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ऐसे पता लगाएं कि भविष्य में क्या बचेगा, क्या खत्म हो जाएगा
Wed, 10 Jul 2019 07:27 PM IST
अनिल पांडेय
बीबीसी
बीबीसी
Published by: अनिल पांडेय
Updated Wed, 10 Jul 2019 07:27 PM IST
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इंसानियत का भविष्य
- फोटो : YouTube
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आप जिस शहर में रहते हैं, वहां के बारे में अंदाजा लगाइए कि आज से सौ बरस बाद वहां क्या बचेगा? कौन सी इमारतें रह जाएंगी? कौन से निशां वक़्त के थपेड़ों से मिट जाएंगे? इसे लेकर विवादित लेखक नासिम निकोलस तालिब एक मोटा सा नियम बताते हैं।
वो कहते हैं कि आप अपने शहर में जो पुरानी इमारतें देखते हैं, उनके ही बने रहने की संभावना ज्यादा है, बनिस्बत नई बनाई गई इमारतों के। तालिब का कहना है कि अगर आप किसी निर्जीव वस्तु की आगे की उम्र का अंदाजा लगाना चाहते हैं तो पहला सवाल ये होना चाहिए कि ये कितने समय से धरती पर मौजूद है।
लंदन शहर को ही लीजिए। यहां बहुत सी इमारतें हैं जो सैकड़ों साल से खड़ी हैं। सबसे पुरानी इमारत है टावर ऑफ लंदन, जो 941 वर्ष से विद्यमान है। मर्टन प्रायरी 900 साल से ज्यादा पुरानी है और चर्च ऑफ सेंट बार्थोलोम्यो 896 वर्ष पुराना है।
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तालिब का तर्क है कि किसी भी इमारत की लंबी उम्र का अंदाजा केवल वक़्त लगा सकता है। हमें ये देखना होगा कि कोई भी इमारत कितने बरस या सदियों से वक़्त के थपेड़े बर्दाश्त कर रही है।
लंदन की नई बहुमंजिला बिल्डिंग शार्ड, टॉवर ऑफ लंदन के मुक़ाबले शायद ही किसी मोर्चे पर ठहरे। दोनों में कोई मुक़ाबला ही नहीं। लेकिन, इस बात की संभावना ज्यादा है कि शार्ड से ज्यादा टावर ऑफ लंदन ज्यादा दिन टिकेगा।
तालिब ने 2012 में आई अपनी किताब 'एंटी फ्रैजाइल: थिंग्स दैट गेन फ्रॉम डिसऑर्डर' लिखा था कि अगर कोई किताब पिछले पचास साल से छप रही है, तो आगे भी उसकी डिमांड बनी रहेगी। वहीं, कोई नई किताब अगर रातों-रात लोकप्रिय होती है तो, वो उतनी ही जल्दी भुला भी दी जाएगी।
हम एक बार फिर लंदन की इमारतों के बारे में बात करते हैं। वो क़ुदरत की उन्हीं ताक़तों का सामना करती हैं, जो सभी करते हैं। कभी बारिश, तो कभी ठंडी हवा और कभी सूखा। वो मजबूत जरूर हैं। लेकिन, हमेशा अच्छी हालत में नहीं बनी रह सकतीं।
किसी भी अन्य शहर की तरह लंदन में भी नई और पुरानी इमारतों का मेल देखने को मिलता है। पैरिस में सदियों पुराने गिरजाघर नॉट्र डाम में आग लगने के कुछ ही दिनों के भीतर उसके पुनर्निर्माण के लिए लोगों ने अरबों रुपये का दान किया था।
जैसे कि सऊदी अरब ने इस्लामिक दौर से पहले के सारे निशान अपने देश से मिटा दिए ताकि वहाबी विचारधारा को चुनौती देने वाली कोई ताक़त न खड़ी हो सके। इसी तरह तालिबान ने बामियान स्थित बुद्ध की विशाल मूर्तियों को उड़ा दिया था।
चीन में शहरों के उद्धार के नाम पर पुरानी बस्तियां उजाड़ी जा रही हैं। इसी तरह वीगर मुसलमानों को शुद्ध करने के लिए बेहद सख्त अभियान चलाया जा रहा है। लिंडी इफेक्ट, जिसकी बात तालिब करते हैं, वो अतीत के साथ हमारे रिश्तों को खत्म करने वाले लोगों पर गहरा असर डालता है।
लंबे वक़्त तक खड़ी इमारतें तमाम मुश्किल हालात से निपटने के लिए सक्षम हो जाती हैं। अक्सर लोग कहते हैं कि पुराने को मिटाएंगे, तभी नई इबारत लिखी जाएगी। पर, बहुत सी पुरानी और गलत परंपराओं अपराधों जैसे दास प्रथा, बलात्कार, हत्या और कट्टरपंथ को मिटाने की बात कोई नहीं करता। ऐसी दोगली बातें करने वालों को इतिहास को क़रीब से जानने-समझने की जरूरत है।
वहीं, इंसान की बनाई तमाम इमारतों, कलाओं और विचारों में भी बदलते हालात में खुद को ढालने की क्षमता होती है। इसीलिए किसी नई चीज का आविष्कार करने में जुटे लोग दो सवाल करते हैं। पहला ये कि इससे किस समस्या का हल निकलेगा? और दूसरा ये कि इससे जिंदगी में क्या आसानी आएगी? अगर आप इन सवालों के तसल्लीबख्श जवाब नहीं खोज पाते हैं, तो बेहतर होगा कि इन सवालों के जवाब मिलने का इंतजार करें।
अगर आप भविष्य के बारे में सोच रहे हैं। और ये अंदाजा लगाना चाहते हैं कि कौन सी चीज मजबूत है और किसका समय पूरा हो गया, तो आप ये समझ लीजिए कि भविष्य, अतीत के वो टुकड़े हैं, जो सदियों से वक़्त के थपेड़े सहकर भी आज में मौजूद हैं।
वहीं, जो आज है, वो कल टूटकर बिखर भी सकता है। अगर आप ये समझना चाहते हैं कि भविष्य के गर्भ में क्या बचने वाला है तो उन रहस्यों पर गौर कीजिए, जिनकी चर्चा सदियों से होती आ रही है। असली राज को तर्क से नहीं मिटाया जा सकता।
कोई नया ट्रेंड या अचानक मिली शोहरत लंबे समय तक नहीं टिकने वाली। बहुत कम चीजें ही टिकती हैं। हमसे और हमारी संस्कृति में जिन का टकराव हमेशा से चला आ रहा है, वो हैं जरूरतें और ख्वाहिशें, मोहब्बत और नफरत, आजादी और गुलामी। इंसानी सभ्यता में ये टकराव हमेशा चलने वाला है।
जब आप अपनी सोच को वर्तमान की क़ैद से आजाद करते हैं तो आपको सिर्फ शोर सुनाई देता है। दूर की सोचना आप के आज में खलल डालता है। मशहूर लेखक विलियम गिब्सन ने कहा था: भविष्य की आमद हो चुकी है। इसके सबसे अहम दौर तो पहले ही बीत चुके हैं।
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वो कहते हैं कि आप अपने शहर में जो पुरानी इमारतें देखते हैं, उनके ही बने रहने की संभावना ज्यादा है, बनिस्बत नई बनाई गई इमारतों के। तालिब का कहना है कि अगर आप किसी निर्जीव वस्तु की आगे की उम्र का अंदाजा लगाना चाहते हैं तो पहला सवाल ये होना चाहिए कि ये कितने समय से धरती पर मौजूद है।
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लंदन शहर को ही लीजिए। यहां बहुत सी इमारतें हैं जो सैकड़ों साल से खड़ी हैं। सबसे पुरानी इमारत है टावर ऑफ लंदन, जो 941 वर्ष से विद्यमान है। मर्टन प्रायरी 900 साल से ज्यादा पुरानी है और चर्च ऑफ सेंट बार्थोलोम्यो 896 वर्ष पुराना है।
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तालिब का तर्क है कि किसी भी इमारत की लंबी उम्र का अंदाजा केवल वक़्त लगा सकता है। हमें ये देखना होगा कि कोई भी इमारत कितने बरस या सदियों से वक़्त के थपेड़े बर्दाश्त कर रही है।
लंदन की नई बहुमंजिला बिल्डिंग शार्ड, टॉवर ऑफ लंदन के मुक़ाबले शायद ही किसी मोर्चे पर ठहरे। दोनों में कोई मुक़ाबला ही नहीं। लेकिन, इस बात की संभावना ज्यादा है कि शार्ड से ज्यादा टावर ऑफ लंदन ज्यादा दिन टिकेगा।
लिंडी इफेक्ट
नासिम तालिब इस नियम को लिंडी इफेक्ट कहते हैं। 1964 में अमेरिकी लेखक अल्बर्ट गोल्मैन ने लिंडीज लॉ नाम से एक लेख लिखा था। इसमें उन्होंने शहर के सेलेब्रिटीज के बीच की बातचीत का हवाला दिया था कि वो उन्हें एक जगह जमा हुए ऐसे कॉमेडियन लगते थे, जो बस उस स्थिति में बने रहने की जुगत लगाया करते थे। ऐसा इसलिए ताकि उनका दौर कभी खत्म न हो। जबकि अगर वो कम आयोजनों में शामिल होते तो शायद उनके लिए बेहतर होता।तालिब ने 2012 में आई अपनी किताब 'एंटी फ्रैजाइल: थिंग्स दैट गेन फ्रॉम डिसऑर्डर' लिखा था कि अगर कोई किताब पिछले पचास साल से छप रही है, तो आगे भी उसकी डिमांड बनी रहेगी। वहीं, कोई नई किताब अगर रातों-रात लोकप्रिय होती है तो, वो उतनी ही जल्दी भुला भी दी जाएगी।
