G7 Summit: अपने देश में कमजोर पड़े नेताओं का शिखर सम्मेलन!
यूरोपीय नेताओं की राजनीतिक स्थिति बाइडन से भी ज्यादा खराब है। पूरे यूरोप को अभी जैसी महंगाई और ईंधन का अभाव झेलना पड़ रहा है, वैसा कई पीढ़ियों के सामने नहीं हुआ। हफ्ते भर पहले फ्रांस में इसका असर देखने को मिला, जब संसदीय चुनाव में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की पार्टी बहुमत पाने में नाकाम रही...
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जर्मनी में जी-7 की शिखर बैठक जब रविवार को शुरू हुई, तो यहां यह आम चर्चा थी कि ये अपने-अपने देशों में कमजोर हो चुकी हैसियत वाले नेताओं की बैठक है। ये शिखर बैठक उस समय हो रही है, जब यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों का उलटा असर पश्चिमी देशों में लोगों को चुभने लगा है। इस कारण जी-7 देशों के शासकों की लोकप्रियता में अपने-अपने देशों में तेजी से गिरी है। अब अंदेशा जताया जा रहा है कि इन नई परिस्थिति के कारण रूस विरोधी अंतरराष्ट्रीय गोलबंदी में भी दरार पड़ सकती है।
शिखर सम्मेलन की शुरुआत करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा- ‘हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि जो आर्थिक समस्याएं हमारे सामने आई हैं, उनका हम एकजुट होकर मुकाबला करें।’ लेकिन विशेषज्ञों की राय में इस एकजुटता के सामने अब चुनौती बढ़ रही है। जी-7 में शामिल कुछ देशों के नेताओं को अपने यहां हाल में जोरदार चुनावी झटके लगे हैं, जबकि कई नेताओं की लोकप्रियता में तेजी से गिरावट आई है।
गिरती अप्रूवल रेटिंग से बाइडन परेशान
अमेरिकी अखबार द वॉल स्ट्रीट जर्नल में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक खुद जो बाइडन अमेरिका में अपनी गिरती एप्रूवल रेटिंग (उनके काम से संतुष्ट लोगों की संख्या) के कारण परेशान हैं। इस बीच अमेरिका में गर्भपात को वैध ठहराने संबंधी 49 साल पहले के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया है, जिससे सामाजिक तनाव बढ़ता जा रहा है।
टीकाकारों के मुताबिक यूरोपीय नेताओं की राजनीतिक स्थिति बाइडन से भी ज्यादा खराब है। पूरे यूरोप को अभी जैसी महंगाई और ईंधन का अभाव झेलना पड़ रहा है, वैसा कई पीढ़ियों के सामने नहीं हुआ। हफ्ते भर पहले फ्रांस में इसका असर देखने को मिला, जब संसदीय चुनाव में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की पार्टी बहुमत पाने में नाकाम रही। नतीजतन, अब पूंजीवाद समर्थक मैक्रों के सामने धुर वामपंथी या धुर दक्षिणपंथी में से किसी एक पार्टी का समर्थन लेने की मजबूरी खड़ी हो गई है।
उधर ब्रिटेन में प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन खुद अपनी कंजरवेटिव पार्टी के अंदर मिल रही चुनौतियों से मुश्किल में हैं। पिछले हफ्ते दो संसदीय उपचुनावों में उनकी पार्टी की हार से उनके विरोधियों को और ताकत मिली है। ब्रिटेन में महंगाई दर 9.1 फीसदी पर है, जिससे वहां हड़तालों का दौर आया हुआ है।
गिरती लोकप्रियता से चांसलर शोल्ज भी परेशान
जर्मनी की हालत भी ब्रिटेन से बेहतर नहीं है। रूसी प्राकृतिक गैस पर लगाए गए प्रतिबंध से सबसे ज्यादा प्रभावित जर्मनी ही हुआ है। चांसलर ओलोफ शोल्ज की सरकार को देशवासियों को आगाह करना पड़ा है कि अगली सर्दी में मुमकिन है कि उन्हें घर गर्म करने लायक पर्याप्त गैस ना मिले। इस बीच आए जनमत सर्वेक्षणों के मुताबिक शोल्ज की लोकप्रियता लगातार गिर रही है। उनके लिए राहत की बात सिर्फ यह है कि जर्मनी में अगला आम चुनाव होने में अभी तीन साल बाकी हैं।
जी-7 शिखर बैठक के लिए इटली के प्रधानमंत्री मारियो द्राघी अपने देश से उस समय रवाना हुए, जब उनके गठबंधन सरकार में फूट पड़ती दिख रही थी। जिन मुद्दों पर ये फूट पड़ी, उनमें यूक्रेन को समर्थन जारी रखने का सवाल भी है।
अमेरिकी थिंक टैंक अटलांटिक काउंसिल में भू-अर्थशास्त्र सेंटर के निदेशक जोश लिप्स्की ने वॉल स्ट्रीट जर्नल से कहा- जी-7 नेता साझा चुनौतियों का जिक्र कर अपने-अपने देशों में अपनी लोकप्रियता संभालने की कोशिश कर रहे हैं। वे बताना चाहते हैं कि आर्थिक समस्याएं पूरी दुनिया में हैं। उन्होंने कहा- ‘जब एक जैसी समस्या झेल रहे लोग इकट्ठे होते हैं, तो उनका ढाढस बंधता है। लेकिन असल सवाल यह है कि आप अपनी अर्थव्यवस्था को ठीक करने के लिए क्या करेंगे?’