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कपड़े-जूते मिलने के लालच में शुरू की हॉकी, प्रीतम रानी सिवाच ने भरी स्कूल की फीस

करनाल। एशियन गेम्स में भारतीय महिला हॉकी टीम को स्वर्ण पदक दिलाने वाली मिडफील्डर नेहा गोयल शुक्रवार को अपने ससुराल लौटीं, तो उनका भव्य और ढोल-नगाड़ों के साथ स्वागत किया गया। इस स्वर्ण पदक को जीतने के पीछे गरीबी, अभाव और अनवरत संघर्ष की एक ऐसी गाथा छिपी है, जो देश के हर युवा खिलाड़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। नेहा ने कहा कि हॉकी खेल के प्रति किसी पूर्व जुनून के कारण नहीं, बल्कि महज इसलिए खेलना शुरू किया था, ताकि उन्हें मुफ्त में जूते और खेलने के कपड़े मिल सकें। खिलाड़ी नेहा ने कहा कि बचपन में उनके परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि बुनियादी जरूरतें पूरा करना भी एक बड़ी चुनौती थी। उन्होंने कहा कि जब मैं छोटी थी, तब उनकी एक सहेली ने उनको हॉकी खेलने के लिए कहा था। उन्होंने कहा कि मुझे पता चला कि जो लड़कियां मैदान पर खेलने जाती हैं, उन्हें संस्थाओं और कोच की ओर से मुफ्त में खेल के कपड़े और जूते दिए जाते हैं। उस उम्र में नए कपड़े और जूते मिलना मेरे लिए किसी सपने जैसा था। उसी लालच और आकर्षण में मैंने पहली बार मैदान में कदम रखा और हॉकी स्टिक थामी। मुझे क्या पता था कि जिस खेल को मैंने सिर्फ कपड़ों और जूतों के लिए चुना था, वही एक दिन मेरी पहचान और देश का गौरव बन जाएगा। नेहा ने कहा कि खेल शुरू करने के बाद जब कोच ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उनका मार्गदर्शन किया, तो खेल के प्रति उनका दृष्टिकोण बदल गया। जो शुरुआत केवल एक जरूरत से हुई थी, वह धीरे-धीरे उनके जीवन का एकमात्र जुनून बन गई। नेहा ने कहा कि उनकी कोच भारतीय महिला हॉकी टीम की पूर्व कप्तान प्रीतम रानी सिवाच ने उनका काफी साथ दिया और कई बार उनके स्कूल की फीस भी दी। नेहा की यह यात्रा आसान नहीं थी। नेहा ने कहा कि बचपन में ही उनके पिता का साथ छूट गया था। इसके बाद परिवार के पालन-पोषण और बच्चों की पढ़ाई का पूरा दारोमदार उनकी मां के कंधों पर आ गया। घर का खर्च चलाने और नेहा के खेल के सपनों को टूटने न देने के लिए उनकी मां ने लोगों के घरों में झाड़ू-पोछा और बर्तन मांजने का काम किया। नेहा ने कहा कि मेरी मां ने जो कष्ट सहे हैं, उनकी तुलना किसी भी स्वर्ण पदक से नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि वह तीन बहने है और तीनों मिलकर साइकिल की तार में पट्टा बांधकर महीने के 1500 रुपये मिलते थे। साथ में उनके मामा भी उनकी मदद करते थे, लेकिन उनका भी निधन हो गया और उसके अगले ही दिन उन्होंने अपनी पहली प्रतियोगिता खेली जिसमें उनको दो हजार रुपये नकद इनाम मिला। जब हमारे पास खाने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं होते थे, तब भी मेरी मां ने कभी मुझे या मेरी पढ़ाई को रुकने नहीं दिया। आज मैं जो कुछ भी हूं, अपनी मां के त्याग और आशीर्वाद की बदौलत हूं। 2009 में मिले थे सुनील और नेहा नेहा ने कहा कि साल 2009 में वह अपने पति सुनील से पहली बार एक प्रतियोगिता में मिले थे। तब वह दोनों हॉकी खेला करते थे और साथ में अभ्यास करते थे। उन्होंने बताया कि नेहा की अपने खेल के प्रति काफी लगन थी, जिसको देखते हुए उन्होंने नेहा से एक दम शादी की बात नही की। उन्होंने बताया कि जब नेहा का भारतीय महिला हॉकी टीम में चयन हुआ, तो उसके दोनों ने अपने घर में बात की , लेकिन इसी बीच राष्ट्रमंडल खेल और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता का आयोजन हो गया, जिसके चलते उनको थोड़ा और इंतजार करना पड़ा। उन्होंने बताया कि साल 2024 नवंबर में घर वालो की सहमती से दोनों ने सात फेरे लिए। 2016 में किया था भारतीय महिला हॉकी टीम में डेब्यू नेहा ने कहा कि वर्ष 2016 में उन्होंने भारतीय महिला हॉकी टीम में डेब्यू किया था। तब से लेकर आज तक वें राष्ट्रीय टीम के मुख्य मिडफील्ड का एक अनिवार्य हिस्सा बनी हुई हैं। नेहा मैदान पर त्वरित आक्रामक और रक्षात्मक संतुलन बनाने में माहिर है। मैदान पर अपनी गति, गेंद पर नियंत्रण और बेहतरीन पास के लिए जानी जाने वाली नेहा ने ओलंपिक जैसे विश्व स्तरीय मंच के लिए भी क्वालीफाई किया और भारतीय टीम को कई महत्वपूर्ण मुकाबलों में जीत दिलाई। 2016 के बाद से उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगातार अपनी प्रतिभा से देश का मान बढ़ाया है। नेहा कहा कि उनका अगला लक्ष्य आगामी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं और ओलंपिक में भारत के लिए एक बार फिर से ऐतिहासिक प्रदर्शन करना और देश को स्वर्ण पदक दिलाना है।

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