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Analysis: क्या सैन्य ताकत में अमेरिका-इस्राइल का मुकाबला कर पाएगा ईरान, रूस और चीन इस जंग में दखल देंगे?
Sat, 28 Feb 2026 03:58 PM IST
Kirtivardhan Mishra
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: Kirtivardhan Mishra
Updated Sat, 28 Feb 2026 03:58 PM IST
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सार
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इस्राइल-अमेरिका के साझा हमले का ईरान पर पड़ेगा असर।
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
इस्राइल और अमेरिका ने संयुक्त अभियान में ईरान पर हमला बोला है। जवाबी कार्रवाई में ईरान ने भी इस्राइल पर बैलिस्टिक मिसाइलों से पलटवार किया। इतना ही नहीं ईरान ने पश्चिम एशिया में मौजूद अमेरिका के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। इनमें जॉर्डन से लेकर कुवैत और सऊदी अरब से बहरीन तक में अमेरिकी बेसेज पर हमले किए गए हैं।इस बीच अमर उजाला ने दो पूर्व-राजनयिकों- दिलीप सिन्हा और दीपक वोहरा से इस ताजा संघर्ष को लेकर चर्चा की और जाना कि आखिर अमेरिका-इस्राइल बनाम ईरान के मुकाबले के क्या मायने हैं? इस संघर्ष की वजह क्या रही है और अब आगे क्या हो सकता है?
अमेरिका-इस्राइल बनाम ईरान के मुकाबले के मायने
पूर्व राजनयिक दिलीप सिन्हा के अनुसार, यह युद्ध इस बात का संकेत है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पूरी तरह से टूट चुकी है। शीत युद्ध के समय के विपरीत, अब महाशक्तियां यह मानने लगी हैं कि वे कूटनीति के बजाय युद्ध करके अपने राष्ट्रीय लक्ष्यों को हासिल कर सकती हैं, जो कि विश्व के लिए एक बहुत खतरनाक स्थिति है। अमेरिका और इस्राइल की ईरान के साथ यह दुश्मनी 1979 के सत्ता परिवर्तन के समय से ही चली आ रही है।
पूर्व राजनयिक दीपक वोहरा के मुताबिक, यह मुकाबला अब फाइट टू द फिनिश बन चुका है। अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का स्पष्ट मानना है कि ईरान की वर्तमान सरकार नंबर वन स्टेट स्पॉन्सर ऑफ टेररिज्म (आतंकवाद की सबसे बड़ी प्रायोजक) है और इस आतंकी और कट्टरपंथी सरकार का जाना अब तय है।
ये भी पढ़ें: 'हथियार डालें या मौत का सामना करें': ईरान पर अमेरिका-इस्राइल का साझा हमला; ट्रंप की दो टूक, जानिए बड़ी बातें
पूर्व राजनयिक दिलीप सिन्हा के अनुसार, यह युद्ध इस बात का संकेत है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पूरी तरह से टूट चुकी है। शीत युद्ध के समय के विपरीत, अब महाशक्तियां यह मानने लगी हैं कि वे कूटनीति के बजाय युद्ध करके अपने राष्ट्रीय लक्ष्यों को हासिल कर सकती हैं, जो कि विश्व के लिए एक बहुत खतरनाक स्थिति है। अमेरिका और इस्राइल की ईरान के साथ यह दुश्मनी 1979 के सत्ता परिवर्तन के समय से ही चली आ रही है।
पूर्व राजनयिक दीपक वोहरा के मुताबिक, यह मुकाबला अब फाइट टू द फिनिश बन चुका है। अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का स्पष्ट मानना है कि ईरान की वर्तमान सरकार नंबर वन स्टेट स्पॉन्सर ऑफ टेररिज्म (आतंकवाद की सबसे बड़ी प्रायोजक) है और इस आतंकी और कट्टरपंथी सरकार का जाना अब तय है।
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अमेरिका को ईरान पर फिर हमले की जरूरत क्यों पड़ी?
