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स्विस बैंकों में क्यों रखा जाता है 'पैसा', किस देश का कितना जमा, कैसे पहुंचती है रकम

Wed, 03 Jul 2019 04:43 PM IST
अनिल पांडेय अनिल पांडेय, नई दिल्ली
अनिल पांडेय, नई दिल्ली Published by: अनिल पांडेय Updated Wed, 03 Jul 2019 04:43 PM IST
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सार
  • 2018 में स्विस बैंकों में कुल जमा रकम का 26 प्रतिशत हिस्सा ब्रिटेन के लोगों का
  • 2018 में स्विस बैंकों में भारतीयों की जमा रकम करीब 6757 करोड़ रुपये
  • स्विस बैंकों में जमा कुल धन का 0.07 प्रतिशत पैसा भारतीय नागरिकों का
  • भारत का स्थान एक पायदान नीचे फिसलकर 74वें स्थान पर आ गया है
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Money parked in Swiss banks India slips one place to 74th, United Kingdom remains on top
स्विस बैंक में भारत का पैसा - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

हाल ही में स्विस बैंकों में जमा रकम को लेकर एक रिपोर्ट जारी हुई थी, जिसमें बताया गया था कि यहां के बैंकों में सबसे ज्यादा पैसा ब्रिटेन का है। स्विस नेशनल बैंक (एसएनबी) की रिपोर्ट के मुताबिक, 2018 में कुल जमा रकम का 26 फीसदी हिस्सा ब्रिटेन के कारोबारियों का था। यहां भारतीयों के रकम रखने में धीरे-धीरे कमी आ रही है। भारत इस समय 74वें नंबर पर है।



पिछले साल भारतीयों की जमा रकम में छह फीसदी की कमी आई थी, उस वक्त रैंकिंग 73 थी। स्विस बैंकों में जमा रकम में भारतीयों का हिस्सा 0.07 प्रतिशत है। स्विस बैंकों में पैसा रखने वाले शीर्ष पांच देशों में अमेरिका भी शामिल है। उसके बाद वेस्टइंडीज, फ्रांस और हांगकांग का नंबर आता है। इन पांच देशों का हिस्सा कुल जमा रकम में 50 प्रतिशत से ज्यादा है।

कैसे जमा होता है पैसा?

18 साल से अधिक उम्र का कोई भी व्यक्ति स्विस बैंक में खाता खोल सकता है। हालांकि, अगर बैंक को ये शक होता है कि पैसा जमा कराने वाला व्यक्ति किसी खास सियासी मकसद से ऐसा कर रहा है या जमा कराया जा रहा पैसा गैर-कानूनी है, तो वो आवेदन खारिज कर सकता है। स्विट्जरलैंड में लगभग 400 बैंक हैं, जिनमें यूबीएस और क्रेडिस सुइस ग्रुप सबसे बड़े हैं और इन दोनों के पास सभी बैंकों की बैलेंस शीट का आधे से ज्यादा बड़ा हिस्सा है।

जिन खातों को यहां गोपनीय रखा जाता है उन्हें 'नंबर्ड अकाउंट' कहते हैं। इस खाते से जुड़ी सारी बातें बिना किसी का नाम लिए केवल अकाउंट नंबर के आधार पर होती हैं। बैंक में कुछ ही लोग होते हैं जो ये जानते हैं कि बैंक खाता किसका है। लेकिन ये अकाउंट आसानी से नहीं मिलते। माना जाता है कि जो लोग पकड़े नहीं जाना चाहते, वो बैंक के क्रेडिट या डेबिट कार्ड या चेक सुविधा नहीं लेते हैं।

वहीं भारत और पड़ोसी देश स्विस बैंकों में पैसा जमा कराने के मामले में काफी पीछे हैं। इस सूची में पाकिस्तान 82, बांग्लादेश 89, नेपाल 109, श्रीलंका 141, म्यांमार 187 और भूटान 193वें नंबर पर है। 1996 से 2007 तक भारत टॉप 50 देशों में शामिल था। 2007 के बाद भारत की रैंकिंग में गिरावट आनी शुरू हुई। 2018 में भारतीयों की जमा रकम में 6 फीसदी की कमी देखी गई। तब यह करीब 6757 करोड़ रुपये थी।

  • 2008 में 55
  • 2009 में 59
  • 2011 में 55
  • 2012 में 71
  • 2013 में 58वें नंबर पर था।

लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम का फायदा

सरकार ने कहा है कि स्विस बैंक में जमा पूरी रकम को कालाधन मानना गलत है। स्विस नेशनल बैंक की रिपोर्ट में इस धन को उसके ग्राहकों के प्रति देनदारी के रूप में दिखाया गया है, इसलिए यह स्पष्ट नहीं होता कि इसमें से कितना कालाधन है। लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (एलआरएस) इसके पीछे एक बड़ा कारण हो सकती है।

मोदी सरकार के शुरुआती तीन साल में स्विस बैंकों में भारतीयों का पैसा लगातार घट रहा था। लेकिन चौथे साल में पहली बार यह रकम अचानक से 50 फीसदी तक बढ़ गई। यह 13 साल में सबसे तेज बढ़ोतरी थी। वर्ष 2004 में स्विस बैंकों में भारतीयों का पैसा 56 प्रतिशत तक बढ़ा था। स्विस बैंकों में भारतीयों के जमा 6757 करोड़ में से कस्टमर डिपॉजिट लगभग आधार है।

हर भारतीय 2.50 लाख डॉलर जमा करा सकता है

दरअसल विदेशों में पैसे जमा कराना लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम के तहत जायज है। यह योजना पूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम के कार्यकाल में 4 फरवरी 2014 को शुरू हुई थी। उस समय इसके तहत मात्र 25 हजार डॉलर विदेश ले जाने की इजाजत थी। वर्तमान में इसके तहत कोई भी व्यक्ति प्रतिवर्ष 2.50 लाख डॉलर तक बाहर भेज सकता है।

 

यह संभव है कि स्विस नेशनल बैंक में जमा रकम का एक बड़ा हिस्सा लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम के तहत ही जमा किया गया हो। पिछली सरकार में कार्यवाहक वित्तमंत्री पीयूष गोयल का मानना था कि 40 प्रतिशत से अधिक की धनराशि इसी स्कीम के तहत जमा की गई हो सकती है। कुछ इसी तरह के विचार वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी व्यक्त किए थे और कहा था कि सारा पैसा टैक्स चोरी का नहीं हो सकता।

ब्रिटेन टॉप परः स्विस बैंकों में वैश्विक स्तर पर नागरिक और कंपनियों द्वारा धन जमा कराने के मामले में 2017 से ब्रिटेन शीर्ष पर बना हुआ है, जबकि अमेरिका दूसरे नंबर पर है।

हर वर्ष जारी होती है रिपोर्ट

स्विट्जरलैंड के केंद्रीय बैंक द्वारा इन आधिकारिक आंकड़ों को सालाना आधार पर जारी किया जाता है। अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि भारतीय और अन्य देशों के लोग अपनी अवैध कमाई को स्विस बैंकों में जमा कराते हैं, जिसे कर से बचने की सुरक्षित पनाहगाह माना जाता है। हालांकि स्विट्जरलैंड ने भारत समेत कई देशों के साथ स्वत: सूचना साझा करने की संधि पर हस्ताक्षर किए हैं।

स्विस बैंक क्यों बनता है ब्लैक मनी का गढ़

स्विट्जरलैंड में जितने भी बैंक हैं उन्हें स्विस बैंक कहा जाता है। स्विट्जरलैंड टैक्स हैवन के नाम से जाना जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि आप यहां जितना भी पैसा जमा कर लें आपको बेहद मामूली कर के रूप में भगुतान करना होता है। साथ ही हर देश की तरह स्विट्जरलैंड में भी बैंक सीक्रेसी लॉ (गोपनीयता कानून) लागू होता है। लेकिन यहां पर कानून थोड़ा अलग है। स्विस बैंकिंग एक्ट (1934) के तहत बैंक अपने खाताधारकों की जानकारी उनकी अनुमति के बिना सार्वजनिक नहीं करता है।

 

इतना ही नहीं अगर खाताधारक अपने देश में वित्तीय अनियमितता में लिप्त है और स्विट्जरलैंड में उस पर ऐसा कोई मामला नहीं है तो पुलिस से लेकर अदालत तक बैंक से उसके ग्राहक के बारे में कोई जानकारी नहीं मांग सकते हैं। स्विस बैंककर्मी किसी खाते की जानकारी लीक करता है तो उसे छह महीने की कैद के अलावा 50,000 फ्रैंक्स तक का जुर्माना हो सकता है।

भारत ने मांगे थे कालाधन रखने वालों के नाम

स्विट्जरलैंड ने स्विस बैंकों में संदिग्ध धन रखने वाले भारतीय खाताधारकों पर कार्रवाई के लिए भारत के साथ संबंधित सूचनाएं साझा करने की प्रक्रिया तेज करते हुए एक दर्जन से ज्यादा भारतीय नामों का खुलासा किया है। इससे पहले 14 व्यक्तियों लोगों के बारे में सूचना साझा करने से पहले उनको नोटिस जारी किए गए थे। नियमों के तहत इस तरह के नोटिस उन्हें उनके खातों के बारे में भारत सरकार को जानकारी देने से खिलाफ अपील करने का एक अंतिम मौका देने के लिए जारी किए जाते हैं।

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