Driverless Car: एनवीडिया CEO जेन्सेन हुआंग का दावा, भारत जैसे भीड़-भाड़ वाले देशों में चल सकेगी ड्राइवरलेस कार
Nvidia Self Driving Car Technology: भारत की भीड़भाड़ और अव्यवस्थित सड़कों को अब तक सेल्फ-ड्राइविंग कारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती माना जाता रहा है। लेकिन दुनिया की दिग्गज एआई कंपनी एनवीडिया के सीईओ जेन्सेन हुआंग का दावा है कि उनकी नई 'रीजनिंग एआई' तकनीक भारत जैसे कठिन ट्रैफिक हालात में भी बिना ड्राइवर कारों को सुरक्षित रूप से चला सकती है।
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अक्सर लोग मजाक में कहते हैं कि जिसने भारत की सड़कों पर गाड़ी चला ली वो दुनिया के किसी भी कोने में आसानी से ड्राइविंग कर सकता है। ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि भारत का ट्रैफिक दुनिया के सबसे चुनौतीपूर्ण और पेचीदा ट्रैफिक में से एक है। यहां केवल गाड़ियां ही नहीं बल्कि ऑटो, रिक्शा, पैदल चलने वाले लोग और कभी-कभी आवारा जानवर भी एक ही सड़क पर एक साथ चलते हैं। ऐसे में लेन का पालन करना या ट्रैफिक नियमों का सही से चलना काफी मुश्किल होता है। इसी वजह से दुनिया भर की टेक कंपनियां अब तक मानती थीं कि भारत में 'सेल्फ-ड्राइविंग कार' (ड्राइवरलेस कार) का सफल होना लगभग नामुमकिन है। लेकिन अब दुनिया की सबसे बड़ी एआई कंपनी एनवीडिया के सीईओ जेन्सेन हुआंग का दावा है कि उनकी नई टेक्नोलॉजी भारत के इस 'हैवी ट्रैफिक' में भी बिना ड्राइवर वाली कार सेल्फ-ड्राइविंग कार को आराम से चला लेगी।
भारत में क्यों मुश्किल है सेल्फ-ड्राइविंग?
भारत में अब तक सेल्फ ड्राइविंग कारें इसलिए सफल नहीं हो पाईं क्योंकि यहां के यातायात में अनुशासन की भारी कमी है और गाड़ियां अक्सर बेतरतीब तरीके से चलती हैं। कभी गाड़ियां उल्टी दिशा से आ जाती हैं तो कभी लेन तोड़कर निकलने की कोशिश करती हैं। साथ ही यहां का ट्रैफिक काफी मिला-जुला है जहां एक ही लेन में साइकिल, मोटरसाइकिल, कारें और बस-ट्रक एक साथ चलते हैं। कभी-कभी तो जानवर भी सड़क पर चलते नजर आते हैं। इसके अलावा बिना सिग्नल दिए मुड़ना या अचानक किसी के सामने आ जाना जैसी चुनौतियां भी हैं। जिससे यहां पर सेल्फ ड्राइविंग का कॉन्सेप्ट काफी मुश्किल लगता है।
जेन्सेन हुआंग का नया दावा
एनवीडिया के सीईओ जेन्सेन हुआंग ने बताया कि उनकी कंपनी ने 'अल्पामायो' (Alpamayo) नाम की एक नई और क्रांतिकारी तकनीक तैयार की है जो पुरानी तकनीकों के मुकाबले कहीं ज्यादा एडवांस है। ड्राइवरलेस कार ये नया कॉन्सेप्ट कितना आधुनिक है इसे समझने के लिए हम इसकी तुलना पुराने सिस्टम से कर सकते हैं।
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पुराना सिस्टम (पैटर्न मैचिंग): पहले की सेल्फ-ड्राइविंग तकनीक काफी हद तक 'रटे-रटाए' नियमों पर चलती थी। आप एक ऐसे छात्र की तरह समझ सकते हैं जिसने किताब के सवाल तो रट लिए हैं लेकिन अगर परीक्षा में थोड़ा सा भी अलग सवाल आ जाए तो वह अटक जाता है। पुरानी तकनीक केवल उन्हीं स्थितियों को संभाल पाती थी जो उसके प्रोग्राम में पहले से डाली गई थीं। जैसे ही सड़क पर कोई ऐसी अजीब स्थिति आती थी जिसके बारे में उसे सिखाया नहीं गया, तो सिस्टम फेल हो जाता था और दुर्घटना का खतरा बढ़ जाता था।
नई तकनीक (अल्पामायो- रीजनिंग एआई): वहीं एनवीडिया की यह नई तकनीक कार को 'तर्क' (रीजनिंग) करना सिखाती है। इसका मतलब है कि अब कार केवल प्रोग्रामिंग पर नहीं चलेगी बल्कि सड़क पर चलते समय एक इंसान की तरह सोचेगी। अगर कार के सामने कोई ऐसी स्थिति आती है जो उसने पहले कभी नहीं देखी, जैसे अचानक कोई बेतरतीब तरीके से सामने आ जाए या सड़क पर कोई बाधा हो। तो वह घबराने या बंद होने के बजाय शांत दिमाग से काम लेगी। यह एआई सिस्टम उस मुश्किल स्थिति को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट देगा और फिर यह सोचेगा कि अब मुझे सुरक्षित रहने के लिए क्या करना चाहिए?
