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Who is Deepanshu Shaukeen? He surprised the ABVP and NSUI by contesting the 2026 DUSU election as an independe
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कौन हैं दीपांशु शौकीन? डूसू चुनाव 2026 में निर्दलीय उतरकर ABVP-NSUI को चौंकाया
दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ यानी DUSU चुनाव में इस बार एक निर्दलीय उम्मीदवार ने छात्र राजनीति के स्थापित समीकरणों को चुनौती दी है। उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरे दीपांशु शौकीन का नाम चुनावी नतीजों के साथ तेजी से चर्चा में आया। ABVP और NSUI जैसे बड़े छात्र संगठनों के उम्मीदवारों के बीच शौकीन की मौजूदगी ने मुकाबले को दिलचस्प बनाया और आखिरकार उन्होंने उपाध्यक्ष पद पर जीत दर्ज की।
लेकिन दीपांशु शौकीन की कहानी सिर्फ एक चुनावी जीत की कहानी नहीं है। इसकी शुरुआत उस वक्त हुई, जब उन्होंने NSUI से टिकट की मांग की थी। उनका नामांकन भी हुआ, लेकिन संगठन की ओर से नामांकन वापस लेने के लिए कहा गया। शौकीन ने संगठन का निर्देश मानने के बजाय चुनावी मैदान में बने रहने का फैसला किया। इसके बाद उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया और छात्र राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश शुरू कर दी।
शौकीन की इस बगावत ने चुनावी मुकाबले को नया मोड़ दिया। जहां एक तरफ ABVP और NSUI अपने संगठनात्मक नेटवर्क के साथ मैदान में थे, वहीं दीपांशु ने व्यक्तिगत समर्थन और छात्र मुद्दों को अपनी ताकत बनाने की कोशिश की। चुनाव प्रचार के दौरान उनके समर्थन में छात्रों की मौजूदगी और उनके नाम के नारे लगातार चर्चा में रहे।
दीपांशु की राजनीति में सक्रियता की एक अहम वजह सत्य निकेतन हादसा भी बताया जाता है। हादसे के बाद उन्होंने छात्रों को न्याय मिलने तक जूते नहीं पहनने का फैसला किया था। उनका कहना था कि जब तक छात्रों को न्याय नहीं मिलता, वह जूते नहीं पहनेंगे। इस फैसले के बाद छात्र मुद्दों को लेकर उनकी सक्रियता और ज्यादा चर्चा में आई।
चुनाव प्रचार के दौरान दीपांशु शौकीन और ABVP उम्मीदवार यश डबास के बीच संभावित गठजोड़ की चर्चाएं भी सामने आईं। दोनों के जाट समुदाय से आने को लेकर ऐसी अटकलें लगाई गईं कि चुनाव में दोनों के बीच किसी तरह की समझ बन सकती है। हालांकि, दीपांशु शौकीन और यश डबास दोनों ने ऐसी किसी राजनीतिक समझ या गठजोड़ से इनकार किया।
इसी बीच शौकीन के आम आदमी पार्टी की छात्र इकाई ASAP में शामिल होने की संभावनाओं की भी चर्चा हुई। लेकिन उन्होंने किसी छात्र संगठन का हिस्सा बनने के बजाय स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने का फैसला बरकरार रखा। यही वजह रही कि चुनाव में उनकी पहचान किसी संगठन के उम्मीदवार के बजाय एक स्वतंत्र चेहरे के तौर पर बनी।
अब बात उनके व्यक्तिगत और पारिवारिक सफर की। दीपांशु शौकीन दिल्ली के बाहरी इलाके में बसे पीरागढ़ी गांव से आते हैं। उनके पिता बस कंडक्टर हैं, जबकि मां आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं। उन्होंने भगत सिंह कॉलेज से ग्रेजुएशन की पढ़ाई की और फिलहाल दिल्ली यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ बुद्धिस्ट स्टडीज में पढ़ाई कर रहे हैं।
परिवार की सोच और दीपांशु के अपने सपनों में भी अंतर रहा। उनके पिता चाहते थे कि बेटा UPSC की तैयारी करे और प्रशासनिक सेवा में जाए। लेकिन दीपांशु ने परिवार के सामने अपनी इच्छा साफ कर दी थी। उनका कहना था कि वह राजनीति में जाना चाहते हैं। इसके बाद उन्होंने छात्र राजनीति को ही अपने भविष्य की दिशा बनाने का फैसला किया।
DUSU चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत ने अब इस सफर को एक नई पहचान दी है। संगठन के टिकट के बिना चुनाव लड़कर उपाध्यक्ष पद हासिल करना उनके लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक उपलब्धि बन गया है। हालांकि, इस जीत के बाद असली चुनौती अब सामने है छात्रों से किए गए वादों को पूरा करना और विश्वविद्यालय से जुड़े मुद्दों पर अपनी भूमिका तय करना।
दीपांशु शौकीन की जीत ने DUSU की छात्र राजनीति में यह सवाल जरूर खड़ा किया है कि क्या आने वाले समय में व्यक्तिगत लोकप्रियता और छात्र मुद्दों की राजनीति बड़े छात्र संगठनों के पारंपरिक प्रभाव को चुनौती दे सकती है? फिलहाल इतना साफ है कि एक निर्दलीय उम्मीदवार ने इस चुनाव में अपनी अलग जगह जरूर बना ली है।
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