{"_id":"688105086a240b043b033706","slug":"united-nations-strict-on-climate-crisis-international-court-said-ignoring-it-would-be-violation-of-law-2025-07-23","type":"story","status":"publish","title_hn":"UN: जलवायु संकट पर संयुक्त राष्ट्र सख्त, अंतरराष्ट्रीय अदालत ने कहा- इसे नजरअंदाज करना होगा कानून का उल्लंघन","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
UN: जलवायु संकट पर संयुक्त राष्ट्र सख्त, अंतरराष्ट्रीय अदालत ने कहा- इसे नजरअंदाज करना होगा कानून का उल्लंघन
Wed, 23 Jul 2025 09:24 PM IST
हिमांशु चंदेल
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, हेग
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, हेग
Published by: हिमांशु चंदेल
Updated Wed, 23 Jul 2025 09:24 PM IST
सार
संयुक्त राष्ट्र की शीर्ष अदालत ने कहा है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने में विफल होना अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन हो सकता है। इस फैसले को वानुअतु और 130 से अधिक देशों का समर्थन प्राप्त है। अदालत ने स्वच्छ और टिकाऊ पर्यावरण को मानवाधिकार माना है।
विज्ञापन
संयुक्त राष्ट्र का झंडा
- फोटो : ANI
विस्तार
संयुक्त राष्ट्र की शीर्ष अदालत (इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस) ने बुधवार को एक ऐतिहासिक एलान किया है। इसमें कहा गया कि अगर देश जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए जरूरी कदम नहीं उठाते हैं, तो यह अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन माना जा सकता है। अदालत ने इसे मानवता के लिए तत्काल और अस्तित्व का संकट बताया है।
अदालत के अध्यक्ष यूजी इवासावा ने सुनवाई में कहा कि अगर कोई देश जलवायु की रक्षा के लिए उचित कार्रवाई नहीं करता है, तो उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गलत आचरण माना जा सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि एक स्वच्छ, स्वस्थ और टिकाऊ पर्यावरण एक मानवाधिकार है। यह निर्णय भविष्य में कई कानूनी कार्रवाइयों का रास्ता खोल सकता है।
130 से अधिक देशों ने किया समर्थन
यह मामला वानुअतु जैसे प्रशांत द्वीप देश की अगुवाई में लाया गया था, जिसे 130 से ज्यादा देशों का समर्थन प्राप्त था। 2023 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने आईसीजे से यह राय मांगी थी कि देशों की जलवायु परिवर्तन से निपटने की कानूनी जिम्मेदारियां क्या हैं, और अगर वे इसमें विफल रहते हैं तो कानूनी परिणाम क्या हो सकते हैं।
विज्ञापन
छोटे द्वीप देशों का अस्तित्व संकट में
वानुअतु के अटॉर्नी जनरल अर्नोल्ड लफमैन ने अदालत में कहा, 'हमारे लोगों का अस्तित्व खतरे में है।' रिपोर्ट के अनुसार, 2013 से 2023 के बीच समुद्र का स्तर औसतन 4.3 सेमी बढ़ा, और पैसिफिक क्षेत्र में यह और अधिक रहा। जीवाश्म ईंधनों के जलने से पृथ्वी पहले ही 1.3 डिग्री सेल्सियस गर्म हो चुकी है।
ये भी पढ़ें- एक कानून को दी मंजूरी और खतरे में पड़ गई जेलेंस्की की कुर्सी, लोग बोले- ये लोकतंत्र से विश्वासघात है
रूस-अमेरिका जैसे देश फैसले के खिलाफ
