{"_id":"6af0961bbba8b4c9ce01ce51","slug":"israel-s-president-officially-gives-opposition-leader-eisenkot-the-first-chance-to-form-the-next-government-2026-11-08","type":"story","status":"publish","title_hn":"क्या बिखरे विपक्ष को एकजुट कर पाएंगे गादी?: राष्ट्रपति ने पहले सरकार बनाने का दिया मौका, जानें क्या हैं विकल्प","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
क्या बिखरे विपक्ष को एकजुट कर पाएंगे गादी?: राष्ट्रपति ने पहले सरकार बनाने का दिया मौका, जानें क्या हैं विकल्प
Sun, 08 Nov 2026 09:02 PM IST
निर्मल कांत
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, यरूशलम
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, यरूशलम
Published by: निर्मल कांत
Updated Sun, 08 Nov 2026 09:02 PM IST
सार
इस्राइल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता पर संकट के बीच राष्ट्रपति इसाक हर्जोग ने विपक्षी नेता गादी आइजेनकोट को सरकार बनाने का पहला मौका दिया है। उन्हें 28 दिन में बहुमत जुटाना होगा। हालांकि, विपक्षी दलों के बीच गहरे मतभेद हैं। अरब पार्टियों का समर्थन भी अहम है। ऐसे में क्या आइजेनकोट विपक्ष को एकजुट कर पाएंगे और नेतन्याहू को सत्ता से बाहर कर सकेंगे? पढ़िए इस रिपोर्ट में।
विज्ञापन
इस्राइली राष्ट्रपति इसाक हर्जोग, विपक्षी नेता और याशर पार्टी के प्रमुख गादी आइजेनकोट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
विस्तार
इस्राइल में नई सरकार के गठन की कवायद शुरू हो गई है। विपक्षी नेता गादी आइजेनकोट को नई सरकार बनाने का मौका दिया गया है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सत्तारूढ़ गठबंधन को अक्तूबर में हुए चुनावों में संसद में बहुमत नहीं मिला। इससे नेतन्याहू के लंबे शासन का अंत होने की संभावना बढ़ गई है।
राष्ट्रपति इसाक हर्जोग ने शनिवार को राजनीतिक दलों से बातचीत के बाद आइजेनकोट को सरकार बनाने के लिए चुना। आइजेनकोट को गठबंधन तैयार करने के लिए 28 दिन का समय दिया गया है। अगर वह इस अवधि में सरकार नहीं बना पाते हैं, तो 14 दिन का अतिरिक्त समय मांग सकते हैं।
आइजेनकोट यशर पार्टी के नेता हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, अब राष्ट्रीय आपातकालीन सरकार बनाने का समय है। मैं यह सुनिश्चित करने के लिए हरसंभव प्रयास करूंगा कि हम इस जिम्मेदारी के योग्य साबित हों।
विज्ञापन
हालांकि, 66 साल के आइजेनकोट के सामने बड़ी चुनौती है। विपक्षी दलों के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा, धर्म और फलस्तीनी क्षेत्रों पर इस्राइली नियंत्रण को लेकर गहरे मतभेद हैं। इस्राइल की 120 सदस्यीय संसद को नेसेट कहा जाता है। इसमें बहुमत के लिए 61 सीटों की जरूरत होती है। आइजेनकोट और नेतन्याहू, दोनों के पास 61 सीटों का समर्थन नहीं है। ऐसे में अरब समर्थित पार्टियों की भूमिका अहम हो सकती है। उनके समर्थन से तय हो सकता है कि इस्राइल में किसकी सरकार बनेगी। हालांकि, आइजेनकोट और उनके संभावित सहयोगी इन पार्टियों के समर्थन पर निर्भर नहीं रहना चाहते।
विपक्ष को एकजुट कर पाएंगे आइजेनकोट?
