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नेपाल को ‘अनिश्चय और अस्थिरता’ के दौर में धकेल दिया ओली ने, ‘संवैधानिक तख्ता पलट’ वाला कदम बताया

Mon, 21 Dec 2020 02:28 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, काठमांडू Published by: Harendra Chaudhary Updated Mon, 21 Dec 2020 02:28 PM IST
सार

नेपाल की संसद का चुनाव पांच साल के लिए हुआ था। लेकिन अब तीन साल पर ही नए चुनाव होंगे। सरकारी घोषणा के मुताबिक अप्रैल में मतदान होगा...

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KP Sharma Oli pushed Nepal into uncertainty and instability
KP Sharma Oli - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली पर अब इल्जाम लग रहे हैं कि उन्होंने उन ताकतों के लिए जमीन तैयार की है, जो देश के गणतांत्रिक, संघीय और धर्मनिरपेक्ष ढांचे को चुनौती दे रहे हैं। ओली ने रविवार को अचानक देश की संसद को भंग करने की सिफारिश कर दी, जिसे तुरंत राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने स्वीकार कर लिया। इससे नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर ओली के प्रतिद्वंदी और राजनीतिक पर्यवेक्षक सब भौंचक रह गए।

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राजनीतिक विश्लेषक गेजा शर्मा वागले ने कहा है कि पिछले कुछ हफ्तों में जिस तरह घटनाएं घटीं, उससे साफ है कि प्रधानमंत्री ओली और राष्ट्रपति भंडारी ने देश पर तानाशाही ढंग से शासन करने की सोची-समझी चाल चली है। सोमवार सुबह छपी एक टिप्पणी में वागले ने लिखा है- इसमें कोई शक नहीं है कि ओली ने देश को भ्रम और अफरातफरी की तरफ धकेल दिया है। जारी महामारी के बीच नए चुनाव कराना कैसे आखिर कैसे संभव होगा? इसलिए ऐसा लगता है कि ओली देश में इमरजेंसी लागू करने की योजना बना रहे हैं। इसके नतीजे बेहद गंभीर हो सकते हैं।

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यह भी पढ़ेंः नेपाली संसद भंग, ओली सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति ने दी मंजूरी, अप्रैल-मई में होंगे चुनाव

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दूसरे जानकारों ने भी कहा है कि प्रधानमंत्री ओली ने जनता से निर्वाचित संसद का गला घोंट दिया है। उनके इस कदम को ‘संवैधानिक तख्ता पलट’ भी बताया गया है। ऐसा ओली ने संभवतः इसलिए किया क्योंकि पार्टी के अंदर उनका आधार तेजी से सिकुड़ रहा था। इस कारण उनके हाथ से प्रधानमंत्री पद निकलने की संभावना बन रही थी। 90 सांसदों ने उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश कर दिया था। हाल में विपक्षी नेपाली कांग्रेस पार्टी ने भी उन पर दबाव बढ़ा दिया था। ओली ने जिस तरह संवैधानिक परिषद अध्यादेश को जारी कराया, उससे नेपाली कांग्रेस भी खफा हो गई है।


नेपाल की संसद का चुनाव पांच साल के लिए हुआ था। लेकिन अब तीन साल पर ही नए चुनाव होंगे। सरकारी घोषणा के मुताबिक अप्रैल में मतदान होगा। लेकिन कई समूह संसद भंग करने के राष्ट्रपति के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने पर विचार कर रहे हैं। उनका कहना है कि राष्ट्रपति ने संसद को भंग कर असंवैधानिक काम किया है। यहां के वरिष्ठ वकील चंद्रकांत गयाली ने अखबार काठमांडू पोस्ट से कहा कि राष्ट्रपति भंडारी संविधान की अभिभावक की अपनी भूमिका निभाने में पूरी तरह नाकाम रही हैं। इसी अखबार से संवैधानिक अधिनियमों के विशेषज्ञ भीमार्जुन आचार्य ने कहा कि ओली सरकार और राष्ट्रपति दोनों के कदम संवैधानिक तखता पलट की श्रेणी में आते हैं। दोनों ने संवैधानिक प्रावधानों की गलत व्याख्या की है।

विश्लेषकों ने कहा है कि ओली न सिर्फ संविधान और लोकतंत्र के बुनियादी उसूलों का उल्लंघन किया है, बल्कि उन्होंने देश को अनिश्चय और अस्थिरता के दुश्चक्र में एक बार फिर से धकेल दिया है। भारत में राजदूत रह चुके और अब त्रिभुवन यूनिर्सिटी में प्रोफेसर लोकराज बराल ने स्थानीय मीडिया से कहा कि ओली ने देश के साथ विश्वासघात किया है।

कई विधि विशेषज्ञों ने राय जताई है कि संसद भंग करने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने के पर्याप्त कानूनी आधार मौजूद हैं। कोर्ट के पास यह अधिकार है कि वह संसद को बहाल कर सकता है। इन विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया है कि विश्लेषकों के मुताबिक संसद भंग होने के बाद ओली की स्थिति कार्यवाहक प्रधानमंत्री की हो गई है। ऐसे में अगर कोर्ट संसद को बहाल करता है, तो ओली प्रधानमंत्री नहीं रह जाएंगे।


रविवार को ओली ने संसद भंग कराने का कदम अचानक और सत्ताधारी दल को बिना विश्वास में लिए उठाया। इससे नाराज पुष्प कमल दहल खेमे के सात मंत्रियों ने तुरंत इस्तीफे दे दिए। कुछ जानकारों ने कहा है कि ये कदम भले अचानक उठाया गया हो, लेकिन ओली की कार्यशैली से परिचित लोगों को इससे हैरत नहीं हुई। ओली में तानाशाही प्रवृत्तियां पहले भी जाहिर हुई हैँं। इसके अलावा ऐसा लगता है कि इस तरह के कदम उठाने की तैयारी वे पहले से कर रहे थे।

बीते मंगलवार को उन्होंने संवैधानिक परिषद अधिनियम के लिए अध्यादेश जारी किया। इससे संवैधानिक संस्थाओं में सदस्यों को मनोनीत करने का अधिकार प्रधानमंत्री को मिल गया। इस कदम की बड़े पैमाने पर आलोचना हुई। तब बुधवार को हुई सत्ताधारी पार्टी की स्थायी समिति की बैठक में ओली इस अध्यादेश को वापस लेने पर राजी हो गए थे। लेकिन बाद में जाहिर हुआ कि इस अध्यादेश के तहत ओली पहले ही नियुक्तियां कर चुके थे। इसके बाद उन्होंने संसद भंग करने का कदम उठाया है। 

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