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क्या 5जी तकनीक में चीन की बढ़त रोकने में कामयाब हो पाएंगे अमेरिकी प्रतिबंध?

Mon, 31 May 2021 03:25 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, हांगकांग
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, हांगकांग Published by: Harendra Chaudhary Updated Mon, 31 May 2021 03:25 PM IST
सार

विशेषज्ञों के मुताबिक 5जी और पुराने नेटवर्क के बीच फर्क सिर्फ रफ्तार का नहीं है। बल्कि असल फर्क डेटा कैरी (अपलोड-डाउनलोड) करने की क्षमता और लेटेंसी (रेस्पॉन्स की गति) का है। औद्योगिक गतिविधियों के लिए मशीन संचालित नेटवर्क में लगभग इंस्टेंट (तुरंत) रेस्पॉन्स की जरूरत होती है। 5जी टेक्नोलॉजी ने रेस्पॉन्स गति को दस गुना बढ़ा दिया है...

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China growth in the 5G sector has slowed due to US sanctions on Chinese telecom companies Huawei and ZTE
5जी सुविधा - फोटो : pixabay

विस्तार

एक खबर के मुताबिक चीनी कंपनियों ने देश में 5जी इंटरनेट के 5000 हजार से ज्यादा नेटवर्क लगा दिए हैं। इस साल के अंत तक वे ऐसे दसियों हजार और नेटवर्क कायम कर लेंगी। इससे चौथी औद्योगिक क्रांति का रास्ता साफ होगा। इस रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में मौजूद कुल 5जी बेस स्टेशनों में 70 फीसदी चीनी कंपनियों ने लगाए हैं। दुनिया में 5जी स्मार्टफोन के 80 फीसदी यूजर चीनी कंपनियों के बनाए ऐसे फोन का इस्तेमाल कर रहे हैं। जानकारों का कहना है कि चीन की टेलीकॉम कंपनियों- हुवावे और जेडटीई पर अमेरिकी प्रतिबंधों से 5जी के क्षेत्र में चीन की बढ़त की रफ्तार घटी है। इसके बावजूद चीन के लगभग सभी शहरों में अब 5जी सेवा उपलब्ध हो चुकी है।

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हांगकांग की वेबसाइट एशिया टाइम्स की इस रिपोर्ट क मुताबिक पश्चिमी देशों की कंपनियां अभी इस मामले में निवेश करने को लेकर विचार-विमर्श में ही जुटी हैं। 2020 में आआई एक रिपोर्ट के मुताबिक ऑडी और बीएएसएफ जैसी जर्मन कंपनियों ने प्राइवेट नेटवर्क का परीक्षण शुरू कर दिया था, लेकिन बाकी देशों में ऑटोमेशन के लिए 5जी नेटवर्क में निवेश से संभावित लाभ का ही अभी जायजा लिया जा रहा था। 2021 में निजी कंपनी एरिक्सन ने विमान निर्माता एयरबस कंपनी के लिए एक प्राइवेट 5जी नेटवर्क लगाया। लेकिन अभी तक यह 4जी की सेवा ही दे पा रहा है। अमेरिका की सिलिकॉन वैली में हिताची और एरिक्सन कंपनियों ने काम कर रहे 5जी नेटवर्क जरूर लगा दिए हैं।
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विशेषज्ञों के मुताबिक 5जी और पुराने नेटवर्क के बीच फर्क सिर्फ रफ्तार का नहीं है। बल्कि असल फर्क डेटा कैरी (अपलोड-डाउनलोड) करने की क्षमता और लेटेंसी (रेस्पॉन्स की गति) का है। औद्योगिक गतिविधियों के लिए मशीन संचालित नेटवर्क में लगभग इंस्टेंट (तुरंत) रेस्पॉन्स की जरूरत होती है। 5जी टेक्नोलॉजी ने रेस्पॉन्स गति को दस गुना बढ़ा दिया है। इससे औद्योगिक ऑटोमेशन में ऐसी संभावनाएं खुल गई हैं, जैसी पहले कल्पना से भी बाहर थीं। लेकिन इस टेक्नोलॉजी के लिए बहुत बड़े पैमाने पर निवेश की जरूरत है। जानकारों का कहना है कि पश्चिमी देशों में कुछ अपवादों को छोड़ कर अभी निवेश प्रायोगिक दौर में हैं। जबकि चीन ने अपने यहां ज्यादातर फैक्टरियों, खदानों और बंदरगाहों को 5जी नेटवर्क से संचालित करना शुरू कर दिया है।
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एशिया टाइम्स ने चीन के औद्योगिक सूत्रों के हवालों के कहा है कि चीन अगले साल फरवरी तक पांच लाख से आठ लाख तक नए 5जी बेस स्टेशन लगा लेगा। इससे उत्साहित एक चीनी अधिकारी ने एशिया टाइम्स से कहा- ‘अब पश्चिमी देश चीन के मुकाबले के लिए अलग से 5जी तकनीक में अरबों डॉलर का निवेश करें, उसका कोई तर्क नहीं बनता। वे बहुत देर कर चुके हैं। अमेरिका ने गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और अमेजन जैसी कंपनियों के जरिए एनालिटिक्स क्षेत्र में बढ़त बनाई है। उसे उसी क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहिए। 5जी क्षेत्र में उसे चीन से कहना चाहिए कि आइए हम मिल कर उद्योगों का चेहरा बदलें, इसमें प्रतिस्पर्धा करें।’


अमेरिकी विशेषज्ञ डेविड पी गोल्डमैन ने ध्यान दिलाया है कि उन्होंने 2020 में लिखी अपनी किताब में कहा था कि चीन 5जी के जरिए दुनिया पर अपनी छाप छोड़ने की योजना पर आगे बढ़ चुका है। 21वीं सदी में का रास्ता उसने तैयार कर दिया है। लेकिन दूसरे विश्लेषकों के मुताबिक चीन किस रफ्तार से इस दिशा में आगे बढ़ सकेगा, यह चिप और 28 नैनोमीटर या उससे भी छोटे ट्रांजिस्टर गेटवे बनाने की उसकी क्षमता पर निर्भर करेगा। प्रतिबंधों के जरिए अमेरिका उसकी इस क्षमता को सीमित करने की कोशिश कर रहा है। इसी मकसद से हाल में अमेरिका ने नीदरलैंड्स की कंपनी एसएसएमएल पर एक्सट्रीम अल्टा-वॉयलेट स्कैनर चीन को ना बेचने के लिए दबाव बनाया। इस स्कैनर का इस्तेमाल सात नैनोमीटर या उससे भी छोटे चिप बनाने में होता है। फिलहाल, सिर्फ ताइवान और दक्षिण कोरिया के पास इससे भी छोटे गेटवे चिप बनाने की क्षमता है, जिन्हें अमेरिकी खेमे का देश माना जाता है।

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