अगर हम कहें कि महादेव भी शनि के प्रकोप से बच नहीं पाए तो आप शायद इसे स्वीकार न कर पाएं। आखिर महादेव तो देवों के देव हैं उन पर किसका प्रकोप हो सकता है। लेकिन अगर बीते तीन सप्ताह की कुछ घटनाओं पर गौर करें तो आप भी इस बात को स्वीकार करेंगे कि केदारनाथ पर शनि की छाया थी। हालांकि यह प्रकोप अब सामाप्त होने जा रहा है।
पहली घटना यह घटना आज से तीन हफ्ते पहले की है। 15 जून (शनिवार) की ही शाम से ही केदारनाथ घाटी पर आफत के बादल मंडराने शुरू हुए और बारिश की शुरूआत हुई।
रूक -रूक कर तेज बारिश ने तीर्थ यात्रियों को डराना शुरू किया और 16 तारीख की रात में बादल फटा। केदार घाटी में मौजूद हजारों तीर्थ यात्री काल के गाल में समा गये। हालात इस कदर बिगड़े कि केदारनाथ की पूजा तक बंद हो गयी।
दूसरी घटना केदारनाथ की पूजा रुकने के बाद 22 जून को ही पुजारी और मंदिर समिति के सदस्यों ने केदारनाथ की सुध ली। गौर कीजिए 22 जून को शनिवार था। इस दिन केदारनाथ की पूजा जारी रखने के लिए इनके चल विग्रह को केदरनाथ मंदिर से निकालकर शीतकालीन पूजा स्थल उखीमठ लाया गया। इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब ग्रीष्मकाल में केदारनाथ के चल विग्रह को उखी मठ लाया गया।
तीसरी घटना आज फिर शनिवार है। तीसरी घटना आज होने जा रही है। आज से मंदिर की साफ-सफाई का काम शुरू हो रहा है। केदारनाथ मंदिर में बाधित पूजा को फिर से शुरू करने के लिए साफ-सफाई होगी और उसके बाद मंदिर समिति की बैठक बुलाई जाएगी। इस बैठक में केदारनाथ की पूजा कब शुरू होगी इस बात पर निर्णय लिया जाएगा।
पहले भी शिव पर पड़ा है शनि का साया पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव पर शनि की दशा आई। शिव ने कहा कि शनि मेरा कुछ बिगाड़ नहीं सकता। शनि के प्रकोप से बचने के लिए भगवान शिव हाथी बनकर कोकिला वन में जा पहुंचे।
शनि दशा का समय बीत जाने के बाद भगवान शिव जब कैलाश पहुंचे तब शनि ने बताया कि भगवान आप मुझसे बचने के लिए हाथी बने लेकिन फिर भी बच नहीं पाये। आपको मेरी दशा के कारण देव योनि से पशु योनि में जाना पड़ा। यानी भगवान शिव भी शनि से पीड़ित रहे हैं।
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