Exclusive News एक्सक्लूसिव खबरें
Free E-Paper फ्री में ई-पेपर पढ़ें
ऐप डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   World ›   Historic Lahore gurdwara reopens for worship after 79 years

पाकिस्तान में 79 साल बाद खुला ऐतिहासिक गुरुद्वारा: बंटवारे के बाद से था बंद, जानें क्या है इसका इतिहास

Sun, 08 Nov 2026 10:02 PM IST
निर्मल कांत पीटीआई, लाहौर
पीटीआई, लाहौर Published by: निर्मल कांत Updated Sun, 08 Nov 2026 10:02 PM IST
सार

पाकिस्तान के लाहौर में 1947 के बंटवारे के बाद से बंद ऐतिहासिक गुरुद्वारा 79 साल बाद फिर खोल दिया गया है। इसका संबंध छठे सिख गुरु हरगोबिंद साहिब और भाई विधि चंद से है। आखिर इस गुरुद्वारे का इतिहास क्या है और इतने साल तक यह बंद क्यों रखा गया था? पढ़िए इस रिपोर्ट में। 

विज्ञापन
Historic Lahore gurdwara reopens for worship after 79 years
बंटवारे के 79 साल बाद लाहौर के गुरुद्वारे में फिर गूंजेंगे शबद - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक

विस्तार

पाकिस्तान के लाहौर में एक ऐतिहासिक गुरुद्वारा रविवार को धार्मिक पूजा के लिए फिर से खोल दिया गया। यह गुरुद्वारा 1947 में भारतीय उपमहाद्वीप के बंटवारे के बाद से बंद था। यानी 79 साल बाद यहां फिर से धार्मिक गतिविधियां शुरू हुई हैं।
विज्ञापन


गुरुद्वारे को दोबारा खोलने के मौके पर एक समारोह आयोजित किया गया। इसमें सिख धार्मिक परंपराओं का पालन किया गया। सिख समुदाय के कई लोग भी इसमें शामिल हुए। इस गुरुद्वारे का नाम गुरुद्वारा छेवीं पातशाही श्री गुरु हरगोबिंद साहिब है। यह लाहौर की टेंपल रोड पर स्थित है। इसका संबंध गुरु हरगोबिंद साहिब की लाहौर यात्रा से है।
विज्ञापन


गुरु हरगोबिंद साहिब का जीवनकाल 1595 से 1644 तक था। वह 10 सिख गुरुओं में छठे गुरु थे। उन्हें एक ऐसे संत-योद्धा के रूप में सम्मान दिया जाता है, जिन्होंने धार्मिक उत्पीड़न से बचाव के लिए सिख समुदाय को तैयार किया।
विज्ञापन
विज्ञापन


गुरुद्वारे के दोबारा खुलने पर किसने क्या कहा?
गुरुद्वारे को दोबारा खोलने के समारोह में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री और पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के अध्यक्ष सरदार रमेश सिंह अरोड़ा शामिल हुए। इसके अलावा इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ईटीपीबी) के सचिव नासिर मुश्ताक और अन्य अधिकारी भी मौजूद रहे।

समारोह में अरोड़ा ने कहा कि ऐतिहासिक गुरुद्वारे की मरम्मत का काम पूरा हो चुका है। अब इसे सिख समुदाय के लोगों के धार्मिक पूजन के लिए खोल दिया गया है। उन्होंने बताया कि पाकिस्तान में 50 से ज्यादा गुरुद्वारों का नवीनीकरण किया जा रहा है। इसका मकसद सिख धार्मिक विरासत को सुरक्षित रखना और तीर्थयात्रियों को सुविधाएं देना है।

ये भी पढ़ें: क्या बिखरे विपक्ष को एकजुट कर पाएंगे गादी?: राष्ट्रपति ने पहले सरकार बनाने का दिया मौका, जानें क्या हैं विकल्प

ईटीपीबी के सचिव नासिर मुश्ताक ने कहा कि गुरुद्वारे की मरम्मत और इसे दोबारा खोलने का मकसद सिख समुदाय को बेहतर धार्मिक सुविधाएं देना है। साथ ही, लाहौर की ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना भी इसका मकसद है।

गुरु हरगोबिंद साहिब का इस गुरुद्वारे से क्या संबंध है?
सिख ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, गुरु हरगोबिंद साहिब को स्थानीय सिख संगत ने लाहौर आने का निमंत्रण दिया था। गुरु साहिब ने यह निमंत्रण स्वीकार किया था। इसके बाद वह लाहौर आए और तीन दिन तक भाई जीवन नाम के एक श्रद्धालु के घर पर रुके। भाई जीवन गुरु साहिब की मेजबानी करने का सम्मान पाकर बेहद भावुक हो गए थे। इसके बाद उन्होंने अपने घर को गुरुद्वारे में बदल दिया। यही स्थान आगे चलकर गुरुद्वारा छेवीं पातशाही श्री गुरु हरगोबिंद साहिब के नाम से जाना गया।

भाई विधि चंद से भी जुड़ा है गुरुद्वारे का इतिहास?
इस गुरुद्वारे का संबंध सिख धर्म के प्रचारक और योद्धा भाई विधि चंद से भी है। वह दो बार लाहौर आए थे। उस समय के मुगल गवर्नर ने कुछ घोड़ों को जब्त कर लिया था। ये घोड़े श्रद्धालुओं ने गुरु हरगोबिंद साहिब को भेंट के रूप में दिए थे।

सिख ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, भाई विधि चंद ने घोड़ों को वापस लाने के लिए अलग-अलग अभियान चलाए। उन्होंने एक बार घास बेचने वाले और दूसरी बार ज्योतिषी का भेष धारण किया। इस तरह उन्होंने दोनों घोड़ों को वापस हासिल किया और गुरु हरगोबिंद साहिब को लौटा दिया।

कब और किसने संभाली गुरुद्वारे की जिम्मेदारी?
साल 1915 में स्थानीय सिख संगत ने गुरुद्वारे के हॉल का विस्तार कराया था। इसके बाद गुरुद्वारे के तत्कालीन देखरेख करने वाले प्रमुख सेवादार हरि सिंह पर गलत काम करने के आरोप लगे। इसके बाद 1921 में संगत ने गुरुद्वारे का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया। इसके लिए एक स्थानीय समिति भी बनाई गई।


साल 1927 में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एसजीपीसी) ने इस गुरुद्वारे का प्रशासनिक नियंत्रण संभाल लिया। एसजीपीसी एक शीर्ष संस्था है। यह ऐतिहासिक सिख गुरुद्वारों के प्रबंधन की जिम्मेदारी संभालती है।

1947 के बंटवारे के बाद क्यों बंद हुआ था गुरुद्वारा?
साल 1947 में भारतीय उपमहाद्वीप के बंटवारे के बाद इस गुरुद्वारे में सिख समुदाय की नियमित धार्मिक गतिविधियां बंद हो गई थीं। सिख ऐतिहासिक विवरणों में यह भी दर्ज है कि बंटवारे के दौरान हुई हिंसा में समुदाय के कई लोगों की हत्या कर दी गई थी, जो इस जगह की पवित्रता की रक्षा कर रहे थे। इसके बाद से गुरुद्वारा धार्मिक पूजा के लिए बंद रहा। अब 79 साल बाद इसे फिर से खोल दिया गया है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get latest World News headlines in Hindi related political news, sports news, Business news all breaking news and live updates. Stay updated with us for all latest Hindi news.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed