लोकतंत्र से इस तरह क्यों ऊब गए ट्यूनिशिया के लोग? 'तानाशाही' को मिल रहा है जन समर्थन
ये हकीकत है कि साल 2011 में हुई क्रांति के बाद ट्यूनिशिया में आमलोगों के जीवन स्तर में गिरावट आई है। बीते दस साल में कई गठबंधन सरकारें बनीं, जो अर्थव्यवस्था को संभालने में नाकाम रहीं। कोरोना महामारी ने हालत और बिगाड़ दी है...
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ट्यूनिशिया में लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार को बर्खास्त करने के राष्ट्रपति के फैसले को लगातार जन समर्थन मिल रहा है। इससे ये आशंका गहराई गई है कि राष्ट्रपति कैश सईद देश में अपनी तानाशाही कायम कर सकते हैं। पश्चिमी मीडिया की रिपोर्टों में आम लोगों से जो बातचीत प्रकाशित हुई है, उनमें ज्यादातर मामलों में लोग राष्ट्रपति का समर्थन करते देखे गए हैं। इनमें वो लोग भी शामिल हैं, जिन्होंने 2011 में लोकतंत्र स्थापित करने के लिए हुए प्रदर्शनों में भाग लिया था।
दस साल पहले तत्कालीन राष्ट्रपति बेन अली के लंबे शासनकाल के खिलाफ हुए उन प्रदर्शनों में सक्रिय भूमिका निभाने वाले हिशेम जेलासी ने ब्रिटिश अखबार द फाइनेंशियल टाइम्स से कहा- ‘राष्ट्रपति ने बहुत अच्छा काम किया है। मैं कैश सईद के साथ हूं और सभी लोग उनके साथ हैं। क्या आपको मालूम है कि गरीबी और हाशिये पर जिंदगी गुजारने का मतलब क्या होता है? राष्ट्रपति हमारी पीड़ा को समझते हैं।’
ये हकीकत है कि साल 2011 में हुई क्रांति के बाद ट्यूनिशिया में आमलोगों के जीवन स्तर में गिरावट आई है। बीते दस साल में कई गठबंधन सरकारें बनीं, जो अर्थव्यवस्था को संभालने में नाकाम रहीं। कोरोना महामारी ने हालत और बिगाड़ दी है। इसी से भड़के जन असंतोष का फायदा उठाते हुए कैश सईद ने निर्वाचित सरकार को बर्खास्त कर सत्ता अपने हाथ में ले ली। उन्होंने संसद को 30 दिन के लिए निलंबित कर दिया है और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने के एलान किया है।
राष्ट्रपति के इस कदम के बाद हुए एक जनमत सर्वे में 84 फीसदी लोगों ने उनके कदम का समर्थन किया। ये सर्वे एमरहोड नाम की एजेंसी ने किया। गौरतलब है कि दस साल पहले ट्यूनिशिया से शुरू हुआ लोकतंत्र समर्थक आंदोलन कई देशों में फैल गया था। उसे अरब स्प्रिंग (यानी अरब वसंत) कहा गया था। उनमें मिस्र जैसे देश में सत्ता परिवर्तन भी हुआ। लेकिन मिस्र में तानाशाही फिर से लौट आई। सीरिया और यमन जैसे देशों में गृह युद्ध शुरू हो गया। ट्यूनिशिया उनके बीच अपवाद था। उसे अरब स्प्रिंग के बीच सफलता की एकमात्र कहानी कहा जाता था। लेकिन इस बीच देश में गरीबी बढ़ी। इससे ऐसा लगता है कि लोगों के बीच लोकतंत्र का आकर्षण खत्म हो गया है।
चाय बेचने का काम करने वाली आलिया कालिये ने फाइनेंशियल टाइम्स से कहा- ‘मुझे लोकतंत्र या स्वतंत्रता के खो जाने का कोई डर नहीं है। जब नेता हमारा शोषण करते हैं और हमारी जिंदगी को तबाह करते हैं, तो उसे आजादी नहीं कहा जा सकता। हो सकता है कि अगर बेन अली सत्ता में रहते, तो हमारी आज जैसी हालत नहीं होती।’
लेकिन विपक्ष का आरोप है कि राष्ट्रपति अपनी निजी तानाशाही कायम करने की फिराक में हैं। मगर ऐसा लगता है कि विपक्ष के आरोपों पर जनता ध्यान नहीं दे रही है। अमेरिका की न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में ट्यूनिशिया की विशेषज्ञ मोनिका मार्क्स ने कहा है कि राष्ट्रपति सईद शायद मिस्र की तरह अपनी पूरी तानाशाही कायम नहीं कर पाएंगे। लेकिन दूसरे विशेषज्ञों का कहना है कि राष्ट्रपति सईद लोकतंत्र को भारी नुकसान पहुंचा चुके हैं।