आइजेनकोट के संभावित गठबंधन में चार पार्टियां शामिल हैं। इनमें उनकी अपनी यशर पार्टी, यायर गोलान के नेतृत्व वाली मध्य-वामपंथी डेमोक्रेट्स पार्टी, नफ्ताली बेनेट की मध्य-दक्षिणपंथी टुगेदर पार्टी और एविगडोर लिबरमैन की दक्षिणपंथी यिस्राएल बेतेनु (इस्राइल हमारा घर) पार्टी शामिल हैं। इन चारों पार्टियों के पास कुल 48 सीटें हैं। यह बहुमत के लिए जरूरी 61 सीटों से काफी कम है।
अरब नेतृत्व वाली दो पार्टियों रआम (संयुक्त सूची) और संयुक्त सूची ने भी आइजेनकोट की सरकार बनाने की कोशिश का समर्थन किया है। संयुक्त सूची में तीन पार्टियां हदाश, ताल और बलाद शामिल हैं। इन दोनों गठबंधनों के पास मिलाकर 19 सीटें हैं। अगर इनका समर्थन मिलता है, तो नेतन्याहू विरोधी खेमे की कुल सीटें 67 हो सकती हैं।
हदाश अरब और यहूदी समुदाय के लोगों की पार्टी है। ताल इस्राइल के फलस्तीनी नागरिकों के अधिकारों की पैरवी करती है। वहीं, बलाद देश के सभी नागरिकों के लिए समान अधिकारों की मांग करती है। हालांकि, आइजेनकोट ने अरब पार्टियों को अपनी सरकार में शामिल करने से इनकार किया है। लिबरमैन भी कई बार कह चुके हैं कि वह ऐसी अल्पमत सरकार बनाने के पक्ष में नहीं हैं, जो अरब पार्टियों के समर्थन पर निर्भर हो।
ये भी पढ़ें: बांग्लादेश: सत्ता बदलने के बाद भी नहीं थम रही राजनीतिक हिंसा, नौ महीने में 94 की मौत; रिपोर्ट में खुलासा
वहीं, गोलान की डेमोक्रेट्स पार्टी रआम और संयुक्त सूची (ज्वाइंट लिस्ट) के साथ मिलकर काम करने के लिए ज्यादा तैयार है। चुनाव के बाद गोलान ने कहा, हमें अब नेतन्याहू के उस नस्लवादी विभाजन को स्वीकार नहीं करना चाहिए, जिसमें यहूदी और अरब वोटों को अलग-अलग देखा जाता है।
नेतन्याहू के पास अब कितनी सीटें बचीं?
नेतन्याहू के धार्मिक और राष्ट्रवादी गठबंधन की सीटें घट गई हैं। साल 2022 में इस गठबंधन के पास 64 सीटें थीं। अब यह संख्या घटकर 53 रह गई है। यानी बहुमत से यह गठबंधन आठ सीट पीछे है।
नेतन्याहू की लिकुड पार्टी सबसे बड़ी अकेली पार्टी है। इसके पास 27 सीटें हैं। वहीं, आइजेनकोट की याशर पार्टी ने 21 सीटें जीती हैं। नेतन्याहू को एक और झटका तब लगा, जब उनकी लंबे समय से सहयोगी रही यूनाइटेड टोरा यहूदी पार्टी ने राष्ट्रपति हर्जोग से बातचीत के दौरान उनका या किसी दूसरे उम्मीदवार का समर्थन करने से इनकार कर दिया।
इस फैसले से नेतन्याहू की सत्ता में वापसी की संभावनाओं को नुकसान पहुंचा है। हालांकि, पार्टी ने भविष्य में गठबंधन को लेकर बातचीत में नेतन्याहू का समर्थन करने का रास्ता बंद नहीं किया है।
इसका फैसला उसकी मांगों पर निर्भर करेगा। इनमें अति-रूढ़िवादी यहूदी समुदाय के लोगों के लिए अनिवार्य सैन्य सेवा का मुद्दा भी शामिल है। यह समुदाय सैन्य सेवा से छूट की मांग करता रहा है।
अल्पमत सरकार क्या होती है और कैसे बन सकती है?
