Guru Vakri 2025: देवगुरु कर्क राशि में हुए वक्री, जानिए मेष राशि पर कैसा होगा प्रभाव ?
Guru Vakri 2025: 1 नवंबर 2025 को गुरु कर्क राशि में वक्री होंगे। वक्री होना मतबल उल्टी चाल से चलना। 23 दिनों तक गुरु बृहस्पति वक्री होने के बाद 4 दिसंबर 2025 को मिथुन राशि में गोचर करेंगे। आइए जानते हैं गुरु के वक्री होने से मेष राशि वालों पर कैसा प्रभाव पड़ेगा।
विस्तार
Guru Vakri 2025: वैदिक ज्योतिष में गुरु ग्रह का विशेष महत्व होता है। गुरु ग्रह को ज्ञान, सुख-संपन्नता, धन और विवाह का कारक ग्रह माना जाता है। 11 नवंबर 2025 को गुरु कर्क राशि में वक्री होंगे। वक्री होना मतबल उल्टी चाल से चलना। 23 दिनों तक गुरु बृहस्पति वक्री होने के बाद 4 दिसंबर 2025 को मिथुन राशि में गोचर करेंगे। आइए जानते हैं गुरु के वक्री होने से मेष राशि वालों पर कैसा प्रभाव पड़ेगा इसका ज्योतिषीय विश्लेषण करते हैं।
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मेष राशि पर वक्री गुरु का महत्व
मेष राशि के जातको के लिए गुरु नौवें और बारहवें भाव के स्वामी होते हैं जो अब 11 नवंबर 2025 को आपके चौथे भाव में वक्री होंगे। कुंडली का चौथा भाव माता, सुख, वाहन और भूमि का होता है। ऐसे में इस दौरान मेष राशि वालों को कार्यों में बाधाओं के सामना करना पड़ सकता है। वहीं करियर-कारोबार में काम का दबाव अधिक रहेगा। व्यापार में अच्छा मुनाफा होने के योग हैं। साथ ही कार्यो में प्रतिस्पर्धा का सामना भी करने को मिल सकता है। इस दौरान वित्तीय जीवन में धन हानि के योग बन रहे हैं। यात्रा के दौरान आपको अपने धन और चीजों का विशेष ध्यान रखना होगा नहीं तो वह गुम हो सकता है। निजी जीवन में जीवनसाथी का भरोसा कम हो सकता है। आपको अपने पार्टनर के विश्वास को बढ़ाने की जरूरत है। सेहत में गिरावट देखने को मिलेगा।
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ज्योतिष में देवगुरु का महत्व
- वैदिक ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति को गुरु का दर्जा प्राप्त है।
- गुरु धनु और मीन राशि के स्वामी होते हैं।
- कर्क राशि में गुरु उच्च के होते हैं जबकि मकर राशि में गुरु नीच के होते हैं।
- गुरु बृहस्पति को तीन विशेष द्दष्टियां प्राप्त है। पांचवी, सातवीं और नौवीं द्दष्टि।
- वैदिक ज्योतिष में गुरु बड़े भाई, शिक्षा, धन, संतान, ज्ञान और शिक्षा के कारक होते हैं।
- गुरु बृहस्पति पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रों के स्वामी होते हैं।
- जिन जातकों की कुंडली के पहले भाव यानी लग्न में गुरु स्वयं बैठ जाएं तो व्यक्ति बहुत ही भाग्यशाली और ज्ञानी होता है।
- कालपुरुष की कुंडली में गुरु नौवें और बारहवें भाव के स्वामी होते हैं और यह दूसरे, पांचवें, नौवें,दसवें और ग्यारहवें भाव के कारक होते है।
- गुरु के दूसरे भाव में यानी धन के भाव में होने पर जातक बहुत धनी और समृद्धिशाली रहता है।
-जब गुरु कुंडली के पांचवें भाव में होते हैं या फिर पाचवें भाव पर द्दष्टि डालते हैं तो जातक को उच्च शिक्षा और गुणी संतान की प्राप्ति होती है।
- नवम भाव में गुरु के होने पर व्यक्ति शिक्षा और ज्ञान में परांगत होता है। कुंडली का दशम भाव कार्यक्षेत्र, करियर या पेशे का होता है दशम में गुरु हो तो व्यक्ति समाज में खूब प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाला होता है।
- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली का ग्यारहवां भाव आय और लाभ का होता है। गुरु के इस भाव में होने पर जातक बहुत धन अर्जित करने में कामयाब होता है।
- गुरु के कमजोर होने पर जातक को लीवर, किडनी, मधुमेह, पीलिया, मोटापा और कैंसर जैसी बीमारी होने का खतरा रहता है।
- गुरु का रत्न पुखराज होता है। केले के वृक्ष को गुरु के रूप में पूजा जाता है। बृहस्पति गुरु पीले रंग का प्रतिनिधित्व करते हैं।
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