{"_id":"6a7b1d38f2ddde0bf40dfe29","slug":"mecca-defence-pact-saudi-pakistan-turkiye-military-analysis-modern-diplomacy-report-2026-08-11","type":"story","status":"publish","title_hn":"तीन देश, एक रक्षा संधि: क्या जंग में साथ खड़े होंगे पाकिस्तान-सऊदी और तुर्किये? मक्का पैक्ट पर उठे सवाल","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
तीन देश, एक रक्षा संधि: क्या जंग में साथ खड़े होंगे पाकिस्तान-सऊदी और तुर्किये? मक्का पैक्ट पर उठे सवाल
Tue, 11 Aug 2026 06:31 PM IST
राकेश कुमार
आईएएनएस, सोफिया
आईएएनएस, सोफिया
Published by: राकेश कुमार
Updated Tue, 11 Aug 2026 06:31 PM IST
सार
सऊदी अरब केवल अमेरिकी सुरक्षा गारंटी पर निर्भर रहने के बजाय अपने लिए वैकल्पिक सुरक्षा विकल्प तैयार कर रहा है। मक्का रक्षा समझौता भविष्य में कितना प्रभावी सैन्य गठबंधन बन पाता है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि तीनों देश इसकी अस्पष्टताओं और कमियों को किस हद तक दूर करते हैं। बुल्गारिया की 'मॉडर्न डिप्लोमेसी' की रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले दावे किए गए हैं।
विज्ञापन
मक्का रक्षा समझौता।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
सऊदी अरब के मक्का में सात अगस्त को एक त्रिपक्षीय रक्षा समझौता हुआ। इसमें पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये शामिल हैं। लेकिन बुल्गारिया स्थित 'मॉडर्न डिप्लोमेसी' की रिपोर्ट ने इस पर कई गंभीर सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, यह समझौता तब तक सिर्फ कागजी बयानबाजी बनकर रह सकता है, जब तक कि इसमें हमले की स्थिति, सैन्य कार्रवाई का समय और तीनों सेनाओं के बीच तालमेल को पूरी तरह साफ न किया जाए।
क्या मक्का रक्षा समझौता केवल एक दिखावा है?
रिपोर्ट में कहा गया है कि सात अगस्त को हुए इस समझौते को पारंपरिक या पूरी तरह व्यवस्थित सैन्य गठबंधन नहीं माना जा सकता। इसके बजाय, यह महज एक 'बैकअप प्लान' नजर आता है। तीनों मध्यम शक्तियां ऐसे समय में खुद को तैयार कर रही हैं, जब उन्हें बड़ी शक्तियों की सुरक्षा गारंटी पर पूरा भरोसा नहीं रह गया है। हालांकि, इस समझौते की भाषा काफी अस्पष्ट रखी गई है। इसमें ऐसी कोई कानूनी बाध्यता नहीं है कि किसी एक सदस्य पर हमला होने पर बाकी दो देश अनिवार्य रूप से युद्ध में उतरेंगे ही।
समझौते में 'एक सदस्य पर हमला, तीनों पर हमला माना जाएगा' जैसी शब्दावली का प्रयोग किया गया है। यह भाषा नाटो के अनुच्छेद-5 की याद दिलाती है। ऐसे प्रावधान का मुख्य मकसद संभावित दुश्मन को यह संदेश देकर रोकना होता है कि एक देश पर हमला पूरे समूह का मुकाबला बुलाएगा। लेकिन मक्का समझौते के मामले में स्थिति अलग है। पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये की सुरक्षा चुनौतियां, रणनीतिक हित और बड़ी शक्तियों के साथ संबंध एक-दूसरे से काफी अलग हैं।
विज्ञापन
यह भी पढ़ें: Explainer: जिन्ना-अंग्रेजों के किस धोखे से अलग देश नहीं बन सका बलूचिस्तान, पाकिस्तान से वर्षों से क्यों जारी संघर्ष?
क्या पाकिस्तान हमले की स्थिति में सऊदी अरब का साथ देगा?
रिपोर्ट के अनुसार, सिर्फ यह घोषणा कर देना कि एक पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा, अपने आप में कोई मजबूत सैन्य दबाव पैदा नहीं करता। यह एक राजनीतिक बयान जैसा दिखाई देता है। इसकी अस्पष्टता तीनों देशों को हमले की स्थिति में अपने-अपने हिसाब से कार्रवाई का फैसला करने की पूरी छूट देती है।
रिपोर्ट में पाकिस्तान की रक्षा प्रतिबद्धताओं का उदाहरण भी दिया गया है। जब ईरान की ओर से हमले हुए थे, तब पाकिस्तान ने सऊदी अरब में अपने सैनिक तैनात तो किए थे। लेकिन उसने ईरान के खिलाफ सीधे सैन्य संघर्ष में शामिल होने से दूरी बनाए रखी थी। हालांकि, ईरान ने सऊदी क्षेत्र को बार-बार निशाना बनाया था।
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि जब एक स्पष्ट द्विपक्षीय समझौते के बावजूद पाकिस्तान केवल रक्षात्मक तैनाती तक सीमित रहा और सीधे सैन्य संघर्ष में नहीं उतरा, तो इस ढीले त्रिपक्षीय समझौते से बहुत ज्यादा ठोस सैन्य कार्रवाई की उम्मीद करना मुश्किल है। खासकर तब, जब इसमें तुर्किये के अलग रणनीतिक हितों को भी ध्यान में रखना पड़ेगा।
क्या सऊदी अरब अब अमेरिका पर भरोसा नहीं करता?