अगर आइजेनकोट गठबंधन बनाने में सफल नहीं होते हैं, तो वह अरब पार्टियों के बाहरी समर्थन से अल्पमत सरकार बना सकते हैं। अल्पमत सरकार तब बनती है, जब सरकार में शामिल पार्टियों के पास संसद में कुल बहुमत नहीं होता। ऐसी सरकार को सत्ता में बने रहने और कानून पास कराने के लिए गठबंधन से बाहर के सांसदों का समर्थन लेना पड़ता है।
आइजेनकोट अपनी चार पार्टियों के गठबंधन के साथ ऐसी सरकार बना सकते हैं। इसके लिए उन्हें रआम और जॉइंट लिस्ट का बाहरी समर्थन लेना होगा। इस व्यवस्था में अरब नेतृत्व वाली पार्टियों को सरकार में मंत्री पद देना जरूरी नहीं होगा। उन्हें औपचारिक रूप से गठबंधन में शामिल करना भी जरूरी नहीं होगा।
इसके बदले ये पार्टियां अपने समर्थन के बदले सरकार से नीतिगत रियायतों की मांग कर सकती हैं। साल 2021 में रआम पार्टी नफ्ताली बेनेट की सरकार में शामिल हुई थी। ऐसा पहली बार हुआ था, जब कोई स्वतंत्र अरब पार्टी इस्राइल के सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा बनी थी।
हालांकि, यह सरकार सिर्फ 18 महीने चल पाई। कब्जे वाले वेस्ट बैंक में अवैध बस्तियों और फलस्तीनी राष्ट्र के गठन को लेकर मतभेदों के कारण सरकार गिर गई। इस्राइल की ज्यादातर पार्टियां दो-राष्ट्र समाधान के तहत एक स्वतंत्र फलस्तीनी देश बनाने का समर्थन नहीं करती हैं।
नेतन्याहू पिछले 20 वर्षों में ज्यादातर समय सत्ता में रहे हैं। उन्होंने खुले तौर पर फलस्तीनी राष्ट्र के गठन का विरोध किया है। उन्होंने कब्जे वाले इलाकों में यहूदी बस्तियों के विस्तार को भी बढ़ावा दिया है। ये बस्तियां फलस्तीनी राष्ट्र के गठन की राह में सबसे बड़ी बाधाओं में शामिल हैं। अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत इन बस्तियों को अवैध माना जाता है।
सरकार बनाने के और कौन से रास्ते हैं?
अल्पमत सरकार के अलावा आइजेनकोट के पास एक और रास्ता है। वह इस्राइल की दो अति-रूढ़िवादी पार्टियों शास और यूनाइटेड टोरा यहूदी को अपने गठबंधन में शामिल कर सकते हैं।
इन दोनों पार्टियों के पास कुल 13 सीटें हैं। अगर ये आइजेनकोट के गठबंधन में शामिल होती हैं, तो उनके पास कुल 61 सीटें हो जाएंगी। यानी बहुमत के लिए जरूरी आंकड़ा पूरा हो जाएगा।
हालांकि, इसके लिए आइजेनकोट को कुछ मुद्दों पर समझौता करना होगा। इनमें अति-रूढ़िवादी धार्मिक छात्रों को सैन्य सेवा से छूट देने का मुद्दा भी शामिल है। यह मुद्दा लंबे समय से इस्राइल की राजनीति में मतभेद की वजह बना हुआ है।
आइजेनकोट और उनके सहयोगी खासकर लिबरमैन इस छूट का विरोध करते रहे हैं। हालांकि, लिबरमैन ने हाल ही में संकेत दिया है कि वह इस मुद्दे पर समझौता करने के लिए तैयार हैं।
विज्ञापन
राष्ट्रपति इसाक हर्जोग ने शनिवार को राजनीतिक दलों से बातचीत के बाद आइजेनकोट को सरकार बनाने के लिए चुना। आइजेनकोट को गठबंधन तैयार करने के लिए 28 दिन का समय दिया गया है। अगर वह इस अवधि में सरकार नहीं बना पाते हैं, तो 14 दिन का अतिरिक्त समय मांग सकते हैं।
विज्ञापन
आइजेनकोट यशर पार्टी के नेता हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, अब राष्ट्रीय आपातकालीन सरकार बनाने का समय है। मैं यह सुनिश्चित करने के लिए हरसंभव प्रयास करूंगा कि हम इस जिम्मेदारी के योग्य साबित हों।
विज्ञापन
हालांकि, 66 साल के आइजेनकोट के सामने बड़ी चुनौती है। विपक्षी दलों के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा, धर्म और फलस्तीनी क्षेत्रों पर इस्राइली नियंत्रण को लेकर गहरे मतभेद हैं। इस्राइल की 120 सदस्यीय संसद को नेसेट कहा जाता है। इसमें बहुमत के लिए 61 सीटों की जरूरत होती है। आइजेनकोट और नेतन्याहू, दोनों के पास 61 सीटों का समर्थन नहीं है। ऐसे में अरब समर्थित पार्टियों की भूमिका अहम हो सकती है। उनके समर्थन से तय हो सकता है कि इस्राइल में किसकी सरकार बनेगी। हालांकि, आइजेनकोट और उनके संभावित सहयोगी इन पार्टियों के समर्थन पर निर्भर नहीं रहना चाहते।
विपक्ष को एकजुट कर पाएंगे आइजेनकोट?
