{"_id":"5cb602d0bdec2214023368d3","slug":"155543221712-utter-kashi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"चीड़ की पतियों से बिजली पैदा कर मुनाफे की संभावनाएं तलाश रहा उरेडा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
चीड़ की पतियों से बिजली पैदा कर मुनाफे की संभावनाएं तलाश रहा उरेडा
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
उत्तरकाशी। वनाग्नि भड़काने में बारूद का काम करने वाली चीड़ की पत्तियों(पिरूल) से बिजली बनाने की कोशिश शुरू हो गई है। वन पंचायत, गैर सरकारी संगठन, समितियां और छोटे कारोबारियों के लिए जनपद में 71 हजार हेक्टेयर दोहन योग्य क्षमता वाले चीड़ वनों से वन विभाग एवं उरेडा ने 16.42 मेगावाट विद्युत उत्पादन क्षमता का पता लगाया है। उरेडा ने इसके लिए प्रदेश स्तर पर निविदाएं भी आमंत्रित की हैं।
जिले में 571 ग्राम पंचायतों में 220 वन पंचायतें चीड़ वन क्षेत्र में सक्रिय हैं। सरकारी स्तर पर चीड़ की पत्तियों से बिजली बनाने के लिए प्रोत्साहन दिया जा रहा है। वन पंचायतें या अन्य लोगों को चीड़ की पत्तियों से उत्पादित बिजली को ग्रिड से जोड़ने की व्यवस्था भी की जा रही है, ताकि वे पिरूल से उत्पादित बिजली को ग्रिड में देकर कमाई कर सकें। सीजन में 1446 मीट्रिक टन चीड़ की पत्तियां उपलब्ध रहती हैं। योजना के अनुसार यहां 10 से 250 किलोवाट तक बिजली यूनिट लगाई जा सकती है। जानकारों के अनुसार चीड़ के जंगल से यदि पत्तियां हटाई जाती हैं तो वन अग्नि से जंगल की जैव विविधता पर मंडराने वाले खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
उरेडा के अवर अभियंता रघुवीर सिंह कोहली ने बताया कि पिरूल को सुखा कर बायोगैस की भट्टी में जलाया जाता है। इससे निकलने वाली गैस जनरेटर में पहुंचकर बिजली पैदा करती है। जहां से इस बिजली को ग्रिड तक पहुंचाया जाता है। इस आसान तकनीकी वाला 25 किलोवाट का प्रोजेक्ट 25 लाख रुपये में तैयार होता है। जिसमें पिरूल स्टोरेज से लेकर पूरे प्लांट की कीमत शामिल है। इसमें लाभार्थी को 10.50 लाख रुपये निवेश करना है, शेष अंश केंद्र एवं राज्य सरकार की ओर से दिया जाएगा। उन्होंने बताया कि पिरूल के संग्रहण आदि मजदूरी एवं तकनीकी स्टाफ सहित तमाम खर्चे काट कर 25 किलोवाट की यूनिट से सालाना 1.64 लाख रुपये शुद्ध बचत हो सकती है।
विज्ञापन
कोट...........
जिले के तीनों फॉरेस्ट डिवीजन में 76000 हेक्टेयर में चीड़ वन फैले हैं। इसमें 71 हजार हेक्टेयर को चीड़ की पत्तियों के दोहन योग्य क्षमता वाला चिह्नित किया गया है। इस क्षेत्र में 220 वन पंचायतें सक्रिय हैं। वन विभाग ने विस्तृत सर्वे कर उरेडा को रिपोर्ट सौंप दी है। अब उन्हें ही पिरूल से बिजली उत्पादन की योजना बनानी है।
संदीप कुमार, डीएफओ उत्तरकाशी।
कोट...........
