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Hindi News ›   Uttarakhand ›   Uttarkashi News ›   Phuldai no longer visible in Chaitra month

चैत्र माह में अब नहीं दिखाई देती फूलदेई

Tue, 14 Mar 2017 10:10 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला उत्तरकाशी
ब्यूरो/अमर उजाला उत्तरकाशी Updated Tue, 14 Mar 2017 10:10 PM IST
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पहाड़ की संस्कृति, रीति-रिवाज और त्योहार विलुप्ति की कगार पर है। मंगलवार से चैत्र मास शुरू हो गया है, लेकिन घर की देहरी (दहलीज) पर फ्योंली के फूल डालने वाली फूलदेई कहीं नहीं दिखाई दे रही है। चैती गीत और बाजगियों के ढोल-दमाऊं और रणसिंगों की आवाज भी न जाने कहा खो गई है।

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कभी चैत मास शुरू होते ही पहाड़ के गांवों में बच्चों के त्योहार फुल्यार का आगाज भी हो जाता था। गांव की बालिकाएं सुबह होते ही देहरियों पर फ्योंली के फूल डालती थी। इसके बदले ग्रामीण कन्याओं को चावल और दाल देते थे। नौ दिन तक चलने वाले इस त्योहार के अंतिम दिन बच्चे भंडारा करते थे, जिसमें गांव वाले प्रसाद ग्रहण करते थे।
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चैत्र मास की संक्रांति से गांव का बाजगी एवं उनकी पत्नि ढोल-दमाऊं के साथ गांव के घर-घर में जाकर चैती गीत गाते थे। इस पर गांव वाले उन्हें अनाज, कोदा, झंगोरा, तेल, मिर्च आदि सामग्री भेंट देते थे।
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इस बार भी फुल्यार त्योहार मंगलवार से शुरू हो गया है।

फ्योंली के फूलों ने तो गांव के आसपास व खेतों में अपनी छठा बिखेर रखी है, लेकिन इनको तोड़कर घरों की देहरी पर बिखेरने वाली बालिकाएं कहीं नहीं दिखाई दे रही है। बाजगी के ढोल और चैती गीत भी अब नहीं सुनाई दे रहे हैं। संग्राली के बाजगी मदनलाल ने बताया कि फुल्यार त्योहार पहाड़ के गांवों में सुख-समृद्धि एवं खुशहाली के लिए मनाया जाता है। बसंत ऋतु में फ्योंली का फूल सबसे पहले खिलता है।

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