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इंसानी दिमाग की तरह काम करेगा एआई
जेन्सेन हुआंग ने इस तकनीक को बहुत ही आसान उदाहरण से समझाया है। उन्होंने कहा कि जब हम यानी इंसान किसी नई सड़क या किसी अनजान रास्ते पर गाड़ी चलाते हैं तो हम केवल नियमों पर निर्भर नहीं रहते बल्कि अपना दिमाग (कॉमन सेंस) इस्तेमाल करते हैं। उदाहरण के लिए अगर हमें सड़क पर कोई बड़ा गड्ढा दिखता है तो हमारा दिमाग तुरंत सिग्नल देता है कि गाड़ी को थोड़ा किनारे से निकाल लो वरना नुकसान हो सकता है। या फिर अगर हम किसी ऑटो वाले को देखते हैं जो थोड़ा तिरछा चल रहा है तो हम अपनी समझ से अंदाजा लगा लेते हैं कि यह बिना सिग्नल दिए शायद मुड़ने वाला है, थोड़ा संभल कर चलना चाहिए। अभी तक की मशीनें इतनी समझदार नहीं थीं लेकिन एनवीडिया की नई तकनीक कार को यही 'तर्क' (रीजनिंग) करना सिखा रही है।
अंदाजा लगाने की शक्ति: अब कार सिर्फ यह नहीं देखेगी कि सामने क्या है बल्कि वह यह भी अंदाजा लगाएगी कि आगे क्या हो सकता है।
हालातों के हिसाब से फैसला: अगर सड़क पर कोई कुत्ता आ जाए या अचानक कोई बच्चा दौड़कर आ जाए तो कार पुराने प्रोग्राम को ढूंढने के बजाय उस समय के हालात को देखकर तुरंत फैसला लेगी।
दुनिया की पहली 'थिंकिंग कार': इसी काबिलियत की वजह से हुआंग ने इसे दुनिया की पहली 'सोचने वाली कार' कहा है। यह एक ऐसी कार होगी जो किसी रोबोट की तरह नहीं, बल्कि एक अनुभवी ड्राइवर की तरह सोच-समझकर और जिम्मेदारी से सड़क पर चलेगी।
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मर्सिडीज के साथ मिलकर हो रही है शुरुआत
इस तकनीक का लोहा दुनिया मान रही है। हाल ही में दिग्गज कार कंपनी मर्सिडीज-बेंज ने अपनी सबसे लग्जरी कार S-Class में इस तकनीक का इस्तेमाल किया है। सुरक्षा के मामले में भी इसे दुनिया के सबसे बेहतरीन सिस्टम में से एक माना जा रहा है। हुआंग के मुताबिक, मर्सिडीज और टेस्ला फिलहाल इस दौड़ में सबसे आगे हैं।
भारत के लिए क्या हैं इसके मायने?
अगर यह तकनीक भारत में सफल होती है तो यह न केवल सफर को सुरक्षित बनाएगी बल्कि भविष्य में सड़क हादसों में भी कमी ला सकती है। जहां पहले भारत को इन तकनीकों के लिए बहुत मुश्किल माना जाता था, अब एनवीडिया जैसी कंपनी इसे अपनी सफलता के लिए एक बड़े टेस्ट और अवसर के रूप में देख रही है।