जिले में चीड़ की पत्तियों 16.42 मेगावाट विद्युत उत्पादन की क्षमता का आकलन किया गया है। इसके लिए विभाग ने राज्य स्तर पर निविदाएं भी आमंत्रित की गईं हैं। क्षेत्र में 10 से 250 किलोवाट तक के बिजली उत्पादन संयंत्रों को ग्रिड से जोड़ने की योजना है। ताकि इन यूनिटों से उत्पादित बिजली ग्रिड को बेच कर उद्यमी मुनाफा कमा सके। बिजली की दर नियामक आयोग तय करेगा।
मनोज कुमार, वरिष्ठ प्रबंधक उरेडा उत्तरकाशी।
विज्ञापन
जिले में 571 ग्राम पंचायतों में 220 वन पंचायतें चीड़ वन क्षेत्र में सक्रिय हैं। सरकारी स्तर पर चीड़ की पत्तियों से बिजली बनाने के लिए प्रोत्साहन दिया जा रहा है। वन पंचायतें या अन्य लोगों को चीड़ की पत्तियों से उत्पादित बिजली को ग्रिड से जोड़ने की व्यवस्था भी की जा रही है, ताकि वे पिरूल से उत्पादित बिजली को ग्रिड में देकर कमाई कर सकें। सीजन में 1446 मीट्रिक टन चीड़ की पत्तियां उपलब्ध रहती हैं। योजना के अनुसार यहां 10 से 250 किलोवाट तक बिजली यूनिट लगाई जा सकती है। जानकारों के अनुसार चीड़ के जंगल से यदि पत्तियां हटाई जाती हैं तो वन अग्नि से जंगल की जैव विविधता पर मंडराने वाले खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
विज्ञापन
उरेडा के अवर अभियंता रघुवीर सिंह कोहली ने बताया कि पिरूल को सुखा कर बायोगैस की भट्टी में जलाया जाता है। इससे निकलने वाली गैस जनरेटर में पहुंचकर बिजली पैदा करती है। जहां से इस बिजली को ग्रिड तक पहुंचाया जाता है। इस आसान तकनीकी वाला 25 किलोवाट का प्रोजेक्ट 25 लाख रुपये में तैयार होता है। जिसमें पिरूल स्टोरेज से लेकर पूरे प्लांट की कीमत शामिल है। इसमें लाभार्थी को 10.50 लाख रुपये निवेश करना है, शेष अंश केंद्र एवं राज्य सरकार की ओर से दिया जाएगा। उन्होंने बताया कि पिरूल के संग्रहण आदि मजदूरी एवं तकनीकी स्टाफ सहित तमाम खर्चे काट कर 25 किलोवाट की यूनिट से सालाना 1.64 लाख रुपये शुद्ध बचत हो सकती है।
विज्ञापन
कोट...........
जिले के तीनों फॉरेस्ट डिवीजन में 76000 हेक्टेयर में चीड़ वन फैले हैं। इसमें 71 हजार हेक्टेयर को चीड़ की पत्तियों के दोहन योग्य क्षमता वाला चिह्नित किया गया है। इस क्षेत्र में 220 वन पंचायतें सक्रिय हैं। वन विभाग ने विस्तृत सर्वे कर उरेडा को रिपोर्ट सौंप दी है। अब उन्हें ही पिरूल से बिजली उत्पादन की योजना बनानी है।
संदीप कुमार, डीएफओ उत्तरकाशी।
कोट...........
जिले में चीड़ की पत्तियों 16.42 मेगावाट विद्युत उत्पादन की क्षमता का आकलन किया गया है। इसके लिए विभाग ने राज्य स्तर पर निविदाएं भी आमंत्रित की गईं हैं। क्षेत्र में 10 से 250 किलोवाट तक के बिजली उत्पादन संयंत्रों को ग्रिड से जोड़ने की योजना है। ताकि इन यूनिटों से उत्पादित बिजली ग्रिड को बेच कर उद्यमी मुनाफा कमा सके। बिजली की दर नियामक आयोग तय करेगा।
मनोज कुमार, वरिष्ठ प्रबंधक उरेडा उत्तरकाशी।