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वियतनाम में बोले CJI गवई: 'कानूनी प्रणाली हर नागरिक के लिए सुलभ हो, सुनिश्चित करना वकीलों-जजों की जिम्मेदारी'
Sat, 11 Oct 2025 08:36 PM IST
निर्मल कांत
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, हनोई।
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, हनोई।
Published by: निर्मल कांत
Updated Sat, 11 Oct 2025 08:36 PM IST
सार
सीजेआई बीआर गवई ने कहा कि वकीलों और जजों की यह जिम्मेदारी है कि न्याय प्रणाली देश के हर कोने तक पहुंचे और केवल बड़े शहरों तक सीमित न रहे। उन्होंने वियतनाम के हनोई में एक सम्मेलन के दौरान कहा कि संविधान ने समानता, अवसर और गरिमा का जो सपना दिखाया, वह अब हर नागरिक को सशक्त बनाता है, चाहे वह किसी भी पृष्ठभूमि से हो।
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सीजेआई बीआर गवई
- फोटो : पीटीआई
विस्तार
चीफ जस्टिस (सीजेआई) बीआर गवई ने शनिवार को कहा कि वकीलों और जजों की यह जिम्मेदारी है कि वह न्याय व्यवस्था को मजबूत करें और यह सुनिश्चित करें कि कानूनी प्रक्रिया केवल बड़े शहरों तक सीमित न रहे, बल्कि देश के सबसे दूरदराज के हिस्सों में रहने वाले लोगों तक भी पहुंचे। यह बात उन्होंने वियतनाम की राजधानी हनोई में लावासिया सम्मेलन के दौरान कही, जिसका विषय 'विविधता और समावेशन को बढ़ावा देने में वकीलों और अदालतों की भूमिका' रखा गया था।
सीजेआई ने कहा कि यह जरूरी है कि जज अपने फैसलों में जो सिद्धांत व्यक्त करते हैं, वे अदालत की प्रशासनिक नीतियों में भी दिखाई दें। उन्होंने कहा, जब मैंने मई में भारत के चीफ जस्टिस का पद संभाला, तो मेरी प्राथमिकता यह थी कि अदालत में प्रशासनिक पदों की भर्ती में सकारात्मक पहल केवल कागज पर ही नहीं, बल्कि व्यवहार में भी लागू हो। मैंने निर्देश दिया कि हाशिए पर पड़े समुदायों को सभी प्रशासनिक नियुक्तियों में उनका उचित हिस्सा दिया जाए और यह प्रक्रिया पारदर्शी ढंग से लागू की जाए।
ये भी पढ़ें: 'अमेरिका भारत से संबंधों को बेहद अहम मानता है', नामित राजदूत सर्जियो गोर का बयान
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जस्टिस गवई ने कहा कि गौतम बुद्ध, महात्मा गांधी और भीमराव आंबेडकर का संजोया समानता का सपना 1950 में भारत के संविधान में साकार हुआ, जिससे उन लाखों लोगों की किस्मत बदली, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रखा गया था। उन्होंने कहा, मैं एक निम्न जाति में जन्मा था, इसका मतलब यह था कि मैं अब अछूत नहीं हूं। संविधान ने मेरी गरिमा को हर दूसरे नागरिक के बराबर माना। इसने मुझे केवल सुरक्षा ही नहीं, बल्कि अवसर, स्वतंत्रता और समाज में पहचान पाने का भी वादा दिया।
सीजेआई ने वकीलों से कहा कि वे महिलाओं को सिर्फ इसलिए नौकरी पर रखने में संकोच न करें कि उन्हें मातृत्व अवकाश लेना पड़ सकता है। समय की पाबंदियां हो सकती हैं या प्रतिबद्धता को लेकर गलत धारणाएं हैं। उन्होंने कहा, ऐसे पूर्वाग्रह अनुचित और प्रतिकूल होते हैं। वकीलों की यह जिम्मेदारी है कि वे जिन सिद्धांतों की पैरवी अदालत और सार्वजनिक जीवन में करते हैं, उन्हें अपने कार्यस्थलों और पेशेवर आचरण में भी लागू करें।
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सीजेआई ने कहा कि यह जरूरी है कि जज अपने फैसलों में जो सिद्धांत व्यक्त करते हैं, वे अदालत की प्रशासनिक नीतियों में भी दिखाई दें। उन्होंने कहा, जब मैंने मई में भारत के चीफ जस्टिस का पद संभाला, तो मेरी प्राथमिकता यह थी कि अदालत में प्रशासनिक पदों की भर्ती में सकारात्मक पहल केवल कागज पर ही नहीं, बल्कि व्यवहार में भी लागू हो। मैंने निर्देश दिया कि हाशिए पर पड़े समुदायों को सभी प्रशासनिक नियुक्तियों में उनका उचित हिस्सा दिया जाए और यह प्रक्रिया पारदर्शी ढंग से लागू की जाए।
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जस्टिस गवई ने कहा कि गौतम बुद्ध, महात्मा गांधी और भीमराव आंबेडकर का संजोया समानता का सपना 1950 में भारत के संविधान में साकार हुआ, जिससे उन लाखों लोगों की किस्मत बदली, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रखा गया था। उन्होंने कहा, मैं एक निम्न जाति में जन्मा था, इसका मतलब यह था कि मैं अब अछूत नहीं हूं। संविधान ने मेरी गरिमा को हर दूसरे नागरिक के बराबर माना। इसने मुझे केवल सुरक्षा ही नहीं, बल्कि अवसर, स्वतंत्रता और समाज में पहचान पाने का भी वादा दिया।
सीजेआई ने वकीलों से कहा कि वे महिलाओं को सिर्फ इसलिए नौकरी पर रखने में संकोच न करें कि उन्हें मातृत्व अवकाश लेना पड़ सकता है। समय की पाबंदियां हो सकती हैं या प्रतिबद्धता को लेकर गलत धारणाएं हैं। उन्होंने कहा, ऐसे पूर्वाग्रह अनुचित और प्रतिकूल होते हैं। वकीलों की यह जिम्मेदारी है कि वे जिन सिद्धांतों की पैरवी अदालत और सार्वजनिक जीवन में करते हैं, उन्हें अपने कार्यस्थलों और पेशेवर आचरण में भी लागू करें।
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