जहां छोटे देश और पर्यावरण कार्यकर्ता अदालत के फैसले का स्वागत कर रहे हैं, वहीं अमेरिका और रूस जैसे बड़े तेल उत्पादक देश इस राय के खिलाफ हैं। हालांकि संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने कहा कि जीवाश्म ईंधन से चिपके रहना आर्थिक रूप से नुकसानदेह साबित होगा।
ये भी पढ़ें- घर खरीदारों से धोखाधड़ी और जालसाजी कर एकत्रित किए थे 1000 करोड़, सात साल बाद गिरफ्त में आए तीनों भगोड़े
कानूनी जीत की ओर बड़ा कदम
यह सलाह भले ही बाध्यकारी न हो, लेकिन यह अंतरराष्ट्रीय कानून में जलवायु परिवर्तन पर जवाबदेही तय करने की दिशा में एक बड़ी जीत मानी जा रही है। इससे पहले यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय और नीदरलैंड्स की अदालतों ने भी जलवायु सुरक्षा को मानवाधिकार से जोड़ा है। इससे दुनिया भर के नागरिक अब अपने-अपने देशों में जलवायु कार्रवाई की मांग करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
विज्ञापन
अदालत के अध्यक्ष यूजी इवासावा ने सुनवाई में कहा कि अगर कोई देश जलवायु की रक्षा के लिए उचित कार्रवाई नहीं करता है, तो उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गलत आचरण माना जा सकता है। अदालत ने यह भी कहा कि एक स्वच्छ, स्वस्थ और टिकाऊ पर्यावरण एक मानवाधिकार है। यह निर्णय भविष्य में कई कानूनी कार्रवाइयों का रास्ता खोल सकता है।
विज्ञापन
130 से अधिक देशों ने किया समर्थन
यह मामला वानुअतु जैसे प्रशांत द्वीप देश की अगुवाई में लाया गया था, जिसे 130 से ज्यादा देशों का समर्थन प्राप्त था। 2023 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने आईसीजे से यह राय मांगी थी कि देशों की जलवायु परिवर्तन से निपटने की कानूनी जिम्मेदारियां क्या हैं, और अगर वे इसमें विफल रहते हैं तो कानूनी परिणाम क्या हो सकते हैं।
विज्ञापन
छोटे द्वीप देशों का अस्तित्व संकट में
वानुअतु के अटॉर्नी जनरल अर्नोल्ड लफमैन ने अदालत में कहा, 'हमारे लोगों का अस्तित्व खतरे में है।' रिपोर्ट के अनुसार, 2013 से 2023 के बीच समुद्र का स्तर औसतन 4.3 सेमी बढ़ा, और पैसिफिक क्षेत्र में यह और अधिक रहा। जीवाश्म ईंधनों के जलने से पृथ्वी पहले ही 1.3 डिग्री सेल्सियस गर्म हो चुकी है।
ये भी पढ़ें- एक कानून को दी मंजूरी और खतरे में पड़ गई जेलेंस्की की कुर्सी, लोग बोले- ये लोकतंत्र से विश्वासघात है
रूस-अमेरिका जैसे देश फैसले के खिलाफ
जहां छोटे देश और पर्यावरण कार्यकर्ता अदालत के फैसले का स्वागत कर रहे हैं, वहीं अमेरिका और रूस जैसे बड़े तेल उत्पादक देश इस राय के खिलाफ हैं। हालांकि संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने कहा कि जीवाश्म ईंधन से चिपके रहना आर्थिक रूप से नुकसानदेह साबित होगा।
ये भी पढ़ें- घर खरीदारों से धोखाधड़ी और जालसाजी कर एकत्रित किए थे 1000 करोड़, सात साल बाद गिरफ्त में आए तीनों भगोड़े
कानूनी जीत की ओर बड़ा कदम
यह सलाह भले ही बाध्यकारी न हो, लेकिन यह अंतरराष्ट्रीय कानून में जलवायु परिवर्तन पर जवाबदेही तय करने की दिशा में एक बड़ी जीत मानी जा रही है। इससे पहले यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय और नीदरलैंड्स की अदालतों ने भी जलवायु सुरक्षा को मानवाधिकार से जोड़ा है। इससे दुनिया भर के नागरिक अब अपने-अपने देशों में जलवायु कार्रवाई की मांग करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं।