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ट्विटर, फेसबुक की मनमानी से ट्रंप विरोधी खेमे भी नाराज, एंजेला मर्केल ने की सोशल मीडिया पर कड़े नियम लागू करने की वकालत
Tue, 12 Jan 2021 02:22 PM IST
Harendra Chaudhary
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बॉन
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बॉन
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Tue, 12 Jan 2021 02:22 PM IST
सार
एंजेला मर्केल के ट्रंप से अच्छे रिश्ते नहीं रहे। लेकिन अब उन्होंने कहा है कि सोशल मीडिया के ताजा रुख से ये जरूरत और ज्यादा महसूस हुई है कि इन कंपनियों पर कड़े नियम लागू करने की जरूरत है...
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Donald Trump Twitter account
- फोटो : Amar Ujala (File Photo)
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विस्तार
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को प्रतिबंधित करने के ट्विटर, फेसबुक और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के फैसले पर अमेरिका और यूरोप में विवाद भड़क उठा है। इस मामले में सोशल मीडिया कंपनियों की आलोचना वैसे बहुत से नेताओं और विशेषज्ञों ने भी की है, जो डोनाल्ड ट्रंप के विरोधी रहे हैं।
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आलोचकों का कहना है कि लोग क्या पढ़ें या देखें, इस बारे में फैसला मुनाफे के मकसद से चलने वाली हाई टेक कंपनियां नहीं कर सकतीं। इस सिलसिले में इस बात का जिक्र भी हो रहा है कि सोशल मीडिया कंपनियां ट्रंप के पूरे कार्यकाल में उनके 'दुष्प्रचार' को फैलाने का माध्यम बनी रहीं। अब जबकि वे सत्ता से बाहर हो रहे हैं, तब वे उनके खिलाफ लामबंद हुई हैं।
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ट्विटर ने ट्रंप को स्थायी रूप से प्रतिबंधित कर दिया है। इस कदम के खिलाफ जिन शख्सियतों ने आवाज उठाई है, उनमें जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल भी हैं। मर्केल के ट्रंप से अच्छे रिश्ते नहीं रहे। लेकिन अब उन्होंने कहा है कि सोशल मीडिया के ताजा रुख से ये जरूरत और ज्यादा महसूस हुई है कि इन कंपनियों पर कड़े नियम लागू करने की जरूरत है।
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मर्केल के प्रवक्ता ने ट्रंप के खिलाफ लगे प्रतिबंध को गलत बताया। उन्होंने कहा, “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बुनियादी अधिकार में दखल दिया जा सकता है, लेकिन ऐसा कानून में परिभाषित नियमों के तहत होना चाहिए। ऐसा सोशल मीडिया कंपनियों के प्रबंधन के फैसलों के तहत नहीं हो सकता।”
फ्रांस सरकार ने भी ट्रंप पर लगे प्रतिबंध को लेकर एतराज जताया है। फ्रांस के विदेश मंत्री ब्रुनो ली मायर ने कहा कि हालांकि ट्रंप के झूठ निंदनीय हैं, लेकिन ट्विटर का अपने प्लेटफॉर्म से ट्रंप के सभी ट्विट डिलीट कर देने का फैसला सही नहीं है। उन्होंने कहा, डिजिटल दुनिया का विनियमन डिजिटल कुलीनतंत्र (ऑलिगार्की) नहीं कर सकता। फ्रांस के डिजिटल मामलों के उप मंत्री सेद्रिक ओ ने भी सोशल मीडिया कंपनी के ताजा व्यवहार पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा- सोशल मीडिया कंपनियां सार्वजनिक चर्चा का विनियमन सिर्फ अपने टर्म एंड कंडीशन के तहत कर सकती हैं। इसलिए ऐसा लगता है कि अमेरिका में उन्होंने जो कदम उठाए हैं, वो लोकतांत्रिक नजरिए से सही नहीं हैं।
यूरोप में पहले से ही सोशल मीडिया कंपनियों को विनियमित करने की कोशिश चल रही है। कुछ समय पहले ही यूरोपियन यूनियन (ईयू) ने इन कंपनियों के विनियमन का एक दस्तावेज जारी किया था। इन प्रयासों के पीछे जिन लोगों की प्रमुख भूमिका है, उनमें एक थियरी ब्रेटॉन भी हैं। उन्होंने वेबसाइट पोलिटिको.ईयू पर लिखे एक लेख में कहा है- “यह बात परेशान करने वाली है कि एक सीईओ अमेरिकी राष्ट्रपति के लाउ़डस्पीकर का प्लग मनमाने ढंग से खींच सकता है। इससे इन कंपनियों की ताकत का अंदाजा तो लगता ही है, साथ ही इससे यह भी जाहिर होता है कि हमारा समाज डिजिटल स्पेस को संगठित करने के लिहाज से कितना कमजोर है।”
इसी सिलसिले में ईयू के कूटनीति प्रमुख जोसेफ बॉरेल ने एक ब्लॉग में लिखा है कि यूरोप में सोशल मीडिया नेटवर्कों के लिए बेहतर विनियमन की जरूरत है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए ऐसा किया जाना चाहिए। इसे स्वीकार करना संभव नहीं है कि निजी क्षेत्र की कंपनियां अपने नियमों के तहत अपने प्लेटफॉर्म पर कंटेंट का विनियमन करें।
ट्विटर के खिलाफ आवाज रूस से भी उठी है। वहां के मशहूर विपक्षी नेता अलेक्सी नावालनी ने इसे सेंसरशिप का अस्वीकार्य कदम कहा है। उन्होंने कहा कि ट्विटर ने किसी नियम के तहत ये कार्रवाई की ये किसी को नहीं मालूम। ये कदम भावनाओं और निजी राजनीतिक प्राथमिकता के आधार पर उठाया गया है। रूस के सरकारी मीडिया कर्मी व्लादीमीर सोलोवियेव ने कहा है कि इस कदम से ऐसा लगता है कि अमेरिकी संविधान ट्विटर कंपनी के अंदरूनी दस्तावेजों से कम महत्वपूर्ण है।
अमेरिका में सोशल मीडिया के कई विशेषज्ञों ने कहा है कि किसी व्यक्ति पर संपूर्ण प्रतिबंध लगाने का अधिकार सोशल मीडिया कंपनियों को नहीं दिया जाना चाहिए। कैलिफोर्निया में प्रोफेसर और सोशल मीडिया रिसर्चर रमेश श्रीनिवासन ने ऑनलाइन चैनल डेमोक्रेसी नाउ से बातचीत में कहा कि ये कंपनियां वामपंथी कार्यकर्ताओं के साथ पहले से ऐसा करती रही हैं। अब अमेरिका में बदले राजनीतिक माहौल के बीच उन्होंने ट्रंप को निशाना बनाया है। उन्हें अगर नहीं रोका गया, तो आखिरकार इसका सबसे अधिक खामियाजा वामपंथ को ही उठाना होगा।