आने लगेगी। 
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हालांकि, आईईए के अनुसार, स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार बिजली की मांग में बढ़ोतरी के साथ-साथ हो रहा है। जिसमें कोयले को जलाकर उत्पादित बिजली भी शामिल है। थिंक टैंक सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर के प्रमुख विश्लेषक लॉरी माइलीविर्टा ने कहा, "इसका मतलब यह है कि स्वच्छ ऊर्जा प्रतिष्ठानों और परिवर्धन में रिकॉर्ड बढ़ोतरी देखने के बावजूद, उत्सर्जन में इजाफा जारी रहा।" 

रिपोर्ट में कहा गया है कि "हल्के औद्योगिक उपभोग, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, कूलिंग और डेटा सेंटर और एआई के कारण" बिजली की मांग उम्मीद से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रही है। इसमें कहा गया है कि हीटिंग, वाहन और कुछ उद्योगों को बिजली पर स्विच करने की रूपरेखा स्पष्ट होने लगी है। 

विश्व स्तर पर, आईईए ने कहा कि ईवी के बढ़ते इस्तेमाल के साथ-साथ पवन और सौर ऊर्जा के विस्तार से दशक के भीतर कोयला, तेल और गैस की मांग में बढ़ोतरी सुनिश्चित होगी। साथ ही कार्बन उत्सर्जन भी अपने उच्चतम बिंदु पर पहुंच जाएगा और नीचे की ओर बढ़ेगा। वैज्ञानिकों ने लंबे समय से चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन के सबसे बुरे प्रभावों को रोकने के लिए दुनिया को ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तेजी से कटौती करनी चाहिए। 

चूंकि चीन का बिजली की ओर तेजी से रुख तेल बाजार में उथल-पुथल मचाने में अहम भूमिका निभा रहा है। इसलिए तेल कंपनियों को लगता है कि वे भारत को अपने उत्पाद का अधिक हिस्सा बेच सकती हैं। आईईए का अनुमान है कि भारत 2035 तक अपनी मांग में लगभग 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल जोड़ लेगा। जो संभावित रूप से अन्य क्षेत्रों में घटती बढ़ोतरी की भरपाई करने की चाहत रखने वाले तेल उत्पादकों की लाइफ लाइन बनेगा।

ऊर्जा एजेंसी ने चेतावनी दी कि इस तस्वीर का मतलब है कि दुनिया अभी भी अपने शुद्ध शून्य लक्ष्यों के अनुरूप ट्रेजेक्ट्री (प्रक्षेपवक्र) से बहुत दूर है। क्योंकि अगले कई वर्षों तक बढ़ने के बजाय, वैश्विक जलवायु प्रदूषण को हर साल कम होना चाहिए। ताकि पृथ्वी की वर्तमान जलवायु के समान जलवायु को बनाए रखने का एक अच्छा मौका मिल सके।

2015 के पेरिस समझौते का लक्ष्य वैश्विक तापमान में 1800 के दशक की तुलना में औसत वैश्विक तापमान में 1.5 सेल्सियस (2.7 डिग्री फारेनहाइट) की बढ़ोतरी को सीमित करना था। लेकिन रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया वर्तमान में सदी के आखिर तक औसत 2.4 डिग्री सेल्सियस (4.32 डिग्री फारेनहाइट) की बढ़ोतरी की ओर बढ़ रही है।

क्लाइमेट एनालिटिक्स के सीईओ बिल हरे ने कहा कि रिपोर्ट से पता चलता है कि "उत्सर्जन अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचने के बाद भी तेजी से नहीं घटेगा और सिर्फ धीरे-धीरे घटेगा", जब तक कि कार्रवाई तेजी से नहीं की जाती।

आईईए पेरिस में स्थित एक अंतर-सरकारी निकाय है। विश्व ऊर्जा आउटलुक सालाना प्रकाशित होता है। और नीति निर्माताओं और विश्लेषकों द्वारा वैश्विक ऊर्जा रुझानों और नीति प्रभावों के स्रोत के रूप में इस पर भरोसा किया जाता है। 

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