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गंगोत्री यात्रा मार्ग स्थित प्राचीन कल्प केदार मंदिर को संरक्षण की दरकार
Updated Fri, 11 May 2018 10:40 PM IST
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उत्तरकाशी। गंगोत्री यात्रा मार्ग पर हर्षिल धराली क्षेत्र में कल्प केदार का मंदिर सरकारी उपेक्षा का शिकार है। न तो कभी पुरातत्व विभाग ने इस मंदिर की सुध ली और न ही शासन-प्रशासन ने गंगोत्री यात्रा मार्ग स्थित मंदिर को धार्मिक पर्यटन के लिहाज से विकसित करने की जहमत उठाई।
कभी हर्षिल धराली क्षेत्र में 240 प्राचीन मंदिरों का समूह मौजूद था। 17वीं सदी में झाला सुक्की के पास माला अवाणा का पहाड़ टूटने से गंगा भागीरथी पर बनी झील में मंदिर समूह के अधिकांश मंदिर डूब गए थे। शेष मंदिर में भी बाद के वर्षों में धराली गांव के बीच से होकर बहने वाली खीर गंगा की बाढ़ की भेंट चढ़ गए। वर्ष 1980 में यहां रहने वाले स्वामी शारदानंद की पहल पर ग्रामीणों ने गंगा किनारे रेत हटाकर एक मंदिर को बाहर निकाला था। यहां जमीन में आधा दबा हुआ केदारनाथ मंदिर की शैली में बना कल्प केदार का मंदिर इसके ऐतिहासिक होने का पुख्ता प्रमाण है।
2012 में निकलीं कई नक्काशीदार शिलाएं
अप्रैल 2012 में कल्प केदार मंदिर से कुछ कदमों की दूरी पर गंगा भागीरथी के किनारे पत्थर से बनी ठोस घड़े जैसी आकृति के साथ ही कई नक्काशीदार शिलाएं निकलीं थी। धराली निवासी जय भगवान पंवार का कहना है कि गांव के बुजुर्ग वर्ष 1945 तक यहां दो मंदिर मौजूद होने की बात कहते हैं, जो उस समय खीर गंगा में आयी बाढ़ में डूब गए थे। वर्ष 1980 में इनमें से एक मंदिर को रेत हटाकर बाहर निकाला गया। जमीन में आधा दबे इस मंदिर के गर्भगृह में हमेशा पानी भरा रहता है। इसके बीच सफेद स्फटिक से बना पंचमुखी शिवलिंग है। यदि सरकार और पुरातत्व विभाग यहां आसपास के इलाके में खुदाई करे, तो प्राचीन मंदिर समूह सामने आ सकता है। इस ऐतिहासिक धरोहर का संरक्षण कर इसे धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की जरूरत है।
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कभी हर्षिल धराली क्षेत्र में 240 प्राचीन मंदिरों का समूह मौजूद था। 17वीं सदी में झाला सुक्की के पास माला अवाणा का पहाड़ टूटने से गंगा भागीरथी पर बनी झील में मंदिर समूह के अधिकांश मंदिर डूब गए थे। शेष मंदिर में भी बाद के वर्षों में धराली गांव के बीच से होकर बहने वाली खीर गंगा की बाढ़ की भेंट चढ़ गए। वर्ष 1980 में यहां रहने वाले स्वामी शारदानंद की पहल पर ग्रामीणों ने गंगा किनारे रेत हटाकर एक मंदिर को बाहर निकाला था। यहां जमीन में आधा दबा हुआ केदारनाथ मंदिर की शैली में बना कल्प केदार का मंदिर इसके ऐतिहासिक होने का पुख्ता प्रमाण है।
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2012 में निकलीं कई नक्काशीदार शिलाएं
अप्रैल 2012 में कल्प केदार मंदिर से कुछ कदमों की दूरी पर गंगा भागीरथी के किनारे पत्थर से बनी ठोस घड़े जैसी आकृति के साथ ही कई नक्काशीदार शिलाएं निकलीं थी। धराली निवासी जय भगवान पंवार का कहना है कि गांव के बुजुर्ग वर्ष 1945 तक यहां दो मंदिर मौजूद होने की बात कहते हैं, जो उस समय खीर गंगा में आयी बाढ़ में डूब गए थे। वर्ष 1980 में इनमें से एक मंदिर को रेत हटाकर बाहर निकाला गया। जमीन में आधा दबे इस मंदिर के गर्भगृह में हमेशा पानी भरा रहता है। इसके बीच सफेद स्फटिक से बना पंचमुखी शिवलिंग है। यदि सरकार और पुरातत्व विभाग यहां आसपास के इलाके में खुदाई करे, तो प्राचीन मंदिर समूह सामने आ सकता है। इस ऐतिहासिक धरोहर का संरक्षण कर इसे धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की जरूरत है।
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