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World Politics: जो बाइडन की कांपती जुबान और ब्रिटेन, फ्रांस, ईरान दे रहे हैं 2025 में बड़े बदलाव का संकेत

Sun, 07 Jul 2024 11:06 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Sun, 07 Jul 2024 11:06 PM IST
सार

  • ट्रंप जीते राष्ट्रपति का चुनाव तो बदलेगा यूरेशिया, इस्राइल का समीकरण।
  • एशिया और यूरोप को भी अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव का इंतजार।
  • दुनिया के देश नहीं चाहते युद्ध और टकराव।

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World Political Scenario change US Presidential Election Joe Biden France Iran Polls next gen amid War updates
अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन, फ्रांस के इमैनुएल मैक्रों और इस्राइल के बेंजामिन नेतन्याहू। - फोटो : ANI/PTI

विस्तार

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन की पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से पहली डिबेट में कमजोरी अभी से बड़े बदलाव की तरफ ईशारा करने लगी है। डोनाल्ड ट्रंप आव्रजन नीति पर थोड़ा कड़ा रुख अपनाते हैं। आव्रजन नीति(छोटी नाव से शरणार्थियों का आना) की कमजोरी ने ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सुनक को करारा झटका दिया। फ्रांस में भी बड़े बदलाव के संकेत हैं और राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों चुनाव में पिछड़ सकते हैं। फ्रांस से ईरान चलिए। वहां नतीजे में कट्टरपंथी जलीली को पराजय मिली है। सुधारवादी नेता मसूद पेजेश्कियान राष्ट्रपति का चुनाव जीत गए हैं। विदेश मामलों के जानकारों का कहना है कि यह रुख जारी रहा तो 2025 में दुनिया की परिस्थितियां फिर नया रूप लेने लगेगी।
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विदेश मामलों में गहरी पकड़ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार रंजीत कुमार के अनुसार यूक्रेन-रूस युद्ध और इस्राइल-हमास की जंग की दुनिया को कीमत चुकानी पड़ रही है। अभी खतरा यह भी है कि कहीं इस्राइल और हिजबुल्लाह में युद्ध न शुरू हो जाए। वैसे भी हिजबुल्लाह ईरान समर्थिक संगठन है। दुनिया के कई देश इसे आतंकी संगठन की श्रेणी में रखते हैं, लेकिन यह ताकत में हमास से बड़ा है। यह जंग शुरू होने के बाद न केवल इस्राइल की अर्थ व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, बल्कि दुनिया में युद्ध जैसे हालात बढ़ते जाने का खतरा बना रहेगा।
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अमेरिका में नवंबर में है चुनाव, ट्रंप जीते तो बढ़ेगा यूक्रेन संकट
अमेरिका में 5 नवंबर को राष्ट्रपति पद के लिए वोट डाले जाएंगे। जिस तरह से ट्रंप बढ़त बनाते दिखाई दे रहे हैं, उस पर यूरोप, एशिया की भी निगाहें हैं। हालांकि राष्ट्रपति जो बाइडन का कहना है कि वह चुनाव लड़ेंगे, ट्रंप को हराएंगे और अगले राष्ट्रपति बनेंगे, लेकिन तमाम डेमाक्रेट का अभी से आत्म विश्वास हिलने लगा है। ट्रंप ने पहली चर्चा में यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की को अंतरराष्ट्रीय सेल्समैन करार दिया है। रूस के राष्ट्रपति पुतिन के यूक्रेन में सेना के प्रवेश कराने के निर्णय पर उन्होंने(ट्रंप) उन्हें(पुतिन)को जीनियस कहा था। ट्रंप के मुताबिक राष्ट्रपति जो बाइडन ने यूक्रेन-रूस युद्ध को भडक़ाने का काम किया है और यूक्रेन की अरबों डालर की मदद करके अमेरिका अपने कर दाताओं के पैसे को खराब कर रहा है। यहां तक कि यूक्रेन की सहायता में यूरोपीय देश अपना हिस्सा नहीं दे रहे हैं। इससे लग रहा है कि ट्रंप के चुनाव जीतने के बाद यूक्रेन को अमेरिकी सहायता के मामले में गहरा झटका लग सकता है।  
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इस्राइल की हर संभव मदद के लिए खुलकर साथ खड़े हैं बाइडन
अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन इस्राइल की मदद के लिए खुलकर साथ खड़े हैं। हालांकि इस्राइल-हमास युद्ध में इस्राइली अर्थ व्यवस्था को करारी चपत लगी है। इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतेन्याहू को भी युद्ध के लंबा खिचने की संभावना कम थी। अब इस्राइल को युद्ध में लड़ाके नहीं मिल पा रहे हैं। गोला-बारुद की कमी का भी सामना कर रहा है। दूसरे हमास के बाद लेबनान से हिजबुल्लाह ने काफी आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है। इस युद्ध की संभावना को देखकर उत्तरी इस्राइल को खाली कराया जा रहा है। इस्राइलियों ने भी घर के बंकरों में सब्जी, फल, खाने के सामान को इकट्ठा करना शुरू किया है। वहां के बिजली संयंत्र भी बड़ी मात्रा में उत्तरी इस्राइल में हैं। ऐसे में बिजली गुम होने की आशंका देखकर बड़ी संख्या में अमेरिका समेत अन्य देशों से जनरेटर की मांग बढ़ गई है।