हम एक बार फिर लंदन की इमारतों के बारे में बात करते हैं। वो क़ुदरत की उन्हीं ताक़तों का सामना करती हैं, जो सभी करते हैं। कभी बारिश, तो कभी ठंडी हवा और कभी सूखा। वो मजबूत जरूर हैं। लेकिन, हमेशा अच्छी हालत में नहीं बनी रह सकतीं।
किसी भी अन्य शहर की तरह लंदन में भी नई और पुरानी इमारतों का मेल देखने को मिलता है। पैरिस में सदियों पुराने गिरजाघर नॉट्र डाम में आग लगने के कुछ ही दिनों के भीतर उसके पुनर्निर्माण के लिए लोगों ने अरबों रुपये का दान किया था।
पुरानी संस्कृति से डर
हमारी संस्कृति का पुरानी इमारतों और आर्किटेक्चर से गहरा ताल्लुक़ होता है। वहीं, बहुत से लोग इतिहास से इतना घबराते हैं कि उसे मिटाने पर आमादा हो जाते हैं।जैसे कि सऊदी अरब ने इस्लामिक दौर से पहले के सारे निशान अपने देश से मिटा दिए ताकि वहाबी विचारधारा को चुनौती देने वाली कोई ताक़त न खड़ी हो सके। इसी तरह तालिबान ने बामियान स्थित बुद्ध की विशाल मूर्तियों को उड़ा दिया था।
चीन में शहरों के उद्धार के नाम पर पुरानी बस्तियां उजाड़ी जा रही हैं। इसी तरह वीगर मुसलमानों को शुद्ध करने के लिए बेहद सख्त अभियान चलाया जा रहा है। लिंडी इफेक्ट, जिसकी बात तालिब करते हैं, वो अतीत के साथ हमारे रिश्तों को खत्म करने वाले लोगों पर गहरा असर डालता है।
लंबे वक़्त तक खड़ी इमारतें तमाम मुश्किल हालात से निपटने के लिए सक्षम हो जाती हैं। अक्सर लोग कहते हैं कि पुराने को मिटाएंगे, तभी नई इबारत लिखी जाएगी। पर, बहुत सी पुरानी और गलत परंपराओं अपराधों जैसे दास प्रथा, बलात्कार, हत्या और कट्टरपंथ को मिटाने की बात कोई नहीं करता। ऐसी दोगली बातें करने वालों को इतिहास को क़रीब से जानने-समझने की जरूरत है।
झेलने की ताकत
भविष्य को लेकर नासिम तालेब की सोच का एक और पहलू भी है। और वो है किसी का नाजुक होना। कोई चीज तब नाजुक मानी जाती है, जब वो मुश्किल हालात में खुद को बदलकर बचा नहीं पाती। पहले ही झटके में इसके परखच्चे उड़ जाते हैं। हालांकि क़ुदरत की बनाई हुई बहुत सी चीजें तमाम झटके सहकर भी खड़ी रहती हैं।वहीं, इंसान की बनाई तमाम इमारतों, कलाओं और विचारों में भी बदलते हालात में खुद को ढालने की क्षमता होती है। इसीलिए किसी नई चीज का आविष्कार करने में जुटे लोग दो सवाल करते हैं। पहला ये कि इससे किस समस्या का हल निकलेगा? और दूसरा ये कि इससे जिंदगी में क्या आसानी आएगी? अगर आप इन सवालों के तसल्लीबख्श जवाब नहीं खोज पाते हैं, तो बेहतर होगा कि इन सवालों के जवाब मिलने का इंतजार करें।
अगर आप भविष्य के बारे में सोच रहे हैं। और ये अंदाजा लगाना चाहते हैं कि कौन सी चीज मजबूत है और किसका समय पूरा हो गया, तो आप ये समझ लीजिए कि भविष्य, अतीत के वो टुकड़े हैं, जो सदियों से वक़्त के थपेड़े सहकर भी आज में मौजूद हैं।
वहीं, जो आज है, वो कल टूटकर बिखर भी सकता है। अगर आप ये समझना चाहते हैं कि भविष्य के गर्भ में क्या बचने वाला है तो उन रहस्यों पर गौर कीजिए, जिनकी चर्चा सदियों से होती आ रही है। असली राज को तर्क से नहीं मिटाया जा सकता।
कोई नया ट्रेंड या अचानक मिली शोहरत लंबे समय तक नहीं टिकने वाली। बहुत कम चीजें ही टिकती हैं। हमसे और हमारी संस्कृति में जिन का टकराव हमेशा से चला आ रहा है, वो हैं जरूरतें और ख्वाहिशें, मोहब्बत और नफरत, आजादी और गुलामी। इंसानी सभ्यता में ये टकराव हमेशा चलने वाला है।
जब आप अपनी सोच को वर्तमान की क़ैद से आजाद करते हैं तो आपको सिर्फ शोर सुनाई देता है। दूर की सोचना आप के आज में खलल डालता है। मशहूर लेखक विलियम गिब्सन ने कहा था: भविष्य की आमद हो चुकी है। इसके सबसे अहम दौर तो पहले ही बीत चुके हैं।