Bus: अब बुजुर्गों और दिव्यांगो को बसों में चढ़ने में नहीं होगी समस्या, देशभर में अनिवार्य होंगी लो-फ्लोर बसें
AIS-216 Standards: अगर आपको भी बस में चढ़ते समय दिक्कत होती है, तो आपकी ये समस्या खत्म होने वाली है। क्योंकि अब देश भर में इंट्रा-सिटी ऑपरेशन के लिए निर्मित सभी पब्लिक बसें लो-फ्लोर होंगी। इसका मतलब है कि अब शहरों में चलने वाली नई बसों में ऊंचे स्टेप्स नहीं होंगे, जिससे यात्रियों को चढ़ने-उतरने में आसानी होगी।
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बुजुर्गों, दिव्यांगों, महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा और सुविधाओं के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। अब देश भर में इंट्रा-सिटी संचालन के लिए निर्मित सभी पब्लिक बसों को लो-फ्लोर बनाना अनिवार्य कर दिया जाएगा। नए ड्राफ्ट नोटिफिकेशन के अनुसार, 9 मीटर या उससे अधिक लंबाई वाली बसों की फ्लोर हाइट 400 mm तय की गई है, जो ऑटोमोटिव इंडस्ट्री स्टैंडर्ड AIS-216 के अनुरूप होगी।
लो-फ्लोर बसें क्या होती हैं?
लो-फ्लोर बसें वे बसें होती हैं जिनका फर्श (फ्लोर) जमीन से काफी कम ऊंचाई पर होता है। जिससे यात्रियों को चढ़ने-उतरने में सीढ़ियों की जरूरत न पड़े या बहुत कम पड़े। आमतौर पर इन बसों की फ्लोर हाइट करीब 350–400 mm होती है, जिससे ये सभी वर्गों के यात्रियों के लिए ज्यादा सुलभ बनती हैं।
ड्राफ्ट नोटिफिकेशन में क्या कहा गया?
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के ड्राफ्ट नोटिफिकेशन के अनुसार, 1 अप्रैल 2026 से नए मॉडल की बसों का निर्माण और जो बसें एक अक्तूबर 2025 के बाद बनी हैं। उन सभी बसों में AIS-216 मानकों का पालन किया जाएगा। इससे यात्री बिना किसी परेशानी के बस में चढ़ और उतर सकेंगे।
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AIS-216 मानक क्या है और क्यों है जरूरी?
AIS-216 का मतलब होता है ऑटोमोटिव इंडस्ट्री स्टैंडर्ड। सभी नई बसें इसके नियमों का सख्ती से पालन करेंगी। ये मानक बस बॉडी के डिजाइन और टेस्टिंग के लिए तय किए गए हैं, जो सड़क सुरक्षा, तकनीकी मजबूती और आपातकालीन स्थितियों में यात्रियों की सुरक्षित उतरने में मदद करेंगी। अधिकारियों के अनुसार, AIS-216 का पालन करने से सिटी बसें पहले से ज्यादा सुरक्षित और यूजर-फ्रेंडली बनेंगी।
मौजूदा बसों में क्या दिक्कतें हैं?
फिलहाल देश के कई शहरों में ऊंची स्टेप्स वाली बसें चलती थीं, जिनमें बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं, बच्चों और दिव्यांगों को चढ़ने में काफी दिक्कत होती थी। लो-फ्लोर बसें इन कमजोर वर्गों के लिए बाधा मुक्त सफर साबित हो सकती है। इससे सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों की भागीदारी भी बढ़ेगी।
हालांकि लो-फ्लोर बसों की शुरुआती कीमत हाई-फ्लोर बसों से थोड़ी अधिक होती है, लेकिन सरकार का मानना है कि निर्माताओं के पास इसके लिए जरूरी इकोसिस्टम पहले से तैयार है। कई बड़े शहरों में ये बसें पहले से चल रही हैं। इसके बाद अब इसे पूरे देश में लागू कर मानकीकरण किया जा रहा है।
यात्रियों के लिए क्या होगा फायदा?
ये नियम लागू होने के बाद दिव्यांग और वरिष्ठ नागरिकों की पहुंच बेहतर होगी। इसी के साथ महिलाओं और बच्चों के लिए यात्रा सुरक्षित बनेगी, पब्लिक ट्रांसपोर्ट अधिक समावेशी होगा और शहरी मोबिलिटी का स्तर भी सुधर सकता है।