जुनून: काबुल की बेटियों ने आतंकियों को दिया मुंहतोड़ जवाब, धमाके बाद तालीम लेने पहुंचीं स्कूल
जीवन में शिक्षा का महत्व कितना अहम है यह हमें काबुल की लड़कियों से सीखना चाहिए। काबुल की बेटियां कहती हैं कि गोली और बंदूक से जान तो ली जा सकती है, पर हौसले को परास्त नहीं किया जा सकता। शिक्षा हासिल के लिए उनका परिवार भी साथ दे रहा है।
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आतंकी हमले के बाद 17 मई को जब काबुल में स्कूल खुला तो लड़कियों ने अपनी उपस्थिति से यह बता दिया कि गोली और बंदूक से जान तो ली जा सकती है, पर हौसले को परास्त नहीं किया जा सकता। तालीम कभी गोले-बारूद से नहीं रुकी जा सकती है, विस्फोट से इमरातें तो उड़ाई जा सकती हैं, पर सपनों को नहीं तोड़ा जा सकता। 5 मई को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में एक स्कूल के बाहर आतंकी हमला हुआ था, जिसमें 80 लोगों की मौत हुई थी और 160 लोग जख्मी हो गए थे। तबाही का मंजर देखकर लगा था कि आतंकी अपने मंसूबे पर कामयाब हो जाएंगे, लेकिन जब स्कूल खुले तो सबसे ज्यादा हैरान आतंकी ही हुए। उन्होंने देखा बड़ी संख्या में लड़कियां पहुंच रही हैं।
आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए घर से बाहर निकली लड़कियां
आतंकियों ने धमाका ऐसे वक्त किया था कि जब लड़कियां घर से स्कूल जाने के लिए निकली थीं। इस हमले में फरजाना असगरी की 15 वर्षीय छोटी बहन की भी मौत हो गई थी। धमाके के दौरान फरजाना भी फस गई थीं, लेकिन जिंदा बचकर घर लौटने के बाद फरजाना ने दृढ़ संकल्प लिया कि वह स्कूल खुलने पर दोबारा पढ़ने जाएंगी। और जब पिछले दिनों स्कूल खुला तो सबसे पहले फरजाना ही स्कूल पहुंची। फरजाना ने बताया मेरी छोटी बहन को आंतकियों ने इसलिए मार दिया कि वह पढ़ना चाहती थी, लेकिन तालीम पूरी कर आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब और अपनी बहन को सच्ची श्रद्धांजलि दूंगी इसलिए मैं स्कूल आई हूं।
फरजाना के साथ-साथ अन्य लड़कियां ने कहा कि आतंकी हमले से ना हम कभी रुके थे और ना कभी रुकेंगे। हमारी तालीम ही हमारे देश को आतंकवाद से मुक्त कर सकती है। क्योंकि जब हम पढ़ेंगे तभी नई ऊचाइयों को छूएंगे। लड़कियों का कहना है कि आतंकी चाहे जितने हमले करे हम स्कूल जाना नहीं छोड़ेंगे। लड़कियों का कहना है कि तालिबान हमें अशिक्षित रखना चाहता है, लेकिन हम शिक्षा के जरिए उनके मंसूबे को कामयाब नहीं होने देंगे। हम शिक्षित होकर ही रहेंगे।’ फरजाना कहती हैं- हम निराश होने वालों में से नहीं हैं। हमें ज्ञान और शिक्षा हासिल करने के लिए डर छोड़ना होगा।’ ।
35 लाख लड़कियां जा रहीं स्कूल
अफगानिस्तान के एनजीओ से जुड़ी एक सदस्य का कहना है कि तालिबानी शासन में 1996 से 2001 के दौरान लड़कियों के स्कूल जाने पर रोक लगी थी, लेकिन अब परिवार भी बिना डरे लड़कियों को स्कूल भेज रहे हैं। अफगानिस्तान ने पिछले दो दशक में क्रांतिकारी बदलाव देखे हैं। देश में अब 35 लाख लड़कियां स्कूल जाने लगी हैं