अमेरिका-ईरान युद्ध के संदर्भ में रिपोर्ट कहती है कि सऊदी अरब अब अमेरिकी सुरक्षा गारंटी की विश्वसनीयता को लेकर पहले से ज्यादा आशंकित है। खाड़ी क्षेत्र के तेल प्रतिष्ठानों और बुनियादी ढांचे पर हुए ईरानी मिसाइल हमलों ने इन चिंताओं को और बढ़ा दिया है। इन हमलों से यह भी साफ हुआ कि अमेरिकी सुरक्षा छतरी के बावजूद सऊदी अरब की मुख्य संपतियां कितनी संवेदनशील और असुरक्षित हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, रियाद ने अमेरिका के साथ एक नागरिक परमाणु सहयोग समझौता भी किया है। लेकिन इसमें अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) का अतिरिक्त प्रोटोकॉल शामिल नहीं है। यह प्रोटोकॉल किसी देश की परमाणु गतिविधियों की सबसे कड़ी अंतरराष्ट्रीय निगरानी का प्रावधान करता है।
विज्ञापन
क्या मक्का रक्षा समझौता केवल एक दिखावा है?
रिपोर्ट में कहा गया है कि सात अगस्त को हुए इस समझौते को पारंपरिक या पूरी तरह व्यवस्थित सैन्य गठबंधन नहीं माना जा सकता। इसके बजाय, यह महज एक 'बैकअप प्लान' नजर आता है। तीनों मध्यम शक्तियां ऐसे समय में खुद को तैयार कर रही हैं, जब उन्हें बड़ी शक्तियों की सुरक्षा गारंटी पर पूरा भरोसा नहीं रह गया है। हालांकि, इस समझौते की भाषा काफी अस्पष्ट रखी गई है। इसमें ऐसी कोई कानूनी बाध्यता नहीं है कि किसी एक सदस्य पर हमला होने पर बाकी दो देश अनिवार्य रूप से युद्ध में उतरेंगे ही।
विज्ञापन
समझौते में 'एक सदस्य पर हमला, तीनों पर हमला माना जाएगा' जैसी शब्दावली का प्रयोग किया गया है। यह भाषा नाटो के अनुच्छेद-5 की याद दिलाती है। ऐसे प्रावधान का मुख्य मकसद संभावित दुश्मन को यह संदेश देकर रोकना होता है कि एक देश पर हमला पूरे समूह का मुकाबला बुलाएगा। लेकिन मक्का समझौते के मामले में स्थिति अलग है। पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्किये की सुरक्षा चुनौतियां, रणनीतिक हित और बड़ी शक्तियों के साथ संबंध एक-दूसरे से काफी अलग हैं।
विज्ञापन
यह भी पढ़ें: Explainer: जिन्ना-अंग्रेजों के किस धोखे से अलग देश नहीं बन सका बलूचिस्तान, पाकिस्तान से वर्षों से क्यों जारी संघर्ष?
क्या पाकिस्तान हमले की स्थिति में सऊदी अरब का साथ देगा?
रिपोर्ट के अनुसार, सिर्फ यह घोषणा कर देना कि एक पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा, अपने आप में कोई मजबूत सैन्य दबाव पैदा नहीं करता। यह एक राजनीतिक बयान जैसा दिखाई देता है। इसकी अस्पष्टता तीनों देशों को हमले की स्थिति में अपने-अपने हिसाब से कार्रवाई का फैसला करने की पूरी छूट देती है।
रिपोर्ट में पाकिस्तान की रक्षा प्रतिबद्धताओं का उदाहरण भी दिया गया है। जब ईरान की ओर से हमले हुए थे, तब पाकिस्तान ने सऊदी अरब में अपने सैनिक तैनात तो किए थे। लेकिन उसने ईरान के खिलाफ सीधे सैन्य संघर्ष में शामिल होने से दूरी बनाए रखी थी। हालांकि, ईरान ने सऊदी क्षेत्र को बार-बार निशाना बनाया था।
रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि जब एक स्पष्ट द्विपक्षीय समझौते के बावजूद पाकिस्तान केवल रक्षात्मक तैनाती तक सीमित रहा और सीधे सैन्य संघर्ष में नहीं उतरा, तो इस ढीले त्रिपक्षीय समझौते से बहुत ज्यादा ठोस सैन्य कार्रवाई की उम्मीद करना मुश्किल है। खासकर तब, जब इसमें तुर्किये के अलग रणनीतिक हितों को भी ध्यान में रखना पड़ेगा।
क्या सऊदी अरब अब अमेरिका पर भरोसा नहीं करता?
अमेरिका-ईरान युद्ध के संदर्भ में रिपोर्ट कहती है कि सऊदी अरब अब अमेरिकी सुरक्षा गारंटी की विश्वसनीयता को लेकर पहले से ज्यादा आशंकित है। खाड़ी क्षेत्र के तेल प्रतिष्ठानों और बुनियादी ढांचे पर हुए ईरानी मिसाइल हमलों ने इन चिंताओं को और बढ़ा दिया है। इन हमलों से यह भी साफ हुआ कि अमेरिकी सुरक्षा छतरी के बावजूद सऊदी अरब की मुख्य संपतियां कितनी संवेदनशील और असुरक्षित हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, रियाद ने अमेरिका के साथ एक नागरिक परमाणु सहयोग समझौता भी किया है। लेकिन इसमें अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) का अतिरिक्त प्रोटोकॉल शामिल नहीं है। यह प्रोटोकॉल किसी देश की परमाणु गतिविधियों की सबसे कड़ी अंतरराष्ट्रीय निगरानी का प्रावधान करता है।