आइजेनकोट के संभावित गठबंधन में चार पार्टियां शामिल हैं। इनमें उनकी अपनी यशर पार्टी, यायर गोलान के नेतृत्व वाली मध्य-वामपंथी डेमोक्रेट्स पार्टी, नफ्ताली बेनेट की मध्य-दक्षिणपंथी टुगेदर पार्टी और एविगडोर लिबरमैन की दक्षिणपंथी यिस्राएल बेतेनु (इस्राइल हमारा घर) पार्टी शामिल हैं। इन चारों पार्टियों के पास कुल 48 सीटें हैं। यह बहुमत के लिए जरूरी 61 सीटों से काफी कम है।
अरब नेतृत्व वाली दो पार्टियों रआम (संयुक्त सूची) और संयुक्त सूची ने भी आइजेनकोट की सरकार बनाने की कोशिश का समर्थन किया है। संयुक्त सूची में तीन पार्टियां हदाश, ताल और बलाद शामिल हैं। इन दोनों गठबंधनों के पास मिलाकर 19 सीटें हैं। अगर इनका समर्थन मिलता है, तो नेतन्याहू विरोधी खेमे की कुल सीटें 67 हो सकती हैं।
हदाश अरब और यहूदी समुदाय के लोगों की पार्टी है। ताल इस्राइल के फलस्तीनी नागरिकों के अधिकारों की पैरवी करती है। वहीं, बलाद देश के सभी नागरिकों के लिए समान अधिकारों की मांग करती है। हालांकि, आइजेनकोट ने अरब पार्टियों को अपनी सरकार में शामिल करने से इनकार किया है। लिबरमैन भी कई बार कह चुके हैं कि वह ऐसी अल्पमत सरकार बनाने के पक्ष में नहीं हैं, जो अरब पार्टियों के समर्थन पर निर्भर हो।
ये भी पढ़ें: बांग्लादेश: सत्ता बदलने के बाद भी नहीं थम रही राजनीतिक हिंसा, नौ महीने में 94 की मौत; रिपोर्ट में खुलासा
वहीं, गोलान की डेमोक्रेट्स पार्टी रआम और संयुक्त सूची (ज्वाइंट लिस्ट) के साथ मिलकर काम करने के लिए ज्यादा तैयार है। चुनाव के बाद गोलान ने कहा, हमें अब नेतन्याहू के उस नस्लवादी विभाजन को स्वीकार नहीं करना चाहिए, जिसमें यहूदी और अरब वोटों को अलग-अलग देखा जाता है।
नेतन्याहू के पास अब कितनी सीटें बचीं?
नेतन्याहू के धार्मिक और राष्ट्रवादी गठबंधन की सीटें घट गई हैं। साल 2022 में इस गठबंधन के पास 64 सीटें थीं। अब यह संख्या घटकर 53 रह गई है। यानी बहुमत से यह गठबंधन आठ सीट पीछे है।
नेतन्याहू की लिकुड पार्टी सबसे बड़ी अकेली पार्टी है। इसके पास 27 सीटें हैं। वहीं, आइजेनकोट की याशर पार्टी ने 21 सीटें जीती हैं। नेतन्याहू को एक और झटका तब लगा, जब उनकी लंबे समय से सहयोगी रही यूनाइटेड टोरा यहूदी पार्टी ने राष्ट्रपति हर्जोग से बातचीत के दौरान उनका या किसी दूसरे उम्मीदवार का समर्थन करने से इनकार कर दिया।
इस फैसले से नेतन्याहू की सत्ता में वापसी की संभावनाओं को नुकसान पहुंचा है। हालांकि, पार्टी ने भविष्य में गठबंधन को लेकर बातचीत में नेतन्याहू का समर्थन करने का रास्ता बंद नहीं किया है।
इसका फैसला उसकी मांगों पर निर्भर करेगा। इनमें अति-रूढ़िवादी यहूदी समुदाय के लोगों के लिए अनिवार्य सैन्य सेवा का मुद्दा भी शामिल है। यह समुदाय सैन्य सेवा से छूट की मांग करता रहा है।
अल्पमत सरकार क्या होती है और कैसे बन सकती है?
