प्राणियों की आत्मशुद्धि की तिथि है पूर्णिमा
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चैत्र माह श्रेष्ठतम महीनों में से एक है। यह माह में बसंत ऋतु के मध्य पड़ता है जो स्वयं नारायण को भी अतिप्रिय है। गीता में उन्होंने कहा है कि ऋतु नाम कुसुमाकरः अर्थात ऋतुओं में मै बसंत हूं । माह का एक-एक दिन भगवान विष्णु जी को समर्पित है। स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का जन्म भी इसी माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को हुआ। पूर्णिमा की रात्रि में चन्द्र अपनी सम्पूर्ण कलाओं के पृथ्वी वासियों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं। पूर्णिमा को स्नान अर्घ्य, तर्पण, जप, तप, पूजन, कीर्तन दान-पुन्य करने से स्वयं भगवान विष्णु प्राणियों को ब्रह्मघात और अन्य कृत्या-कृत्य पापों से मुक्त करके जीव को शुद्ध कर देते हैं। इस तिथि को श्रीसत्यनारायण व्रत की कथा का श्रवण, गीतापाठ विष्णु सहस्त्र नाम का पाठ, 'ॐ नमो नारायणाय' का जप करने से प्राणी पापमुक्त, कर्जमुक्त होकर भगवान श्रीविष्णु जी की कृपा पाता है। पूर्णिमा के दिन झूठ बोलना, चोरी-ठगी करना, धोखा देना, जीव हत्या करना, गुरु की निंदा करने व मदिरापान करने से बचना चाहिए।
वैसे तो प्रत्येक पूर्णिमा को शायं काल पूर्ण चन्द्र के समय भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए खुले आसमान में दीप जलाते हुए इस मंत्र- दामोदराय विश्वाय विश्वरूपधराय च । नमस्कृत्वा प्रदास्यामि व्योमदीपं हरिप्रियम् ।।
अर्थात- मैं सर्वस्वरूप एवं विश्वरूपधारी भगवान श्री दामोदर को नमस्कार करके यह आकाशदीप अर्पित करता हूँ जो भगवान को अतिप्रिय है।
साथ ही इसमंत्र का 'नमः पितृभ्यः प्रेतेभ्यो नमो धर्माय विष्णवे ! नमो यमाय रुद्राय कान्तारपतये नमः !! उच्चारण करते हुए, 'पितरों को नमस्कार है, प्रेतों को नमस्कार है। धर्म स्वरूप श्रीविष्णु को नमस्कार है, यमदेव को नमस्कार है तथा जीवन यात्रा के दुर्गम पथ में रक्षा करने वाले भगवान रूद्र को नमस्कार है का उच्चारण करते हुए आकाशदीप जलाएं। इस प्रकार प्राणी में भगवान नारायण की कृपा का पात्र बन सकता हैं ।