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Oil Deal: यूरोप ने ईरान परमाणु डील कराने में झोंकी अपनी पूरी ताकत, गहराते ऊर्जा संकट से हुए त्रस्त!

Tue, 23 Aug 2022 06:48 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, तेहरान
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, तेहरान Published by: Harendra Chaudhary Updated Tue, 23 Aug 2022 06:48 PM IST
सार

Oil Deal: विश्लेषकों के मुताबिक पश्चिमी देशों की इस प्राथमिकता का कारण वहां लगातार गहरा रहा ऊर्जा संकट है। उनका आकलन है कि अगर परमाणु डील पर दस्तखत हो गए, तो ईरान से लाखों बैरल कच्चे तेल की विश्व बाजार में आवक होगी...

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Oil Deal: European countries wants to revive Iran nuclear deal to handle energy crisis
Oil Deal: ईरान परमाणु संयंत्र - फोटो : wikipidia

विस्तार

ईरान परमाणु समझौते को पुनर्जीवित कराने की कोशिश में यूरोपीय देशों ने अचानक नई ताकत झोंक दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन से इस सिलसिले में रविवार को जर्मनी के चांसलर ओलाफ शोल्ज, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने फोन पर बात की। सर्वोच्च स्तर पर हुई इस वार्ता को इस बात का संकेत माना गया है कि ईरान परमाणु डील अब पश्चिमी देशों की खास प्राथमिकता बन गया है।

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विश्लेषकों के मुताबिक पश्चिमी देशों की इस प्राथमिकता का कारण वहां लगातार गहरा रहा ऊर्जा संकट है। उनका आकलन है कि अगर परमाणु डील पर दस्तखत हो गए, तो ईरान से लाखों बैरल कच्चे तेल की विश्व बाजार में आवक होगी। उससे ऊर्जा की महंगाई रोकने में मदद मिलेगी। 2015 के परमाणु डील को फिर से लागू करने के ‘अंतिम प्रस्ताव’ पर बीते सप्ताहांत ईरान ने अपना जवाब भेज दिया। बताया जाता है कि इस प्रस्ताव में प्रावधान है कि ईरान परमाणु बम बनाने की अपनी गतिविधियां रोक देगा। इसके बदले उस पर लगे प्रतिबंधों में ढील दी जाएगी।

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अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के मुताबिक डील पर दस्तखत होने के बाद कुछ ही महीनों के अंदर हजारों बैरल तेल विश्व बाजार में पहुंचा सकेगा। ऊर्जा बाजार के जानकारों के मुताबिक ये डील होने की उम्मीद के कारण ही फिलहाल अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत स्थिर है। कच्चे तेल का बेंचमार्क ब्रेंड क्रूड का अगस्त में भाव 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे रहा है।

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विश्लेषकों के मुताबिक यूरोपियन यूनियन (ईयू) ने रूस के समुद्र से निकाले गए कच्चे तेल पर जो प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है, वह अगले पांच दिसंबर से लागू होगा। इसलिए पश्चिमी देश चाहते हैं कि तब तक ईरान से इतने तेल की आपूर्ति होने लगे। उस स्थिति में ये देश रूसी आयात पर प्रतिबंध के खराब असर से वे बच जाएंगे। मार्केट एजेंसी- आरबीसी कैपिटल मार्केट्स में कॉमोडिटी रिसर्च विभाग की प्रमुख हेलिमा क्रॉफ्ट ने वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम से कहा- ‘ईरान से समझौता होने का ज्यादा लाभ यूरोपीय देशों को मिलेगा। फिलहाल आशंका है कि रूस पर लगाए गए प्रतिबंध के दिसंबर में लागू होते ही यूरोप को ऊर्जा की भारी कमी का सामना करना पड़ेगा।’

पांच दिसंबर से जर्मनी और पोलैंड ने रूस से पाइपलाइन से आने वाले तेल का आयात रोकने की घोषणा कर रखी है। उससे वहां प्रति दिन 20 लाख बैरल रूसी तेल का आना रुक जाएगा। वैश्विक तेल बाजार का विश्लेषण करने वाली एजेंसी वंदा इनसाइट्स की संस्थापक वंदना हरि ने कहा है- ‘यूरोप समुद्र के रास्ते आने वाले रूसी तेल का आयात रोकना चाहता है, लेकिन उसके पास विकल्पों की कमी है। यही वजह है कि ईयू ने ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।’

विशेषज्ञों का अनुमान है कि डील होने के बाद तीन महीनों के अंदर ईरान नौ लाख बैरल कच्चे तेल की प्रति दिन आपूर्ति कर सकेगा। रूस से प्रति दिन यूरोप में 37 लाख बैरल तेल आता है। अनुमान है कि ईरान छह महीनों के अंदर इस पूरे तेल की भरपाई करने में सक्षम हो जाएगा।

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