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अब खुला राज: राजपक्षे परिवार की लापरवाहियों ने श्रीलंका को इस हाल तक पहुंचाया, सरकार ने मानी यह बात
Wed, 18 May 2022 04:24 PM IST
अभिषेक दीक्षित
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, कोलंबो
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, कोलंबो
Published by: अभिषेक दीक्षित
Updated Wed, 18 May 2022 04:24 PM IST
सार
आलोचकों का आरोप है कि देश की अर्थव्यवस्था मजबूत करने के कदम उठाने के बजाय तत्कालीन राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे सस्ती लोकप्रियता की राजनीति में जुटे रहे।
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गोतबाया राजपक्षे
- फोटो : Google
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विस्तार
श्रीलंका के नए प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने देश की आर्थिक हालत की जो तस्वीर सोमवार को देश के सामने रखी, उससे यह साफ हो गया कि देश की अर्थव्यवस्था लगभग ध्वस्त हो चुकी है। विक्रमसिंघे ने दो टूक कह दिया कि आने वाला समय पीड़ादायक होगा। विश्लेषकों के मुताबिक देश इस हाल में है, इसका अंदाजा यहां लगभग सबको है। अब अच्छी बात सिर्फ यह हुई है कि सरकार ने इसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है।
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विक्रमसिंघे और पिछले महीने वित्त मंत्री बने अली साबरी ने जो तस्वीर पेश की है, उससे लोगों की ये राय मजबूत हुई है कि दो करोड़ 20 लाख आबादी वाले इस देश को राजपक्षे परिवार की अयोग्यता और नाकामियों ने इस बदहाली तक पहुंचाया है। अली साबरी ने बीते चार मई को संसद में कहा था कि हमें अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से पहले ही मदद मांगनी चाहिए थी। अब हाल यह है कि देश को दो साल या उससे भी ज्यादा समय तक मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।
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पर्यवेक्षकों की राय है कि अब जिन बातों की पुष्टि हो रही है, उससे राष्ट्रपति गोटबया राजपक्षे के खिलाफ जारी गुस्सा और भड़क सकता है। सरकार विरोधी आंदोलनकारी पहले से ही उनके इस्तीफे की मांग पर अड़े हुए हैं। अब यह साफ है कि श्रीलंका की मुसीबत की शुरुआत अप्रैल 2019 में कोलंबो और दूसरे शहरों में चर्च और होटलों पर हुए बम धमाकों के साथ ही हो गई थी। उसके बाद कोरोना महामारी की मार पड़ गई। इन वजहों से देश में पर्यटकों का आना बेहद घट गया, जबकि वही देश के विदेशी मुद्रा का सबसे प्रमुख स्रोत रहा है। इस निर्भरता का एक कारण यह भी है कि सरकारों ने दूसरे स्रोतों को विकसित करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।
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विशेषज्ञों के मुताबिक, श्रीलंका के पास प्राकृतिक संसाधनों का बड़ा भंडार है। 2009 में गृह युद्ध खत्म होने के बाद श्रीलंका के पास विदेशी पूंजी को आकर्षित कर औद्योगिक ढांचा खड़ा करने का मौका था। लेकिन उसके लिए जरूरी नीतियां नहीं अपनाई गई। टोक्यो स्थित थिंक टैंक जापान एक्सर्टनल ट्रेड ऑर्गनाइजेशन में श्रीलंका विशेषज्ञ एस्तसुवो अराय ने वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम से कहा है कि श्रीलंका ने निर्यात हो सकने वाली वस्तुओं का उत्पादन शुरू करने कि नीति नहीं अपानी। वह चाय जैसी परंपरागत चीजों के निर्यात पर निर्भर बना रहा।
आलोचकों का आरोप है कि देश की अर्थव्यवस्था मजबूत करने के कदम उठाने के बजाय तत्कालीन राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे सस्ती लोकप्रियता की राजनीति में जुटे रहे। 2015 के चुनाव में उनकी हार के बाद नए राष्ट्रपति मैत्रिपाला सिरिसेना की सरकार ने राजस्व बढ़ाने के लिए ढांचागत सुधार के कुछ कदम उठाए। ऐसा करके उसने 1.5 बिलियन डॉलर का कर्ज आईएमएफ से हासिल किया, लेकिन 2019 के राष्ट्रपति चुनाव में गोटबया राजपक्षे की जीत के साथ राजपक्षे परिवार सत्ता में लौट आया। इसके साथ ही सस्ती लोकप्रियता की राजनीति फिर शुरू कर दी गई।
गोटबया राजपक्षे ने सत्ता में आते ही प्रत्यक्ष करों में बड़ी छूट का एलान कर दिया। उससे श्रीलंका के राजकोष को 50 अरब रुपये की क्षति हुई। इस बीच कोविड-19 महामारी आ गई। इससे सरकारी आमदनी को हुए नुकसान की भरपाई करने के लिए सरकार ने कोई ठोस योजना नहीं बनाई। नतीजा यह हुआ कि 2022 आते-आते गंभीर संकट खड़ा हो गया, जिसका विवरण अब विक्रमसिंघे और अली साबरी ने दिया है।