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जानना जरूरी है: कैसे बना जाता है ब्रह्मभक्त? महर्षि पुलस्त्य ने भक्ति के कितने प्रकार बताए
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अमर उजाला / एजेंसी
विस्तार
एक बार भीष्म ने महर्षि पुलस्त्य से पूछा, ‘ब्रह्मन! भक्ति कितने प्रकार की होती हैं और कैसी भक्ति करने से मनुष्य, ब्रह्मा का भक्त कहलाता है? मनुष्यों में किस तरह के लोग ब्रह्म-भक्त माने गए हैं?’ भीष्म का प्रश्न सुनकर पुलस्त्यजी बोले, ‘कुरुनंदन! शास्त्रों में तीन प्रकार की भक्ति बताई गई है-मानस भक्ति, वाचिक भक्ति और कायिक भक्ति। ध्यान धारण करके बुद्धि के द्वारा वेदों के अर्थ पर जब विचार किया जाता है, तो उसे मानस भक्ति कहते हैं। ऐसी भक्ति से ब्रह्माजी प्रसन्न होते हैं।
मंत्र जप, वेद-पाठ तथा आरण्यकों के जप के माध्यम से होने वाली भक्ति वाचिक भक्ति कहलाती है। और अंत में, मन तथा इंद्रियों को नियंत्रित करने वाले व्रत, उपवास, नियम, कृच्छ्र, सांतपन तथा चांद्रायण आदि भिन्न-भिन्न प्रकार के व्रतों से, ब्रह्मकृच्छ्र नामक उपवास द्वारा एवं अन्य तरह के शुभ नियमों के अनुष्ठान से जब भगवान की आराधना की जाती है, तब उसको कायिक भक्ति कहते हैं। द्विजातियों में मुख्य रूप से ये तीन प्रकार की त्रिविध भक्ति बताई गई हैं।’ भीष्म ने अगला प्रश्न किया- ‘मैंने सुना है कि इन तीन के अलावा भक्ति के तीन भेद और हैं। क्या आप मुझे उनके विषय में बता सकते हैं?’
पुलस्त्य जी बोले, ‘आप सही कहते हैं। त्रिविध भक्ति के अलावा भी तीन प्रकार की भक्ति है-लौकिक, वैदिक तथा आध्यात्मिक भक्ति। अब मैं आपको इनके विषय में बताता हूं।
गाय के घी, दूध और दही, रन, दीप, कुश, जल, चंदन, माला, विविध धातुओं तथा पदार्थ; काले अगर की सुगंध से युक्त एवं घी और गूगुल से बने हुए धूप, आभूषण, सुवर्ण और रत्न आदि से निर्मित हार, नृत्य, वाद्य, संगीत, सब प्रकार के फल-मूलों के उपहार तथा नैवेद्य अर्पण करके मनुष्य ब्रह्माजी को प्रसन्न करने के उद्देश्य से जो पूजा करता है, वह लौकिक भक्ति मानी गई है। सामान्य तौर पर मनुष्य इसी प्रकार से भक्ति करते हैं।
इसके बाद, ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद के मंत्रों का जप और संहिताओं का अध्यापन आदि कर्म यदि ब्रह्माजी को प्रसन्न करने के लिए किए जाते हैं, तो ऐसी भक्ति को वैदिक भक्ति कहा गया है। इसके अतिरिक्त, वेद-मंत्रों के उच्चारण के साथ हविष्य की आहुति देकर जो यज्ञ-क्रिया आदि संपन्न की जाती है, उसे भी वैदिक भक्ति कहा जाता है। अमावस्या अथवा पूर्णिमा को जो अग्निहोत्र किया जाता है, यज्ञों में जो उत्तम दक्षिणा दी जाती है तथा देवताओं को जो पुरोडाश और चरु अर्पण किए जाते हैं-ये सब भी वैदिक भक्ति के ही अंतर्गत आते हैं। इष्टि, धृति, यज्ञ-संबंधी सोमपान तथा अग्नि, पृथ्वी, वायु, आकाश, चंद्रमा, मेघ और सूर्य की उपासना के उद्देश्य से किए हुए जितने भी कर्म हैं, उन सबके देवता भी ब्रह्माजी ही हैं। भीष्म! अब मैं तुम्हें आध्यात्मिक भक्ति के बारे में बताता हूं।
ब्रह्माजी की आध्यात्मिक भक्ति दो प्रकार की मानी गई है-एक सांख्यज भक्ति और दूसरी योगज भक्ति। इन दोनों में भी भेद होता है। प्रधान (मूल प्रकृति) आदि प्राकृत तत्व संख्या में चौबीस हैं। वे सब तत्व जड़ एवं भोग्य माने जाते हैं। उनका भोक्ता पुरुष पच्चीसवां तत्व है, और वह चेतन तत्व है। इस प्रकार संख्या पूर्वक प्रकृति और पुरुष के तत्व को ठीक-ठीक जान लेना ही सांख्यज भक्ति है। इसे सत्पुरुषों ने सांख्य-शास्त्र के अनुसार आध्यात्मिक भक्ति माना है।
ब्रह्माजी की योगज भक्ति के अंतर्गत प्रतिदिन प्राणायाम के साथ ध्यान लगाना चाहिए, इंद्रियों के संयम का अभ्यास करना और समस्त इंद्रियों को अपने हृदय में धारण करके ब्रह्माजी का श्रद्धापूर्वक ध्यान करना चाहिए। हृदय के भीतर कमल है और यह माना जाता है कि उस कमल की कर्णिका पर ब्रह्माजी रहते हैं। वे रक्त-वस्त्र धारण किए हुए हैं, उनके नेत्र सुंदर हैं। उनके मुख प्रकाशित हो रहे हैं। यज्ञोपवीत उनकी कमर के ऊपर तक लटका हुआ है, उनके शरीर का वर्ण लाल है, चार भुजाएं शोभा पा रही हैं तथा हाथों में वरद और अभय की मुद्राएं हैं। इस प्रकार के ध्यान की स्थिरता योगजन्य मानस सिद्धि है; ब्रह्माजी के प्रति इस प्रकार भक्ति करने को पराभक्ति माना गया है। जो मनुष्य भगवान ब्रह्माजी में पराभक्ति को धारण करता है, उसे शास्त्रों में ब्रह्म-भक्त कहते हैं।’