आधुनिकता के दौर में भी हिमाचल की लोक संस्कृति और धार्मिक परंपराएं गांवों में पूरी आस्था के साथ जीवित हैं। धर्मपुर उपमंडल के बहरी गांव से भूरा की गुग्गा छतरी मंडली अपने बुजुर्गों से मिली सदियों पुरानी परंपरा को आज भी निभा रही है। मंडली गांव-गांव और घर-घर जाकर लोकदेवता गुग्गा जाहरवीर की गाथा का गुणगान कर रही है। रक्षाबंधन के पर्व के साथ गुग्गा जाहरवीर की गाथा सुनाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। मंडली के सदस्य पारंपरिक तरीके से गुग्गा छतरी लेकर घरों में पहुंचते हैं और लोकगीतों के माध्यम से जाहरवीर की महिमा का वर्णन करते हैं। गाथाओं में उनके जन्म, जीवन, विवाह और वीरता से जुड़े लोक प्रसंग सुनाए जाते हैं। मंडली के पहुंचने पर ग्रामीण श्रद्धा के साथ उनका स्वागत करते हैं और परिवार की सुख-शांति व समृद्धि की कामना करते हैं। मंडी सहित हिमाचल के कई क्षेत्रों में यह परंपरा रक्षाबंधन से जन्माष्टमी तक निभाई जाती है। भूरा की मंडली की विशेषता यह है कि बदलते समय के बावजूद इसके सदस्यों ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को कमजोर नहीं पड़ने दिया। मंडली से जुड़े परिवारों के साथ युवा पीढ़ी भी इस परंपरा को आगे बढ़ाने में सहयोग कर रही है।