अगर आइजेनकोट गठबंधन बनाने में सफल नहीं होते हैं, तो वह अरब पार्टियों के बाहरी समर्थन से अल्पमत सरकार बना सकते हैं। अल्पमत सरकार तब बनती है, जब सरकार में शामिल पार्टियों के पास संसद में कुल बहुमत नहीं होता। ऐसी सरकार को सत्ता में बने रहने और कानून पास कराने के लिए गठबंधन से बाहर के सांसदों का समर्थन लेना पड़ता है।
आइजेनकोट अपनी चार पार्टियों के गठबंधन के साथ ऐसी सरकार बना सकते हैं। इसके लिए उन्हें रआम और जॉइंट लिस्ट का बाहरी समर्थन लेना होगा। इस व्यवस्था में अरब नेतृत्व वाली पार्टियों को सरकार में मंत्री पद देना जरूरी नहीं होगा। उन्हें औपचारिक रूप से गठबंधन में शामिल करना भी जरूरी नहीं होगा।
इसके बदले ये पार्टियां अपने समर्थन के बदले सरकार से नीतिगत रियायतों की मांग कर सकती हैं। साल 2021 में रआम पार्टी नफ्ताली बेनेट की सरकार में शामिल हुई थी। ऐसा पहली बार हुआ था, जब कोई स्वतंत्र अरब पार्टी इस्राइल के सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा बनी थी।
हालांकि, यह सरकार सिर्फ 18 महीने चल पाई। कब्जे वाले वेस्ट बैंक में अवैध बस्तियों और फलस्तीनी राष्ट्र के गठन को लेकर मतभेदों के कारण सरकार गिर गई। इस्राइल की ज्यादातर पार्टियां दो-राष्ट्र समाधान के तहत एक स्वतंत्र फलस्तीनी देश बनाने का समर्थन नहीं करती हैं।
नेतन्याहू पिछले 20 वर्षों में ज्यादातर समय सत्ता में रहे हैं। उन्होंने खुले तौर पर फलस्तीनी राष्ट्र के गठन का विरोध किया है। उन्होंने कब्जे वाले इलाकों में यहूदी बस्तियों के विस्तार को भी बढ़ावा दिया है। ये बस्तियां फलस्तीनी राष्ट्र के गठन की राह में सबसे बड़ी बाधाओं में शामिल हैं। अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत इन बस्तियों को अवैध माना जाता है।
सरकार बनाने के और कौन से रास्ते हैं?
अल्पमत सरकार के अलावा आइजेनकोट के पास एक और रास्ता है। वह इस्राइल की दो अति-रूढ़िवादी पार्टियों शास और यूनाइटेड टोरा यहूदी को अपने गठबंधन में शामिल कर सकते हैं।
इन दोनों पार्टियों के पास कुल 13 सीटें हैं। अगर ये आइजेनकोट के गठबंधन में शामिल होती हैं, तो उनके पास कुल 61 सीटें हो जाएंगी। यानी बहुमत के लिए जरूरी आंकड़ा पूरा हो जाएगा।
हालांकि, इसके लिए आइजेनकोट को कुछ मुद्दों पर समझौता करना होगा। इनमें अति-रूढ़िवादी धार्मिक छात्रों को सैन्य सेवा से छूट देने का मुद्दा भी शामिल है। यह मुद्दा लंबे समय से इस्राइल की राजनीति में मतभेद की वजह बना हुआ है।
आइजेनकोट और उनके सहयोगी खासकर लिबरमैन इस छूट का विरोध करते रहे हैं। हालांकि, लिबरमैन ने हाल ही में संकेत दिया है कि वह इस मुद्दे पर समझौता करने के लिए तैयार हैं।