ट्रंप की हार के छह कारण: ईरान युद्ध से महंगाई तक, इन मुद्दों ने पलटा सियासी खेल; क्यों नाराज हुए अमेरिकी वोटर?
अमेरिका के 2026 मिडटर्म चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी को मिली हार के पीछे छह बड़े कारण सामने आए हैं। ईरान युद्ध, तेल की बढ़ती कीमतें और महंगाई ने अमेरिकी जनता की जेब पर बोझ बढ़ाया, तो सख्त निर्वासन नीति और एपस्टीन फाइल्स विवाद ने ट्रंप प्रशासन की मुश्किलें बढ़ाईं। आखिर इन छह मुद्दों ने कैसे बदला अमेरिका का सियासी समीकरण, जानिए...
विस्तार
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए 2026 के मिडटर्म चुनाव किसी बड़े राजनीतिक झटके से कम नहीं रहे। जिस रिपब्लिकन पार्टी के दम पर ट्रंप अपनी नीतियों और राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ा रहे थे, उसे इस बार मतदाताओं ने बड़ा झटका दिया है। डेमोक्रेटिक पार्टी ने अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों यानी सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में बहुमत हासिल कर लिया। इस जीत के साथ डेमोक्रेट्स ने न केवल अमेरिकी राजनीति का समीकरण बदल दिया, बल्कि ट्रंप के बचे हुए कार्यकाल के लिए भी मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
रॉयटर्स और एसोसिएटेड प्रेस की चुनावी रिपोर्टों के मुताबिक, महंगाई, ईरान युद्ध, बढ़ती कीमतें और सरकार के कामकाज को लेकर नाराजगी इस चुनाव में प्रमुख मुद्दे रहे। ट्रंप ने रिपब्लिकन उम्मीदवारों के समर्थन में कई रैलियां कीं और अपने समर्थकों से उन्हें ऐसे वोट देने की अपील की जैसे ट्रंप खुद चुनाव लड़ रहे हों। इसके बावजूद पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली।
सवाल है कि आखिर ट्रंप की राजनीति में ऐसा क्या हुआ कि रिपब्लिकन पार्टी को दोनों सदनों में हार का सामना करना पड़ा? इसके पीछे छह बड़े कारण समझे जा सकते हैं। आइए जानते है...
1. ईरान युद्ध बना ट्रंप के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती
ट्रंप की चुनावी मुश्किलों की सबसे बड़ी वजहों में ईरान युद्ध को माना जा रहा है। अमेरिकी मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग इस सैन्य कार्रवाई और उसके लंबे खिंचने को लेकर नाराज दिखाई दिया। ट्रंप प्रशासन से उम्मीद की जा रही थी कि वह अमेरिका की विदेश नीति में स्थिरता लाएगा, लेकिन ईरान के साथ बढ़ते संघर्ष ने अमेरिकी राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों पर दबाव बढ़ा दिया। यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स एमहर्स्ट के अगस्त 2026 के सर्वेक्षण में 68 प्रतिशत लोगों ने ईरान युद्ध को संभालने के ट्रंप के तरीके पर असहमति जताई। वहीं 54 प्रतिशत लोगों ने ईरान में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का विरोध किया।
इस मुद्दे का असर केवल विदेश नीति तक सीमित नहीं रहा। युद्ध के कारण ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ी और आम अमेरिकी नागरिकों को भी इसका आर्थिक असर महसूस हुआ। डेमोक्रेट्स ने चुनाव प्रचार में इस मुद्दे को उठाते हुए ट्रंप प्रशासन की नीतियों पर सवाल खड़े किए। इस तरह ईरान युद्ध रिपब्लिकन पार्टी के लिए राजनीतिक बोझ बन गया।
2. तेल की बढ़ती कीमतों ने आम अमेरिकी की जेब पर डाला बोझ
ईरान युद्ध का दूसरा बड़ा असर तेल और गैस की कीमतों पर पड़ा। अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें आम नागरिकों के लिए हमेशा से अहम चुनावी मुद्दा रही हैं। वहां बड़ी संख्या में लोग रोजाना कार से काम पर जाते हैं। ऐसे में पेट्रोल महंगा होने का सीधा असर उनके मासिक बजट पर पड़ता है। ईरान से जुड़े संघर्ष और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में पैदा हुई अनिश्चितता ने अंतरराष्ट्रीय तेल आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ाईं। इसका असर अमेरिकी बाजार में भी देखने को मिला।
रिपोर्ट के अनुसार, अक्तूबर के आखिरी सप्ताह में अमेरिका में गैसोलीन की औसत कीमत 4.27 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई थी। यह कीमत ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के समय के स्तर से अधिक थी। नतीजा यह हुआ कि ट्रंप के आर्थिक वादों पर सवाल उठने लगे। मतदाताओं के मन में यह सवाल था कि जब सरकार ऊर्जा कीमतों को नियंत्रित नहीं कर पा रही है, तो आम आदमी को राहत कैसे मिलेगी?