इसके सामानांतर हर रोज सैकड़ो इस्राइली अपने प्रधानमंत्री के आवास के बाहर जारी युद्ध के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। एक बड़ी आशंका यह भी है कि इस्राइल हिजबुल्लाह के बीच में सैन्य अभियान छिडऩे के बाद ईरान भी तनाव बढ़ा सकता है। पूर्व एयरवाइस मार्शल एनबी सिंह कहते हैं कि स्थिति धीरे-धीरे जटिल होती जा रही है। पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप ने दुनिया में युद्ध जैसे हालात के लिए राष्ट्रपति बाइडन को घेरा था। माना जा रहा है कि ट्रंप भी इस्राइल का समर्थन तो करेंगे, लेकिन सैन्य सहायता समेत अन्य मामलों में कुछ शर्तों के साथ आगे बढऩे का निर्णय ले सकते हैं। ट्रंप के रणनीतिकार लगातार जो बाइडन की विदेश नीति, सामरिक और रणनीतिक साझेदारी की नीति को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। ट्रंप ने खुद जो बाइडन को मंचूरियन राष्ट्रपति(चीन के सामने घुटने टेकने वाला) की संज्ञा दे दी।

ब्रिटेन, फ्रांस, ईरान दे रहे हैं बड़े बदलाव का संकेत
पहले बात ईरान की। ईरान लंबे समय से पश्चिम से टकराव मोल रहा है। पूर्व स्व. राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी के समय में तनाव बढ़ा ही था। नव निर्वाचित राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने अपने देश की जनता से वादा किया था कि वह जीते तो पश्चिम से ईरान को जोडऩे भरोसा दिया। उन्होंने कट्टरपंथी नेता सईद जलीली को हराया है। जनादेश का अर्थ यही है कि उदारवादी नेता पेजेश्कियान ईरान और अमेरिका के रिश्ते बेहतर करने पर ध्यान देंगे। ईरान के लोग भी युद्ध और टकराव को नहीं चाहते। हालांकि पेजेश्कियान ने कहा है कि वह ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई में आस्था रखते हैं। उन्हें मानेंगे। अयातुल्लाह खामेनेई ईरान के सर्वोच्च नेता, आखिरी मध्यस्थ माने जाते हैं। खामेनेई अमेरिका के विरोधी हैं। ऐसे में समूद पेजेश्कियान को इस्राइल-हमास युद्ध के साथ साथ इसके हिजबुल्लाह के साथ टकराव में बदलने, हूती विद्रोहियों के साथ विवाद बढऩे, लेबनान, यमन तक टकराव के हालात को संभालने की चुनौती मिलेगी।

फ्रांस से बड़ी खबर आई है। वहां पहले दौर के चुनाव में मतदाताओं ने संसदीय चुनाव के पहले दौर में राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों की पार्टी को तीसरे नंबर पर भेज दिया है। दूसरे दौर का चुनाव 7 जुलाई को है और लगता नहीं कि मैनुअल की पार्टी कोई बड़ा चमत्कार कर पाएगी। दिलचस्प है कि मरीन ले पेन की नेशनल रैली में बड़ा भरोसा दिखाया है। मरीन ले पेन को फ्रांस में लोग युद्ध, उत्पीडऩ और गरीबी से भागकर फ्रांस आने वाले प्रवासियों की चिंताओं से जोडक़र देख रहे हैं। इसका दबाव इमैनुअल मैक्रों पर पडऩा तय है। हालांकि इमैनुअल माक्रों का कार्यकाल 2027 तक है और उन्होंने अपने पद पर बने रहने की घोषणा भी की है।

इसी कड़ी में ब्रिटेन के चुनाव नतीजे को भी देखना होगा। प्रधानमंत्री ऋषि सुनक को भी ऐसी करारी हार की उम्मीद नहीं थी। वहां किएर स्टार्मर को 10 डाऊनिंग स्ट्रीट (ब्रिटेन का प्रधानमंत्री निवास) में रहने का अवसर मिला है। ब्रिटेन की पिछले 10 साल में कई मोर्चे पर चुनौतियां बढ़ी हैं।


चुनाव के जरिए दुनिया में होने वाले बदलाव बहुत कुछ कह रहे हैं
पिछले कुछ साल से दुनिया युद्ध और टकराव में फंसी सी है। चीन का ताइवान के साथ तनाव भी चरम पर चल रहा है। दक्षिण चीन सागर को लेकर चीन के दावे के विपरीत दुनिया के तमाम देश खड़े हैं। लेकिन दुनिया में चुनाव के जरिए हो रहे बदलाव एक नया संकेत दे रहे हैं। माना जा रहा है कि जिस तरह से बदलाव देखने में आ रहा है, यदि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में भी जारी रहा तो आने वाले समय में कई बदलाव होंगे। 2025 से दुनिया की भू राजनीतिक स्थिति नये आयाम गढऩा शुरू कर देगी।
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