दिलीप सिन्हा स्पष्ट करते हैं कि पिछले साल के हमले का उद्देश्य ईरान के परमाणु संस्थानों को नष्ट करना था, लेकिन इस ताजा हमले का एकमात्र और खुला उद्देश्य ईरान में सत्ता परिवर्तन करना है। अमेरिका और इस्राइल जानबूझकर सैन्य ठिकानों और उच्च अधिकारियों को निशाना बना रहे हैं, ताकि ईरान की जनता के भीतर हिम्मत आए और वे स्वयं विद्रोह करके इस सत्ता को पलट दें।
दीपक वोहरा बताते हैं कि अमेरिका का मानना है कि जिनेवा में हो रही परमाणु वार्ता महज एक बकवास थी, जिसका इस्तेमाल ईरान समय काटने के लिए कर रहा था। ट्रंप ने ठान लिया है कि ईरान के पास उनकी जिंदगी में कभी परमाणु हथियार नहीं होंगे। अमेरिका ने पिछले साल ईरान को चेतावनी दी थी और केवल उनके परमाणु ठिकानों को ही निशाना बनाया था, लेकिन ईरान के न मानने और लगातार उकसावे के कारण अमेरिका अब ईरान की पूरी मिलिट्री कैपेबिलिटी को ध्वस्त कर रहा है।
दिलीप सिन्हा स्पष्ट करते हैं कि पिछले साल के हमले का उद्देश्य ईरान के परमाणु संस्थानों को नष्ट करना था, लेकिन इस ताजा हमले का एकमात्र और खुला उद्देश्य ईरान में सत्ता परिवर्तन करना है। अमेरिका और इस्राइल जानबूझकर सैन्य ठिकानों और उच्च अधिकारियों को निशाना बना रहे हैं, ताकि ईरान की जनता के भीतर हिम्मत आए और वे स्वयं विद्रोह करके इस सत्ता को पलट दें।
दीपक वोहरा बताते हैं कि अमेरिका का मानना है कि जिनेवा में हो रही परमाणु वार्ता महज एक बकवास थी, जिसका इस्तेमाल ईरान समय काटने के लिए कर रहा था। ट्रंप ने ठान लिया है कि ईरान के पास उनकी जिंदगी में कभी परमाणु हथियार नहीं होंगे। अमेरिका ने पिछले साल ईरान को चेतावनी दी थी और केवल उनके परमाणु ठिकानों को ही निशाना बनाया था, लेकिन ईरान के न मानने और लगातार उकसावे के कारण अमेरिका अब ईरान की पूरी मिलिट्री कैपेबिलिटी को ध्वस्त कर रहा है।
इस संघर्ष में अब आगे क्या हो सकता है?
हवाई युद्ध और आंतरिक विद्रोह: दिलीप सिन्हा के अनुसार, इस युद्ध में थल सेना के जमीन पर उतरने की कोई संभावना नहीं है; यह मुख्य रूप से हवाई हमलों तक सीमित रहेगा। दोनों देशों का लक्ष्य केवल इतना है कि लगातार बमबारी करके वहां इतना दबाव बनाया जाए कि ईरान की जनता खुद अपने नेताओं को उखाड़ फेंके।ईरान की हार और भारी तबाही की आशंका: दीपक वोहरा का दावा है कि सैन्य ताकत में ईरान कहीं से भी अमेरिका और इस्राइल के सामने नहीं टिकता। अगर ईरान ने जवाबी कार्रवाई में अमेरिकी बेस पर हमला किया, तो नाटो (NATO) का 'आर्टिकल 5' लागू हो जाएगा, जिसके बाद ईरान का वही हश्र होगा जो लीबिया में गद्दाफी का हुआ था। अगर ईरान ने पंगा लेना जारी रखा, तो उसके सिविलियन और ऑयल इंफ्रास्ट्रक्चर को भी तबाह कर दिया जाएगा, जिससे ईरान की पहले से कमजोर अर्थव्यवस्था पूरी तरह ढह जाएगी।
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रूस और चीन का दखल नहीं: दोनों ही राजनयिक मानते हैं कि इस युद्ध में ईरान को अपने सहयोगियों से कोई खास मदद नहीं मिलेगी। चीन का ध्यान अपने प्रशांत महासागर के क्षेत्र पर है और वह आर्थिक व राजनीतिक रूप से किसी बड़े युद्ध में पड़ने की स्थिति में नहीं है। वहीं रूस खुद यूक्रेन युद्ध में फंसा हुआ है, इसलिए वह सीधे तौर पर कोई सैन्य हस्तक्षेप नहीं कर पाएगा।
भविष्य में भारत की मध्यस्थता: वोहरा का मानना है कि भारत की कूटनीति दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है और उसके अमेरिका और ईरान दोनों से संबंध अच्छे हैं। भविष्य में जब ईरान में नई सरकार का गठन होगा, तब वैश्विक स्तर पर भारत और प्रधानमंत्री मोदी से शांति स्थापना के लिए दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता करने की उम्मीद की जा सकती है।
भविष्य में भारत की मध्यस्थता: वोहरा का मानना है कि भारत की कूटनीति दुनिया में सर्वश्रेष्ठ है और उसके अमेरिका और ईरान दोनों से संबंध अच्छे हैं। भविष्य में जब ईरान में नई सरकार का गठन होगा, तब वैश्विक स्तर पर भारत और प्रधानमंत्री मोदी से शांति स्थापना के लिए दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता करने की उम्मीद की जा सकती है।