3. महंगाई ने ट्रंप के आर्थिक वादों की खोल दी पोल
2024 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप ने महंगाई कम करने और अमेरिकी परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधारने का बड़ा वादा किया था। उनकी जीत के पीछे आम लोगों की आर्थिक परेशानियां भी एक अहम वजह थीं। लेकिन 2026 के मिडटर्म चुनाव तक महंगाई और जीवनयापन की लागत मतदाताओं की बड़ी चिंता बनी रही। अमेरिका में केवल पेट्रोल ही नहीं, बल्कि किराने का सामान, बिजली, आवास और स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च भी परिवारों पर दबाव डाल रहा था।
रॉयटर्स की चुनावी रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 90 प्रतिशत मतदाताओं ने जीवनयापन की लागत को अपने वोट के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा माना। लगभग दो-तिहाई मतदाताओं ने ऊंची कीमतों के लिए ट्रंप को जिम्मेदार ठहराया। एसोसिएटेड प्रेस की वोटर पोल रिपोर्ट में भी अर्थव्यवस्था और महंगाई को चुनावी फैसले के प्रमुख कारणों में शामिल किया गया। यही वजह रही कि डेमोक्रेट्स को आर्थिक मुद्दों पर ट्रंप प्रशासन के खिलाफ माहौल बनाने का मौका मिला।
4. निर्वासन नीति बनी रिपब्लिकन पार्टी के लिए उलटी चुनौती
ट्रंप की राजनीति में अवैध प्रवासियों को देश से बाहर निकालने की नीति हमेशा प्रमुख मुद्दा रही है। उन्होंने सत्ता में आने के बाद बड़े पैमाने पर निर्वासन और सख्त इमिग्रेशन नियमों पर जोर दिया। हालांकि, इस नीति को लेकर अमेरिका में मतभेद भी बढ़े। एक तरफ उनके समर्थक इसे सीमा सुरक्षा और कानून व्यवस्था के लिए जरूरी मानते थे, वहीं दूसरी तरफ कई मतदाताओं ने इसके आक्रामक तरीके पर सवाल उठाए। 22 अप्रैल 2026 को प्रकाशित रॉयटर्स/इप्सोस सर्वेक्षण में 52 प्रतिशत अमेरिकी नागरिकों ने कहा कि ट्रंप की निर्वासन नीति का समर्थन करने वाले उम्मीदवार को वोट देने की उनकी संभावना कम होगी। इसके मुकाबले 42 प्रतिशत लोगों ने ऐसी नीति का समर्थन करने वाले उम्मीदवार को वोट देने की अधिक संभावना जताई। स्वतंत्र मतदाताओं में भी इस नीति को लेकर विरोध ज्यादा दिखाई दिया।
इसका मतलब यह नहीं कि अमेरिकी मतदाता सीमा सुरक्षा के खिलाफ थे। असली सवाल निर्वासन की प्रक्रिया, उसके मानवीय प्रभाव और सरकार के सख्त रवैये को लेकर था। इस मुद्दे पर रिपब्लिकन पार्टी को उन स्वतंत्र और मध्यमार्गी मतदाताओं का समर्थन हासिल करने में मुश्किल हुई, जिनका चुनावी नतीजों में अहम योगदान होता है।
5. एपस्टीन फाइल्स ने भ्रष्टाचार और सत्ता के रिश्तों को बनाया चुनावी मुद्दा
जेफ्री एपस्टीन से जुड़े दस्तावेजों का विवाद भी 2026 के चुनाव में डेमोक्रेट्स के लिए एक महत्वपूर्ण प्रचार हथियार बना। एपस्टीन एक दोषी यौन अपराधी था, जिसके प्रभावशाली लोगों से संबंधों और मामले की जांच से जुड़े दस्तावेजों ने अमेरिकी राजनीति में लंबे समय तक विवाद पैदा किया। डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों ने रिपब्लिकन नेताओं पर एपस्टीन फाइल्स जारी करने के मुद्दे पर सवाल उठाए।
जॉर्जिया में जॉन ओसॉफ ने अपने रिपब्लिकन प्रतिद्वंद्वी माइक कॉलिन्स को निशाना बनाया। ओहायो में शेरोड ब्राउन के प्रचार में रिपब्लिकन उम्मीदवार जॉन हस्टेड के एपस्टीन से जुड़े दानदाताओं के संबंधों को उठाया गया। टेक्सास में जेम्स टालारिको ने केन पैक्सटन के खिलाफ एपस्टीन मामले से जुड़ी भाषा का इस्तेमाल कर प्रचार किया। प्रतिस्पर्धी चुनावी क्षेत्रों में एपस्टीन का जिक्र करने वाले विज्ञापनों पर डेमोक्रेट्स ने करीब 53 मिलियन डॉलर खर्च किए, जबकि रिपब्लिकन की ओर से इस तरह के विज्ञापनों पर खर्च करीब 3 मिलियन डॉलर था। इस प्रचार का मकसद केवल एपस्टीन का मुद्दा उठाना नहीं था, बल्कि मतदाताओं के बीच भ्रष्टाचार, अमीरों को विशेष सुविधा और सत्ता के दुरुपयोग की धारणा को मजबूत करना भी था।
6. रिपब्लिकन समर्थकों में मतदान का उत्साह कम होना
चुनाव में केवल जनता की नाराजगी ही मायने नहीं रखती, बल्कि यह भी जरूरी होता है कि किसी पार्टी के समर्थक कितनी बड़ी संख्या में मतदान करने पहुंचते हैं। 2026 के मिडटर्म चुनाव में डेमोक्रेट्स के पक्ष में एक बड़ा अंतर उनकी चुनावी सक्रियता और ट्रंप विरोधी मतदाताओं के उत्साह का रहा।
डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों के समर्थक रिपब्लिकन समर्थकों की तुलना में 14 प्रतिशत अधिक संख्या में कह रहे थे कि उन्होंने चुनाव के बारे में काफी गंभीरता से सोचा है। वहीं डेमोक्रेटिक समर्थकों में बेहद उत्साहित होकर वोट देने की इच्छा जताने वालों की संख्या 17 प्रतिशत अधिक थी। सीबीएस न्यूज के एग्जिट पोल में भी सामने आया कि रिपब्लिकन मतदाताओं के लिए ट्रंप का समर्थन पहले के मुकाबले कम महत्वपूर्ण हो गया था। वहीं डेमोक्रेटिक मतदाताओं में ट्रंप के विरोध में मतदान करने की प्रेरणा काफी मजबूत थी।