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श्रीकुल महाराज के मेले में रही रासो व तांदी नृत्य की धूम
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तहसील पुरोला एवं चकराता क्षेत्र के अधिकांश गांव के लोगों की ओर से सरूखा में प्रत्येक वर्ष श्रीकुल महाराज की पूजा-पाठ कर मेले का आयोजन किया जाता है। मेले में रात को तांदी व रासो नृत्य का आयोजन किया गया।
पुरोला तहसील के खलाड़ी, करड़ा, शिकारू, रतेड़ी, ढकाड़ा, कुफारा, मैराणा एवं चकराता तहसील के छजाड़, भुटाणू, हटाण, भुनाण, डांगुठा आदि गांवों का प्रत्येक वर्ष टौंस वन प्रभाग के जाख डलनू क्षेत्र के देवदार के घने जंगलों के बीच स्थित सरूखा नामे तोक में हर साल श्रीकुल महाराज की पूजा-पाठ कर मेला आयोजित किया जाता है। इस वर्ष यह मेला गत बुधवार को धूमधाम से मनाया गया। सरूखा में दोनों क्षेत्र के इष्ट देव श्रीकुल महाराज का पौराणिक मंदिर है। यहां अक्षय तृतीय के दिन 6 माह के लिए मंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाते हैं। यहां एक पत्थर पर एक ओखलीनुमा कुंड बना हुआ है। इसमें जल भरा हुआ रहता है। मेले में उपस्थित लोग कुंड का पानी पीते हैं, लेकिन कुंड खाली नहीं होता है। श्रद्धालु इसे प्रसाद के रूप में बोतलों में भरकर अपने घर ले जाते हैं। पुजारी भगवान शर्मा ने बताया कि यहां दंपती संतान कामना भी करते हैं, जिनकी मनोकामना पूरी होती है वे अपने बच्चों का चूड़ाक्रम संस्कार यहीं करते हैं। इस समय करीब 100 दंपतियों की संतान की मनोकामना पूरी होने पर वे लोग यहां महाराज की पूजा-पाठ करने पहुंचे हैं।
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पुरोला तहसील के खलाड़ी, करड़ा, शिकारू, रतेड़ी, ढकाड़ा, कुफारा, मैराणा एवं चकराता तहसील के छजाड़, भुटाणू, हटाण, भुनाण, डांगुठा आदि गांवों का प्रत्येक वर्ष टौंस वन प्रभाग के जाख डलनू क्षेत्र के देवदार के घने जंगलों के बीच स्थित सरूखा नामे तोक में हर साल श्रीकुल महाराज की पूजा-पाठ कर मेला आयोजित किया जाता है। इस वर्ष यह मेला गत बुधवार को धूमधाम से मनाया गया। सरूखा में दोनों क्षेत्र के इष्ट देव श्रीकुल महाराज का पौराणिक मंदिर है। यहां अक्षय तृतीय के दिन 6 माह के लिए मंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाते हैं। यहां एक पत्थर पर एक ओखलीनुमा कुंड बना हुआ है। इसमें जल भरा हुआ रहता है। मेले में उपस्थित लोग कुंड का पानी पीते हैं, लेकिन कुंड खाली नहीं होता है। श्रद्धालु इसे प्रसाद के रूप में बोतलों में भरकर अपने घर ले जाते हैं। पुजारी भगवान शर्मा ने बताया कि यहां दंपती संतान कामना भी करते हैं, जिनकी मनोकामना पूरी होती है वे अपने बच्चों का चूड़ाक्रम संस्कार यहीं करते हैं। इस समय करीब 100 दंपतियों की संतान की मनोकामना पूरी होने पर वे लोग यहां महाराज की पूजा-पाठ करने पहुंचे हैं।
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